मंत्री के क्षेत्र में ही पंचायत समिति गायब
गणपत सिंह मांडोली,
वरिष्ठ पत्रकार
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चुनाव में करीब 36 हजार मतों से प्रचंड जीत हासिल कर सिरोही से विधानसभा तक पहुंचे ओटाराम देवासी को राज्यमंत्री का दर्जा मिला। सिरोही के लिए यह गौरवपूर्ण क्षण रहा कि उनके विधायक अब राज्यमंत्री है। कई महत्वपूर्ण विभागों के साथ ही उन्हें पंचायतराज भी दिया गया। लेकिन, वे जनता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर रहे। पता नहीं राज्यमंत्री होते हुए भी मंत्रालय में उनकी चलती नहीं या शायद वे करना ही नहीं चाहते। चाहे जो हो, लेकिन सिरोही विधानसभा क्षेत्र के लोगों को इस बार भी निराशा ही हाथ लगी।
हाल ही में पंचायतों का परिसीमन किया गया है। इसके तहत कई नई पंचायतें व पंचायत समितियों का गठन किया गया। सिरोही विधानसभा क्षेत्र में कालन्द्री को पंचायत समिति मिलने की उम्मीद थी। लोग इसके लिए अर्से से प्रयासरत भी थे, लेकिन पंचायतराज राज्यमंत्री के क्षेत्र की यह पंचायत ग्राम पंचायत ही रह गई। जिले के पिण्डवाड़ा-आबू व रेवदर क्षेत्र को एक-एक पंचायत समिति मिल गई, लेकिन राज्यमंत्री का क्षेत्र कोरा रह गया। पिण्डवाड़ा में भावरी व रेवदर में मंडार पंचायतों को समिति की सौगात मिली।
हाल ही में सरकार की ओर से जारी अधिसूचना में भावरी और मंडार को नई पंचायत समितियों का दर्जा दे दिया गया है, लेकिन कालंद्री का नाम सूची से बाहर रहा। विभाग के राज्यमंत्री होने के बावजूद ओटाराम देवासी अपने क्षेत्र को पंचायत समिति नहीं दिला सके। राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि आखिरी दौर में ऐसा कौनसा दबाव या ताकत का उपयोग हुआ कि कालंद्री को समिति नहीं मिल पाई। जनसंख्या, भौगोलिक स्थिति और प्रशासनिक आवश्यकता के आधार पर कालंद्री को मजबूत दावेदार माना जा रहा था, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।
जनता में अब नाराजगी तो रहेगी ही
उधर, रेवदर क्षेत्र के मंडार को लगातार दो सौगात मिल गई। मंडार को पहले ग्राम पंचायत से नगर पालिका बना दिया गया और अब पंचायत समिति भी बन गई। अब यह कहना मुश्किल है कि इसमें पूर्व विधायक जगसीराम कोली की कोई करामात काम कर गई या फिलवक्त के कांग्रेस से विधायक मोतीलाल कोली का कारनामा।
वहीं, पिण्डवाड़ा विधायक समाराम गरासिया भी अपने क्षेत्र में भावरी को पंचायत समिति बनवाने में सफल रहे। ऐसे में पंचायतराज राज्यमंत्री के गृह क्षेत्र से मजबूत दावेदार कालन्द्री को पंचायत समिति का दर्जा नहीं मिलने से स्थानीय लोगों और भाजपा कार्यकर्ताओं में नाराजगी तो रहेगी ही।
प्रमोशन मिले या न मिले पर डिमोशन करवा दिया
ऐसा भी नहीं है कि पंचायतराज राज्यमंत्री ने अपने क्षेत्र में कोई काम न किया हो। वे जावाल नगर पालिका को वापस ग्राम पंचायत के रूप में तब्दील करवा चुके हैं। अब प्रमोशन हो या डिमोशन यह दीगर बात है। पिछली सरकार ने जावाल ग्राम पंचायत को नगर पालिका के रूप में प्रमोट किया था। इसके बाद यहां शहरी क्षेत्र की तरह कार्य होते रहे, लेकिन भाजपा ने सत्ता में आते ही पहला काम जावाल को वापस पंचायत बनाने का ही किया। यह राज्यमंत्री ओटाराम देवासी का ही क्षेत्र है तथा पालिका से पंचायत में डिमोशन होने सम्बंधी बधाइयों के दौर भी खूब चलाए गए।
खैर, जो भी हो जावाल का प्रकरण देखा जाए तो यही लगता है कि पंचायतराज राज्यमंत्री अपने क्षेत्र की पंचायतों का प्रमोशन कर समितियां बनाने में भागीदारी निभाए या न निभाए पर यह जरूर है कि वे पालिकाओं को भी ग्राम पंचायत में तब्दील जरूर करवा सकते हैं।
अपनी विधानसभा में नहीं दिला पाए समिति
पंचायत समितियों का गठन सिर्फ प्रशासनिक फेरबदल नहीं अपितू स्थानीय शक्ति, संतुलन व जनप्रतिनिधियों की पकड़ और सरकार के भीतर उनकी वास्तविक हैसियत का आईना है। राज्यमंत्री ओटाराम देवासी के क्षेत्र की कालंद्री इस सूची से बाहर रह गई। यह बात सिर्फ एक नाम छूटने भर की नहीं है यह मंत्री की राजनीतिक प्रभावशीलता पर सीधे सवाल खड़े करती है। सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि पंचायतराज विभाग के राज्यमंत्री होने के बावजूद ओटाराम देवासी अपने ही विधानसभा क्षेत्र को पंचायत समिति नहीं दिला पाए। यह बात किसी से छिपी नहीं कि कालंद्री जनसंख्या, भौगोलिक फैलाव और प्रशासनिक दृष्टि से एक स्वाभाविक इकाई बन चुकी है। आसपास की ग्राम पंचायतों के साथ इसकी दूरी कम है। स्थानीय बाजार बड़ा है और सरकारी विभागों की पहुंच व गतिविधियां पहले से ही इसे एक उप क्षेत्रीय केंद्र बनाती है। जनसंख्या की दृष्टि से भावरी व मंडार की तुलना में कालंद्री बराबरी पर या कई जगह बेहतर स्थिति में है। भौगोलिक स्थिति व प्रशासनिक आवश्यकता के लिहाज से भी कालंद्री बेहतर स्थिति में है। इन तथ्यों के आधार पर स्थानीय लोगों ने सूची में कालंद्री का नाम तय माना था।
मुंहबायें खड़े हैं सवाल, जो जवाब मांग रहे
यहां यह स्पष्ट दिखता है कि मुद्दा पार्टी का नहीं बल्कि राजनीतिक सक्रियता, लॉबिंग और प्रभाव का है। राजनीति में अक्सर ऐसे निर्णय संतुलन के नाम पर किए जाते हैं। कौन नेता मजबूत हो रहा है, किसे कितना देना है या किसे कितना रोकना है। कालंद्री को समिति नहीं बनाने के पीछे भी कमोबेश ऐसे ही किसी संतुलन का खेल नजर आता है। सवाल तो यह भी है कि रेवदर में मंडार को समिति देकर सरकार ने जहां कांग्रेस विधायक के लिए रास्ता खोल दिया, वहीं भाजपा में अपने ही विभाग के राज्यमंत्री के लिए रास्ता संकुचित कर दिया तो आखिर क्यों।
सवाल कुछ ये भी कि आखिरी समय में कालंद्री की फाइल रोक दी गई अथवा कोई और क्षेत्रीय दबाव था या जानबूझकर सूची से नाम हटाया गया। ये सभी सवाल मुंहबायें खड़े हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि आसपास के प्रभावशाली नेता नहीं चाहते कि कालंद्री को समिति का दर्जा मिले, क्योंकि इससे स्थानीय शक्ति समीकरण बदलते हैं। कुछ का मानना है कि राज्यमंत्री के अपने ही संगठनात्मक रिश्ते कमजोर थे इसलिए उनकी मांग आगे नहीं बढ़ी। वैसे इन आरोपों की पुष्टि कोई खुलकर नहीं करता और यही राजनीति का धुंधला सच है।
वैसे सूत्र बताते हैं कि प्रस्ताव की प्रारंभिक प्रक्रिया में कालंद्री का नाम शामिल था और अधिकारी स्तर पर इसे मजबूत माना गया। परन्तु अंतिम अधिसूचना में नाम गायब होना राजनीतिक हस्तक्षेप का परिणाम ही प्रतीत होता है।







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