टेस्ट क्रिकेट की डगमगाती दीवार
टेस्ट क्रिकेट कभी पांच दिन की मानसिक साधना हुआ करता था, जहां बल्लेबाज घंटों क्रीज पर डटे रहते थे और गेंदबाज रणनीति से मुकाबला जीतते थे। आज वही प्रारूप दो दिन, तीन दिन में खत्म हो रहा है। टी ट्वेंटी...

टी-20 की तेज आंधी में क्रिकेट की आत्मा का संघर्ष
अजय अस्थाना,
वरिष्ठ पत्रकार
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टेस्ट क्रिकेट की पहली सांस उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में तब फूटी थी, जब इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के बीच पांच दिनों तक चलने वाला मुकाबला खेल की सर्वोच्च परीक्षा माना जाता था। तब क्रिकेट केवल खेल नहीं था, बल्कि धैर्य की साधना था। पांच दिन का समय मानो दो टीमों के बीच मानसिक शक्ति के मंथन का काल होता था और कई बार यह पांच दिन भी कम पड़ जाते थे, क्योंकि टीमों के पास अपने खेल को आकार देने के लिए समय ही समय होता था। मैच ड्रॉ हो जाना सामान्य बात थी और दर्शक भी इस लंबी प्रक्रिया का आनंद लेते थे।
आज स्थिति उलट चुकी है। भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच हाल में खेला गया एक टेस्ट मुकाबला दो दिन में समाप्त हो गया। इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया की ऐशेज जैसी दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित टेस्ट सीरीज में भी कई मैच मुश्किल से तीसरे दिन तक पहुंच पाए। यह वही प्रारूप है जिसके बारे में कहा जाता था कि पांच दिन भी कम पड़ते हैं, लेकिन अब दो दिन, तीन दिन में नतीजे निकले रहे हैं। इससे लगता है जैसे कहीं न कहीं क्रिकेट की आत्मा में कुछ टूट रहा है।
इसी संदर्भ में हाल ही में सम्पन्न भारत- दक्षिण अफ्रीका टेस्ट शृंखला से यह चिंता और गहरा गई है। पहला टेस्ट बुरी तरह हारने के बाद दूसरे टेस्ट में भी भारत को चार सौ से अधिक रन के हार झेलनी पड़ी। बल्लेबाज और गेंदबाज दोनों अपने सर्वोत्तम प्रदर्शन से दूर दिखाई दिए। भारतीय बल्लेबाजी दोनों पारियों में लड़खड़ा गई और गेंदबाज भी दक्षिण अफ्रीका की लय तोड़ने में असफल रहे। यह हार सिर्फ एक पराजय नहीं, बल्कि संकेत है कि टेस्ट मानसिकता की कमी अब परिणामों को भी असामान्य रूप से प्रभावित कर रही है।
टेस्ट क्रिकेट के वो स्वर्णिम दिन
टेस्ट क्रिकेट का स्वर्ण काल वह दौर था जब बल्लेबाज सिर्फ रन नहीं बनाते थे, बल्कि गेंदबाज के मन में भय भी पैदा करते थे। दिलीप वेंगसरकर का क्रीज पर डटकर खड़ा रहना आधुनिक क्रिकेट में दुर्लभ दृश्य बन चुका है। गुंडप्पा विश्वनाथ की सहज कला, सुनील गावस्कर का धैर्य, सचिन तेंदुलकर की तकनीक, राहुल द्रविड़ की चट्टान जैसी स्थिरता, वीवीएस लक्ष्मण की सत्रों तक पसीना छुड़ा देने वाली बल्लेबाजी, ये सब गुण उस समय की मानसिकता को दर्शाते थे। बल्लेबाज का लक्ष्य था कि वह गेंदबाज को थकाए, उसकी रणनीति को तोड़े और धीरे- धीरे मैच को अपने कब्जे में ले। कई विदेशी दिग्गज भी टेस्ट क्रिकेट को लंबी लड़ाई की तरह खेलते थे। डेविड बून का जिद्दी ठहराव, डेविड गोवर की शालीनता और गॉर्डन ग्रीनिज की दहाड़ गेंदबाजों में डर पैदा कर देती थी। यह वह युग था जब बल्लेबाज क्रीज को किला मानकर खड़े रहते थे। मैच की दिशा अक्सर उसी बल्लेबाज के इर्द गिर्द तय होती थी, जो क्रीज पर सबसे ज्यादा देर ठहर जाता था।
टेस्ट क्रिकेट का पूरा ढांचा ही पांच दिन की धीमी और स्थिर रणनीति पर आधारित था। पहला दिन विकेट का आकलन, दूसरा दिन पारी को आकार देना, तीसरे दिन मैच का संतुलन बदलना, चौथे दिन बढ़त मजबूत करना और पांचवें दिन परिणाम की तलाश। हर दिन का अपना अर्थ था और हर सत्र अपने आप में नई कहानी लेकर आता था।
सोच ही बदल दी टी-20 युग ने
लेकिन टी-20 युग के आगमन के साथ क्रिकेट की सोच बदल गई। अब बल्लेबाज के मन में धैर्य की जगह त्वरित आक्रमण की प्रवृत्ति हावी हो गई है। खिलाड़ी क्रीज पर आते ही बड़े शॉट खेलने के लिए उतावले दिखाई देते हैं। टी-20 की लोकप्रियता ने खेल की तकनीक को गति की दिशा में मोड़ दिया है। तकनीक व मानसिकता बदली तो स्वभाव भी बदल गया। अब बल्लेबाज का प्राथमिक लक्ष्य टिकना नहीं, बल्कि जोरदार शुरुआत करना होता है और यही मानसिकता टेस्ट क्रिकेट को अंदर से घुन की तरह खा रही है।
आज की पीढ़ी के खिलाड़ी लगातार तेज क्रिकेट खेलने के अभ्यस्त हैं। वे अपने बचपन से लेकर पेशेवर स्तर तक सीमित ओवरों के अनेक प्रारूप खेलते आए हैं, जहां हर गेंद पर रन बनाने का दबाव उनके अवचेतन में अंकित हो चुका है। उन्हें लंबा खेलने की मानसिक आदत बनी ही नहीं है। बल्लेबाजी के पुराने गुर जैसे गेंद छोड़ देना, क्रीज पर खुद को सेट करना, गेंदबाज की लय को बिगाड़ना, स्पिन की दिशा पढ़ना और स्विंग की धार समझना, इन सब कौशल की आवश्यकता ही कम हो गई है। यही कारण है कि टेस्ट जैसे धैर्य प्रधान प्रारूप में जब वे खेलते हैं तो अक्सर जल्दबाजी में विकेट गंवा बैठते हैं।
व्यस्त कैलेण्डर व तेज पिचें भी कम घातक नहीं
तेज पिचें और व्यस्त कैलेण्डर भी इस समस्या को बढ़ा रहे हैं। क्रिकेट बोर्ड सीमित ओवरों की सीरीज को ज्यादा प्राथमिकता देते हैं, क्योंकि इनसे आर्थिक लाभ अधिक होता है। खिलाड़ी भी फ्रेंचाइजी क्रिकेट में अधिक समय बिताते हैं, जिससे तकनीकी कमियों पर ध्यान देने का समय कम मिलता है। गेंदबाजों की रफ्तार जरूर बढ़ गई है, लेकिन बल्लेबाजों की मानसिक मजबूती प्रायः नजर नहीं आ रही।
टेस्ट मैचों का दो- तीन दिन में सिमट जाना, केवल बल्लेबाजों के कारण नहीं है बल्कि गेंदबाज भी अब टेस्ट की रणनीति से हटकर सीमित ओवरों की तेज धार का प्रयोग अधिक करते हैं। पहले गेंदबाज बल्लेबाज को थकाने के लिए लंबे स्पेल फेंकते थे, फील्ड सेटिंग सूक्ष्म होती थी और बल्लेबाज को गलती करवाने की प्रक्रिया धीरे- धीरे बनाई जाती थी। आज के गेंदबाज भी वही धमाकेदार परिणाम जल्दी चाहते हैं जो टी-20 में मिल जाते हैं। इस कारण टेस्ट में आवश्यक रणनीतिक विस्तार कम हो गया है।
पुराने समय के टेस्ट मैच कहीं अधिक धीमे खेल जाते थे। कई बार पांच दिन में तीन पारियां भी पूरी नहीं हो पाती थीं। दोनों टीमों को दो- दो पारियां मिलती थीं, लेकिन अक्सर मैच ड्रॉ पर समाप्त होता था। यह ड्रॉ उस समय विफलता नहीं, बल्कि कौशल की गहराई का प्रतीक माना जाता था। दर्शक हार-जीत की आकांक्षा के बजाए पांच दिन तक खेल की कलात्मकता का आनंद लेते थे।
आज परिणाम जल्दी मिल रहे हैं, लेकिन यह उतावलापन टेस्ट क्रिकेट की आत्मा को खरोंच रहा है। केवल मनोरंजन की भूख और व्यावसायिक दबावों ने इस प्रारूप को भारी क्षति पहुंचाई है। टेस्ट क्रिकेट का मतलब हमेशा से रहा है कि कौन खिलाड़ी पांच दिन तक मानसिक रूप से टिक सकता है, कौन टीम लंबे प्रारूप में रणनीति को आकार दे सकती है और कौन गेंदबाज बल्लेबाज की एक छोटी सी गलती को पहचानकर मैच की दिशा बदल सकता है।
अब सवाल यह है कि क्या टेस्ट क्रिकेट का भविष्य सुरक्षित है? दर्शकों की संख्या घट रही है, मनोरंजन का स्वरूप बदल चुका है, युवा वर्ग तेजी और शक्ति से भरे खेलों की ओर आकर्षित है और क्रिकेट बोर्ड भी अधिकतर तात्कालिक लाभ की ओर झुक रहे हैं। अगर यही रफ्तार जारी रही तो वह दौर दूर नहीं जब टेस्ट मैच केवल इतिहास की पुस्तक का हिस्सा बनकर रह जाए।
हमें यह स्वीकार करना होगा कि टेस्ट क्रिकेट केवल प्रारूप नहीं है बल्कि क्रिकेट की आत्मा है। यह वही मैदान है, जहां तकनीक का कठोर परीक्षण होता है, जहां मानसिक शक्ति का असली मूल्यांकन होता है और जहां खिलाड़ी अपने चरम कौशल के साथ खेल की कहानी लिखते हैं। अगर इस प्रारूप का अस्तित्व कमजोर हुआ तो क्रिकेट की गहराई भी कमजोर हो जाएगी।
आवश्यक यह है कि खिलाड़ियों को टेस्ट मानसिकता की ट्रेनिंग दी जाए व पिचों को संतुलित बनाया जाए। कैलेण्डर ऐसा बने कि खिलाड़ी पांच दिन के प्रारूप के अनुरूप तैयारी कर सकें और क्रिकेट बोर्ड टेस्ट मैचों को वह सम्मान दें जो इस प्रारूप का मूल स्वभाव है।
टेस्ट क्रिकेट आज सबसे कठिन मोड़ पर खड़ा है। एक तरफ तेज रफ्तार का आकर्षण है और दूसरी तरफ खेल की वह गहरी आत्मा जो पांच दिन की साधना में प्रकट होती है। यदि संतुलन नहीं साधा गया तो भविष्य में टेस्ट क्रिकेट का सूरज धुंधला पड़ सकता है और यह खेल अपनी गहराई खो देगा।






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