आलोचक का दृष्टिकोण और कविता का सत्य
कविता केवल शब्दों का संग्रह नहीं, भाव जगत का अनुभव है। आलोचक रचना के बाहर खड़ा है। वह रचना को बुद्धि से समझता है, भाव जगत में रचना के सत्य तक पहुंच पाना उसके लिए कठिन है। यह आलेख रचना और आलोचना के...

अभिव्यक्ति
दिनेश सिंदल,
कवि व लेखक
डाकिए के थैले में बहुत तरह के पत्र होते हैं। मिलन के, वियोग के, सुख के, दुख के, प्रेम- पत्र और मनी- ऑर्डर भी होते हैं। उसका काम सबको बांटना है। उन पत्रों के प्रेम, सुख- दुख से डाकिया प्रभावित नहीं होता। उसके पास रखे मनी- ऑर्डर में से एक पैसा भी उसका नहीं होता। आलोचक का काम भी लगभग डाकिए जैसा है। इधर-उधर की किताबों से आया ज्ञान यानी कि उधार का ज्ञान बांटना। वह बुद्धि से सुनता है, हृदय से नहीं। आलोचक का ज्ञान भी ऐसा ही है।
बुद्धि से सुनने/पढ़ने वाला रचना की अच्छी व्याख्या तो कर सकता है, उसके अर्थ दूसरों को समझा भी सकता है, किंतु उस रचना को पढ़ कर वह स्वयं रूपांतरित नहीं हो सकता। हृदय से सुनने वाला उसके भाव में बहकर रूपांतरित हो सकता है, किंतु वह समझा नहीं सकता। अपने इस अनुभव को दूसरों तक नहीं पहुंच पाता।
एक बार चार्ली चैपलिन ने कहा था कि कविता दुनिया को लिखे गए खूबसूरत प्रेम- पत्र की तरह होती है। ठीक ही कहा था। कविता मन की तरंग की तरह होती है। हम जिस तरह से प्रेम- पत्र में खामियां नहीं ढूंढते, बल्कि पत्र के भीतर हर एक शब्द में पिरोए खूबसूरत अहसास और उसमें महकती प्रेम की गहराई को महसूस करते हैं। वही बात कविता पर भी लागू होती है। कविता मेरे लिए किसी आलोचना से परे होती है। जब हम कहते हैं कि सभी का अनुभूत सत्य अलग है। उसका निजी है। सवाल ये उठता है कि फिर रचनाकार के सत्य तक आलोचक कैसे पहुंचता है? कविता को कविता की तरह स्वीकार किया जाना चाहिए और उसका स्वागत किया जाना चाहिए।
आलोचक कविता को तर्क से पकड़ना चाहता है, किंतु कविता को कसकर पकड़ा नहीं जा सकता। जिस तरह फूल को आप जितना कस कर पकड़ोगे, उसका सौंदर्य नष्ट हो जाएगा। ठीक उसी तरह कविता को भी आप तर्कों के तराजू में मत तोलो, उसे महसूस करो।
एक होता है हौज। एक होता है कुआं। हौज को बाहर से पत्थर, गारा, मिट्टी लाकर दीवारें चुन कर बनाया जाता है। फिर उसमें बाहर से पानी लाकर डाला जाता है। वो उसका स्वयं का पानी नहीं होता। कुएं के लिए हम कंकड़, पत्थर, मिट्टी बाहर निकालते हैं। तब उसमें जल का सोता स्वतः फूटता है। कुएं का जल उसके भीतर से निकला जल होता है।
ज्ञान भी दो तरह का होता है। एक हौज के जल की तरह, एक कुएं के जल की तरह। आलोचक के पास हौज के जल वाला ज्ञान होता है। जो कुछ समय बाद सड़ने भी लगता है। रचनाकार के पास कुएं के जल की तरह का ज्ञान होता है जो उसके भीतर से प्रस्फुटित होता है। एकदम ताजा, नित नूतन एवं अनंत संभावनाओं वाला। आलोचक का ज्ञान उधार का ज्ञान है, रचनाकार का ज्ञान उसका आत्मबोध है। आलोचक के पास एक और एक मिलकर दो होते हैं, किंतु रचनाकार के पास एक और एक मिलकर ग्यारह भी हो सकते हैं। ये संभावनाएं ही रचनाकार व रचना के प्रति आकर्षण पैदा करती है। उसे नित नूतन रखती है। उसे बासी नहीं होने देती।
एक साधारण मनुष्य अपने जगत को ज्ञानेंद्रिय के माध्यम से जानता है। किसी वस्तु के संपर्क में आने पर उसकी ज्ञानेंद्रिय प्रतिक्रिया व्यक्त करती है, संवेदित होती हैं। यह संवेदना उसे उद्वेलित करती है और उस वस्तु के प्रति एक प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है। या कहे की भाव उत्पन्न होता है। यानी कि भाव इस भौतिक जगत के प्रति व्यक्ति की सबसे पहली प्रमाणिक प्रतिक्रिया है। जिसका कोई आकार नहीं है, रूप नहीं है। कवि भाव की उस आरंभिक अवस्था को जानता है।
एक कवि के लिए विचारधारा से बड़ा दर्शन है और दर्शन से भी बड़ी है जीवन दृष्टि, जो हर कवि को आमद करनी होती है। कविता के लिए विचार, विचारधारा, दर्शन यह सभी बाहरी उपकरण है। अच्छी कविता सभी विचारधाराओं का अतिक्रमण करती है। प्रगतिवाद, पूंजीवाद, गांधीवाद, धर्म, जाति, नस्ल से परे वह सीधे जीवन से जोड़ती है। जीवन की घटना महत्वपूर्ण है। इसे नियंत्रित करने वाले नियम नहीं है।
कविता मुख्य रूप से भावों का खेल है। भावों से बनी व हृदय को संबोधित कविता के पास हम विचारों के लिए नहीं जाते। विचार तो दूसरी जगह पर ज्यादा प्रभावशाली व स्पष्ट मिल जाएंगे। कविता में और कला में भाव ही प्रधान होते हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो सारे विचारक बड़े कवि हो जाते। कविता भावों का भूगोल है। अनेक भाव अकेले या एक दूसरे के साथ मिलकर व्यक्ति के आंतरिक जीवन को या व्यक्तियों के परस्पर संबंधों को उद्घाटित करते हैं।
जैसे अचानक हमारी दृष्टि किसी ऐसे फूल पर पड़े जैसा हमने पहले कभी नहीं देखा हो, तो उसे देखते ही हम अवाक रह जाते हैं। कुछ पल तक विचार शून्य होकर उसे देखते रहते हैं। यह भाव की स्थिति है। उसके बाद उसका रंग, उसका आकार, उसकी खुशबू से हमारा सरोकार होता है। यही से विचार पैदा होता है। यह कुछ समय अचानक देख कर अवाक हो जाना यह भाव की दशा है। विचार की यात्रा बाद में शुरू होती है। वह वस्तु मेरे लिए कितनी उपयोगी है। समाज के लिए कितनी उपयोगी है। कौन से नैतिक मूल्यों की स्थापना करेगी इत्यादि।
साहित्य का अवमूल्यन
यह समझना और समझाना, की रचना में क्या कहा गया है? कैसे कहा गया है? और उसका समाज, साहित्य या जीवन से क्या संबंध है? यह काम तो आलोचक कर सकता है, लेकिन क्या वह रचना के सत्य तक पहुंच सकता है? क्योंकि रचना का सत्य केवल एक तथ्य नहीं होता। वह लेखक के अनुभव, संवेदना और कल्पना का मिश्रित रूप होता है।
आलोचक रचना का पाठक भी है और व्याख्याकार भी। वह रचना के बाहर खड़ा होकर उसे देखने की कोशिश करता है। इसीलिए वह रचना के पूर्ण सत्य तक नहीं पहुंच सकता। वह रचना के संभावित सत्यों का अनावरण कर सकता है।
साथ ही हर आलोचक का दृष्टिकोण अलग होता है। किसी का सामाजिक, किसी का मनोवैज्ञानिक, किसी का दार्शनिक, इसीलिए रचना का सत्य बहुत स्तरीय प्रतीत होता है। जो सत्य एक आलोचक को दिखता है वह दूसरे को भी दिखे, यह जरूरी नहीं।
राजाओं का उजाला चेरा राजा की कविताओं में
आलोचक ने चित्र उकेरा राजा की कविताओं में
सत्ताओं के नियम-कायदे रहे मछलियों के प्रतिकूल
और सुविधा में रहा मछेरा राजा की कविताओं में






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