धर्मेंद्र : सिनेमा का जन्मजात नायक
धर्मेंद्र केवल अभिनेता नहीं थे, भारतीय सिनेमा की आत्मा थे। छह दशकों से अधिक के उनके करियर ने रोमांस, एक्शन और करिश्मे की नई परिभाषाएं गढ़ीं। राजनीति में उनका सफर छोटा रहा, पर पर्दे पर उनकी चमक सदैव...

सिनेमा के अमर सितारे को भावभीनी श्रद्धांजलि
सुधांशु टाक,
लेखक, समीक्षक
बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता रहे, ‘ही-मैन’ के नाम से मशहूर सुपर स्टार धर्मेंद्र का बीते 24 नवंबर को निधन हो गया। वे इसी साल 8 दिसंबर 2025 को अपना 90 वां जन्मदिन मनाने वाले थे। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। उनके निधन के साथ ही उनके छह दशक से ज़्यादा लंबे करियर का भी अंत हो गया। धर्मेंद्र को हमेशा उनकी सुंदरता, धमाकेदार स्क्रीन प्रेजेंस, उनके बेमिसाल अभिनय और विनम्र स्वभाव के लिए जाना व सराहा जाता था।
धर्मेंद्र एक बेहद ईमानदार इंसान थे। उन्होंने कभी भी अपनी कमियों को छिपाने की कोशिश नहीं की। लोग अक्सर अपनी कमजोरियों को ढकते हैं, लेकिन धर्मेंद्र ऐसे न थे। वे खुलकर अपनी कमियों पर बात करते थे। धर्मेंद्र की सबसे बड़ी कमजोरी रही शराब। अपनी शराब पीने की लत के लिए वे कुख्यात थे। बताते हैं कि फिल्म ‘शोले’ की शूटिंग के दौरान वह एक दिन में बीयर की 12 बोतल पी गए थे। धर्मेंद्र ने एक इंटरव्यू में बताया था, ‘मैं कैमरामैन के पीछे बैठकर चुपके से स्टाफ द्वारा लाई गई शराब पी लेता था। जब प्रोडक्शन स्टाफ ने टोकते हुए मुझे बताया कि मैंने अब तक 12 बोतल बियर पी ली हैं, तो मैं हैरान रह गया।’
इसी क्रम में उन्होंने बताया था कि नशे में उन्होंने अपने पिता तक का कॉलर भी पकड़ लिया था, जिसका उन्हें मरते दम तक अफसोस रहेगा। धर्मेंद्र ने उस घटना को याद करते हुए बताया था, ‘मैं जवान और नासमझ था, लेकिन जिंदगी का सलीका कुछ ऐसा है कि वह आपको नीचा दिखाने की भी कोशिश करती है, मैंने जिंदगी के सबक मुश्किलों से सीखे हैं।’
धर्मेंद्र राजनीति में भी सक्रिय रहे। उन्होंने 2004 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर बीकानेर से चुनाव लड़ा। ये चुनाव काफी चर्चित भी रहा, क्योंकि तब धर्मेंद्र सिने वर्ल्ड के जाने माने सुपर स्टार थे। धर्मेंद्र पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के काफी करीबी माने जाते थे। कहा जाता है कि यह रिश्ता राजनीति से परे एक व्यक्तिगत मित्रता का था। वाजपेयी जी उनकी फिल्मों के भी प्रशंसक थे। शुरू में तो उन्होंने बीकानेर की जनता के लिए काम करने की कोशिश की। स्थानीय मुद्दों को उठाया, लेकिन बाद में उनकी सक्रियता कम होती चली गई। फिर 2009 में धर्मेंद्र ने सांसद के तौर पर अपने पहले कार्यकाल के बाद सक्रिय राजनीति से खुद को दूर कर लिया।
असल में धर्मेंद्र का पहला और सबसे बड़ा प्यार अभिनय ही रहा। वह फिल्मों की ओर वापस मुड़ना चाहते थे। परिवार के साथ समय बिताना चाहते थे। राजनीति की व्यस्त दिनचर्या और सार्वजनिक जीवन की पाबंदियां उन्हें रास नहीं आईं।
धर्मेंद्र का जन्म 8 दिसंबर 1935 को पंजाब के लुधियाना जिले के नसराली गांव में एक साधारण स्कूल हैडमास्टर के घर में हुआ था। 1958 में ‘टैलेंट हंट’ प्रतियोगिता में भाग लेकर वे चर्चा में आए। फिर 1960 में फिल्म ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’ से डेब्यू किया। 1961 में ‘शोला और शबनम’ से सफलता की जो चिंगारी भड़की, उसने 1962 में ‘अनपढ़’ और 1963 में ‘बंदिनी’ की जादुई सफलता से शोला में बदल गई। इस दशक में धर्मेंद्र रोमांटिक स्टार बने रहे।
1970 का दशक शुरू हुआ और धर्मेंद्र बन गए एक्शन किंग। मेरा गांव मेरा देश (1971) ने उन्हें रफ-टफ बागी बना दिया, एक और फिल्मफेयर नॉमिनेशन उन्हें मिला। फिर आया स्वर्ण युग, सीता और गीता (1972), हेमा मालिनी की डबल रोल वाली धमाकेदार हिट; यादों की बारात (1973), सलीम-जावेद की पहली ‘मसाला’ ब्लॉकबस्टर; जुगनू (1973), एक और चार्टबस्टर, लेकिन कोई भी फिल्म सर्वकालिक महान, कल्ट ‘शोले’ (1975) को मात नहीं दे सकी। वीरू के रूप में, अमिताभ बच्चन के जय के साथ हंसी-मजाक करते धर्मेंद्र ने जो डायलॉग दिए वो पीढ़ियों तक गूंजते रहेंगे। उस वक्त भारत की सबसे ज्यादा कमाई वाली फिल्म ‘शोले’, कुछ थिएटर्स में पांच साल तक चली। 1970 और 1980 के दशक धर्मेंद्र के लिए कामयाबी भरे थे: इसी दशक में 1987 में धर्मेंद्र ने बैक टू बैक 7 हिट फिल्में ‘इंसानियत के दुश्मन’, ‘लोहा’, ‘हुकूमत’, ‘आग ही आग’, ‘वतन के रखवाले’, ‘मर्द की जुबान’ और ‘जान हथेली पे’ देकर समीक्षकों को अचंभित कर दिया था। उनके जीवनकाल में कुल 74 फिल्में हिट रहीं, जिनमें 7 ब्लॉकबस्टर और 13 सुपरहिट थी।
पद्म भूषण (2012) से सम्मानित धर्मेंद्र ने न केवल मनोरंजन दिया, बल्कि अपने बेटों सनी देओल और बॉबी देओल को इंडस्ट्री में स्थापित भी किया। ‘यमला पगला दीवाना’ नामक फिल्मों की सीरीज के माध्यम से वे अपने अंतिम दिनों तक सक्रिय रहे। हां राजनीति में उनकी विफलता एक सबक दे गई, कि हर मंच के लिए अलग अभिनय चाहिए।
धर्मेंद्र चले गए, लेकिन उनकी मुस्कान, उनका जोश पर्दे पर जिंदा रहेगा। कुछ लोग सिनेमा के लिए ही जन्मे होते हैं, और धर्मेंद्र वही थे। राजनीति ने उन्हें न निगला, न चमकाया। बस एक छोटा सा अध्याय जोड़ा। और शायद यही जीवन का संतुलन है।
“राजस्थान टुडे” परिवार की ओर से धर्मेंद्र की पुनीत आत्मा को विनम्र श्रद्धांजलि। शत- शत नमन..






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