बेवजह मुस्कुराने का संकल्प
मुस्कुराने के मकसद न ढूंढो, वर्ना ज़िन्दगी यूँ ही गुज़र जाएगी। कभी बेवजह भी मुस्कुरा के देखो— तुम्हारे संग ज़िन्दगी भी...

अपनी बात
मैं आपसे एक छोटा-सा सवाल पूछना चाहता हूँ।
बड़ा नहीं है, मुश्किल भी नहीं।
आप मुस्कुराते कब हैं?
अक्सर जवाब यही होता है—
जब सब ठीक चल रहा हो।
जब कोई अच्छी खबर मिले।
जब हालात हमारे मन के मुताबिक हों।
यानी, हमने मुस्कान को
किसी उपलब्धि की तरह टाल दिया है।
पहले ज़िन्दगी हमें पास करे,
फिर हम मुस्कुराएं।
लेकिन ज़िन्दगी
इस परीक्षा का सिलेबस
हमें कभी पहले नहीं बताती।
नव वर्ष की देहरी पर
यह सवाल इसलिए और ज़रूरी हो जाता है,
क्योंकि नया साल
सिर्फ़ तारीख़ बदलने का नाम नहीं होता।
यह खुद से
थोड़ा ईमानदार होने का मौका होता है।
नया साल, वही पुरानी शर्तें
हर नए साल के साथ
हम संकल्पों की एक सूची बनाते हैं।
अच्छी नौकरी,
ज़्यादा पैसा,
बेहतर सेहत,
मजबूत रिश्ते।
लेकिन इन सबके बीच
एक चीज़ लगभग हर बार छूट जाती है—
खुद के प्रति नरमी।
हम अपने लिए
सबसे सख़्त जज बन जाते हैं।
थक जाएं तो भी
खुद को आराम की इजाज़त नहीं देते।
गलती हो जाए तो
उसे उम्र भर ढोते रहते हैं।
और फिर कहते हैं—
मैं खुश क्यों नहीं हूं?
खुशी को शर्तों में मत बांधिए
हमने खुशी को
“अगर–तो” की भाषा में बांध दिया है।
अगर यह मिल गया—तो खुश।
अगर वह हो गया—तो मुस्कान।
अगर हालात सुधर गए—तो चैन।
लेकिन ज़िन्दगी
इन शर्तों पर चलती नहीं।
वह अपने ढंग से चलती है—
कभी बोझ देती है,
कभी खालीपन,
कभी अचानक नुकसान।
ऐसे में अगर
मुस्कान का इंतज़ार
“सब ठीक होने” तक करेंगे,
तो यह इंतज़ार
कभी खत्म नहीं होगा।
शायद इसीलिए
नया साल
हमसे धीरे से कहता है—
बेवजह मुस्कुराना सीखिए।
बेवजह मुस्कुराना कोई भोला भाव नहीं
अक्सर यह समझ लिया जाता है
कि मुस्कुराना
तब ठीक है
जब ज़िन्दगी आसान हो।
लेकिन सच यह है—
मुश्किल समय में मुस्कुराना
कमज़ोरी नहीं,
साहस है।
यह दुख से मुंह मोड़ना नहीं है।
यह आंखें बंद करना नहीं है।
यह कहना है—
हालात मुझसे बड़े नहीं हैं।
मुस्कान
ज़ख्म नहीं मिटाती,
लेकिन मरहम बन जाती है।
यह दर्द को नकारती नहीं,
बस उसे अकेला नहीं छोड़ती।
बीता साल, और भीतर की थकान
मैं जानता हूं—
पिछला साल
कई लोगों के लिए भारी रहा।
किसी ने अपनों को खोया।
किसी ने भरोसा खोया।
किसी ने खुद पर विश्वास।
कई बार हम
नए साल की शुभकामनाएं देते हैं,
लेकिन भीतर से
खाली होते हैं।
ऐसे में मैं यह नहीं कह रहा
कि मुस्कान से
सब ठीक हो जाएगा।
मैं बस इतना कह रहा हूं—
मुस्कान खुद के साथ खड़े रहने का तरीका है।
रिश्तों की शुरुआत, एक मुस्कान से
नया साल
रिश्तों को भी
एक मौका देता है।
लेकिन रिश्ते
लंबे वाक्यों से नहीं,
छोटे इशारों से संवरते हैं।
बात शुरू करने से पहले
एक मुस्कान।
आप देखेंगे—
आधी कटुता
वहीं पिघल जाएगी।
क्योंकि मुस्कान
यह कहती है—
मैं तुमसे जीतने नहीं,
तुम्हारे साथ चलने आया हूं।
समाज को भी मुस्कान की ज़रूरत है
आज का समय
ग़ुस्से और जल्दबाज़ी से भरा है।
हम सुनने से पहले
फैसले कर लेते हैं।
ऐसे माहौल में
बेवजह मुस्कान
एक छोटा-सा मानवीय हस्तक्षेप है।
यह कोई कमजोरी नहीं,
यह यह कहना है—
मैं इस कठोरता का हिस्सा नहीं बनूंगा।
अगर हम
अजनबी से,
सहकर्मी से,
घर के लोगों से
थोड़ी नरमी बरतें—
तो समाज
थोड़ा कम सख़्त हो सकता है।
ज़िन्दगी से पहले, अपनी तरफ़ से पहल
ज़िन्दगी
पहले खुशियां नहीं देती।
वह हमारी प्रतिक्रिया देखती है।
जब आप
हालात से पहले
मुस्कान चुनते हैं,
तो ज़िन्दगी से कहते हैं—
मैं तैयार हूं।
संघर्ष के लिए भी।
सीखने के लिए भी।
और जीने के लिए भी।
आख़िर में, अपनी बात
इस नए साल
कोई बड़ा वादा मत कीजिए।
कोई असंभव लक्ष्य मत तय कीजिए।
बस इतना तय कर लीजिए कि—
आप मुस्कान के लिए
वजहें नहीं ढूंढेंगे।
कभी सुबह उठते हुए,
कभी थकान के बीच,
कभी यूं ही—
शायद यही छोटी-सी आदत
इस साल को
थोड़ा कम बोझिल
और ज़्यादा मानवीय
बना दे।
नव वर्ष मंगलमय हो।






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