स्वास्थ्य की ओर पहला कदम
नया साल केवल तारीख का बदलाव नहीं बल्कि जीवनशैली में सुधार का अवसर भी है। यह आलेख अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड के बढ़ते खतरे उनके स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव और वैज्ञानिक शोधों के आधार पर सुरक्षित विकल्पों की ओर...

नए साल का नया संकल्प : अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड से दूरी
ज्ञान चंद पाटनी,
वरिष्ठ पत्रकार
Table Of Content
नए साल का आगाज उत्साह और उमंग का समय है। इस मौके पर अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव के लिए कोई संकल्प लेना बेहतर भविष्य के निर्माण में मददगार साबित हो सकता है। आप भी अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (यूपीएफ) यानी अति—प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों से दूरी का संकल्प लेकर कई तरह के रोगों से बच सकते हैं और बेहतर स्वास्थ्य की नींव डाल सकते हैं।
यूपीएफ ने आधुनिकता और सुविधा के नाम पर हमारी जीवनशैली में गहरी पैठ बना ली है। अब तो शहर ही नहीं गांव के बाजार भी ऐसे खाद्य पदार्थों के चमकते पैकेटों से अटे पड़े हैं। यूपीएफ उद्योग कुछ चुनिंदा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों में है। ये उत्पाद इतने स्वादिष्ट होते हैं कि लोग बार-बार खाने को मजबूर हो जाते हैं। आक्रामक मार्केटिंग से पारंपरिक पोषक तत्वों वाले भोजन को हेय बना दिया गया है। इसके दुष्प्रभाव नजर आ रहे हैं। भोजन पर ज्यादा खर्च करने के बावजूद लोग बीमार हो रहे हैं। अधिकांश लोग इस बात से अनजान हैं कि इनमें छिपे रसायन शरीर में पहुंचने के बाद जहर का काम करने लगते हैं। इसलिए स्वास्थ्य विशेषज्ञ ऐसे खाद्य पदार्थों को लेकर लगातार चेतावनी दे रहे हैं, लेकिन हर वर्ग तक इन्होंने इतनी गहरी पैठ बना ली है कि नुकसान की बात भी हवा में उड़ा दी जाती है। एक समय बाद व्यक्ति को गंभीर बीमारियां भी हो जाती हैं, जिससे उसे आर्थिक, शारीरिक और मानसिक कष्ट झेलने पड़ते हैं।
कैसे करें अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की पहचान
खाद्य पदार्थों को मुख्य रूप से नोवा वर्गीकरण प्रणाली के तहत चार समूहों में बांटा गया है। एक, अप्रसंस्कृत या न्यूनतम प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ जैसे फल, सब्जियां और दालें। दूसरा, खाना पकाने के लिए प्रसंस्कृत सामग्री (तेल, चीनी, नमक)। तीसरा, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ यानी प्रोसेस्ड फूड (जैम, डिब्बाबंद सब्जियां)। चौथा, अति प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ यानी अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड। अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड वे उत्पाद हैं जिन्हें कारखानों में जटिल मशीनरी और रासायनिक प्रक्रियाओं से तैयार किया जाता है। मूल खाद्य तत्वों के अलावा कृत्रिम स्वाद बढ़ाने वाले पदार्थ, रंग, गाढ़ापन प्रदान करने वाले इमल्सीफायर, प्रिजर्वेटिव, भारी मात्रा में चीनी, नमक तथा सेहत के नुकसान पहुंचाने वाली वसा यानी ट्रांस फैट जैसी चीजों की मदद से ये बनते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, अल्ट्रा प्रोसेस्ड चीजों के कुछ उदाहरण हैं-कार्बोनेटेड कोल्ड ड्रिंक, मीठे या नमकीन स्नैक्स, कैंडी, ब्रेड, बिस्किट, पेस्ट्री, केक, फ्रूट योगर्ट, रेडी टू ईट मीट, पास्ता, पिज्जा, सॉसेज, बर्गर, हॉट डॉग, इन्स्टेंट सूप, इन्स्टेंट नूडल्स। इनका निर्माण घरेलू रसोई में संभव नहीं हैं। इनको कारखानों में ही तैयार किया जा सकता है। चिंता की बात यह है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड हानिकारक है, लेकिन बाजार में ये ‘स्वास्थ्यवर्धक’ लेबल के साथ बिकते हैं और लोग चाव से इनका इस्तेमाल करते हैं।
स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव
ये खाद्य पदार्थ उच्च कैलोरी प्रदान करते हैं लेकिन पोषण के मामले में लगभग जीरो होते हैं। इनमें फाइबर और प्रोटीन की कमी होती है। लैंसेट जर्नल में छपे एक अध्ययन और दूसरे कई शोधों में पाया गया है कि मधुमेह, हृदयाघात, स्ट्रोक, कैंसर, डिप्रेशन जैसी गंभीर बीमारियों के लिए इस तरह का खान—पान भी जिम्मेदार है। ऐसे खाद्य पदार्थों में पाया जाने वाला ट्रांस फैट सबसे खराब माना जाता है, क्योंकि यह ‘खराब’ कोलेस्ट्रॉल (एलडीएल) बढ़ाता है और ‘अच्छे’ कोलेस्ट्रॉल (एचडीएल) को घटाता है। दूसरी तरफ सैचुरेटेड फैट (घी, मक्खन, मांस) भी एलडीएल बढ़ाता है, पर इसे सीमित मात्रा में लिया जा सकता है। ज्यादा मात्रा में यह भी नुकसान करता है। ट्रांस फैट से तो पूरी तरह बचना चाहिए। इनमें चीनी और नमक भी बहुत ज्यादा इस्तेमाल होता है। अतिरिक्त चीनी लीवर को चर्बी युक्त बनाती है, जबकि सोडियम ब्लड प्रेशर बढ़ाता है। बच्चों में ये पदार्थ अटेंशन-डेफिसिट और हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर जैसी समस्याएं पैदा करते हैं। नींद की कमी और कमजोर इम्यूनिटी का कारण भी ऐसे खाद्य पदार्थ बनते हैं। महिलाओं में पीसीओडी और पुरुषों में इरेक्टाइल डिसफंक्शन जैसी समस्याएं भी ऐसे खानपान से बढ़ती हैं। ये खाद्य पदार्थ अल्जाइमर जैसी न्यूरोलॉजिकल समस्याओं का कारण भी बनते हैं।
शोधों का ढेर
वैज्ञानिक दुनिया में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स पर शोधों का ढेर लगा हुआ है, जो एक स्वर पर इनको सेहत के लिए नुकसानदेह बताते हैं। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में 2024 में प्रकाशित एक शोध में दावा किया गया था कि डाइट में इनकी मात्रा 10 प्रतिशत बढ़ने से मृत्यु जोखिम 14 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। हॉवर्ड यूनिवर्सिटी की 30 साल की स्टडी में पता चला है कि जो लोग नियमित रूप से अल्ट्रा प्रोसेस्ड मीट का सेवन करते हैं, उनमें समय से पहले मौत का खतरा 13 फीसदी ज्यादा बढ़ जाता है। यह स्टडी 1.14 लाख लोगों की खानपान की आदतों और जीवनशैली पर आधारित है। यह रिसर्च ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में पब्लिश हुई थी।
फ्लोरिडा अटलांटिक यूनिवर्सिटी (एफएयू) के चार्ल्स ई. श्मिट कॉलेज ऑफ मेडिसिन के शोधकर्ताओं ने एक बड़े अध्ययन में पाया कि जो लोग अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड अधिक मात्रा में खाते हैं, उनके शरीर में ‘हाई-सेंसिटिव सी-रिएक्टिव प्रोटीन’ का स्तर काफी अधिक होता है। यह एक महत्वपूर्ण सूजन संकेतक है, जो हृदय रोग और कैंसर जैसी बीमारियों का पूर्व संकेत देता है। शोधकर्ताओं ने पाया कि जो लोग अपनी कुल कैलोरी का 60 से 79 फीसदी हिस्सा अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड से लेते हैं, उनमें हाई-सेंसिटिव सी-रिएक्टिव प्रोटीन का स्तर सबसे ऊंचा था। डब्ल्यूएचओ की 2023 रिपोर्ट भी ऐसे खाद्य पदार्थों को क्रॉनिक रोगों का प्रमुख कारक बताती है। इसी तरह मद्रास डायबिटीज रिसर्च फाउंडेशन और इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर ) के 2023 के अध्ययन से पता चला है कि डायबिटिज की एक वजह अल्ट्रा— प्रोसेस्ड फूड भी है।
सरकार की क्या है भूमिका
इस उद्योग से अधिक राजस्व मिलता है, जिससे सरकार दबाव में रहती है। यूपीएफ को नियंत्रित करने के प्रयासों को विफल करने के पूरे प्रयास किए जाते हैं। यूपीएफ की खपत को कम करने के लिए सरकारी नीति में परिवर्तन जरूरी है। इसके लिए जनता को जागरूक होना होगा और सरकार पर दबाव बनाना होगा। स्वस्थ और टिकाऊ आहार को बढ़ावा देने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड की बिक्री बढ़ाने के लिए झूठे और लुभावने विज्ञापनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसलिए सरकार को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण को तो कड़ाई बरतनी ही होगी, भ्रामक विज्ञापनों के मामलों में भी कड़ी कार्रवाई करनी होगी। साथ ही जिस तरह तंबाकू उत्पादों पर चेतावनी लेबल अनिवार्य किए गए हैं, उसी तरह से ऐसी सामग्री पर लेबल लगाए जाने चाहिए। इस मामले में मेक्सिको मॉडल अपनाया जा सकता है।
क्या है मेक्सिको मॉडल
मेक्सिको ने अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड के इस्तेमाल को कम करने के लिए कई बड़े कदम उठाए हैं। वहां फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल (चीनी, नमक, वसा और कैलोरी के लिए) जरूरी किया गया है। स्कूलों में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड और मीठे पेय पदार्थों की बिक्री पर पूरी तरह प्रतिबंध है। वहां के स्कूलों में अब मौसमी फल, सब्जियां और पानी जैसी सुरक्षित चीजें ही ले जाई जा सकती हैं। अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड पर भारी टैक्स लगाया है। बच्चों को लक्षित करने वाले जंक फूड और सोडा के विज्ञापनों को नियंत्रित किया गया है। चेतावनी लेबल वाले उत्पादों पर कार्टून कैरेक्टर के इस्तेमाल पर रोक है। पैकेज्ड फूड पर काले रंग के अष्टकोणीय चेतावनी लेबल लगाना अनिवार्य कर दिया हैं। ऐसे लेबल अत्यधिक कैलोरी, चीनी, सोडियम, सेचुरेटेड फैट और ट्रांस फैट वाले उत्पादों पर लगाना अनिवार्य हैं, ताकि उपभोक्ताओं को स्वास्थ्य जोखिमों (जैसे मोटापा, मधुमेह) के बारे में सूचित किया जा सके। काले अष्टकोणीय लेबलों पर सफेद अक्षरों में चेतावनी लिखी होती है। जैसे ‘अतिरिक्त चीनी’, ‘अतिरिक्त सोडियम’, ‘अतिरिक्त संतृप्त वसा’, ‘अतिरिक्त ट्रांस वसा’, ‘अतिरिक्त कैलोरी’। बच्चों के लिए खास चेतावनी के लेबल होते हैं। यदि उत्पाद में कैफीन या कृत्रिम स्वीटनर हों, तो ‘इसमें कैफीन है- बच्चों को देने से बचें’ या ‘इसमें स्वीटनर हैं- बच्चों के लिए अनुशंसित नहीं’ जैसे लेबल भी होते हैं। इसे दुनिया की सबसे उन्नत लेबलिंग प्रणालियों में से एक माना जाता है। इन लेबलों ने उपभोक्ताओं को खरीदारी के निर्णय बदलने और अस्वास्थ्यकर उत्पादों की खपत कम करने में मदद की है। इन उपायों का उद्देश्य उपभोक्ताओं को स्वस्थ विकल्प चुनने में मदद करना और बीमारियों से बचाना है। मेक्सिको दुनिया के उन देशों में शामिल है जिसने इस समस्या की गंभीरता समझी है। भारत भी मेक्सिको से सीख सकता है।
हम अपने स्तर पर क्या करें
बीमारियों से बचने और शरीर को स्वस्थ रखने के लिए पोषण संबंधी जानकारी आवश्यक है। इसलिए जागरूक रहें। यदि अपनी सेहत की चिंता है तो अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की बजाय साबुत अनाज, ताजा फल-सब्जी और घरेलू भोजन पर ध्यान दें। इसमें कोई दोराय नहीं कि भारतीय रसोई में तैयार होने वाली थाली आदर्श है। दाल, सब्जी, रोटी, दही जैसे खाद्य पदार्थ शरीर के लिए सेहतमंद हैं। स्नैक्स के लिए भुना चना, मखाना जैसे खाद्य पदार्थों का इस्तेमाल कर सकते हैं। पेय में नींबू पानी, नारियल पानी, छाछ, लस्सी का उपयोग किया जा सकता है।
नए साल में ऐसा मेन्यू प्लान करें जिसमें कम से कम 80 प्रतिशत घर पर तैयार भोजन हो। जीवनशैली में व्यायाम भी जोड़ें, कम से कम 30 मिनट तक वॉक कर सकते हैं। इससे वजन कम होगा। डायबिटीज रिस्क घटेगा। ऊर्जा बढ़ेगी, त्वचा चमकेगी, नींद सुधरेगी। नया साल आपके जीवन में स्वास्थ्य क्रांति लाए। पोषक तत्वों से भरपूर भोजन से जीवन आनंदमय बने। आप संकल्प पक्का रखें, यानी अब अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड से रहेगी दूरी।






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