हेल्पलाइन पर हेलो, मैं खुद सरकार!
जयपुर सचिवालय में इन दिनों फोन की घंटी कुछ ज्यादा ही घबरा गई है। वजह भी जायज़ है। उसे उठाने वाला कोई बाबू नहीं, खुद मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा निकले! कॉलर ने गंदे नाले की शिकायत की तो उधर से आवाज आई...

बात बेलगाम
जयपुर सचिवालय में इन दिनों फोन की घंटी कुछ ज्यादा ही घबरा गई है। वजह भी जायज़ है। उसे उठाने वाला कोई बाबू नहीं, खुद मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा निकले! कॉलर ने गंदे नाले की शिकायत की तो उधर से आवाज आई “मैं मुख्यमंत्री बोल रहा हूं।” ये सुनकर शिकायतकर्ता भी कुछ पल को सोच में पड़ गया। नाला साफ करवाऊं या पहले अपने होश? 181 हेल्पलाइन का हाल भी अचानक बदल गया। वर्षों से शिकायतें सुनकर ऊंघते सिस्टम को जैसे करंट लग गया हो। जिस फोन पर अब तक “आपकी शिकायत दर्ज कर ली गई है” की टेप बजती थी, वह आज जीवित सरकार बनकर बोल उठा, “तुरंत हल करो!” अधिकारी भी पहली बार समझ पाए कि ‘तत्काल’ शब्द सिर्फ फाइलों में सजावट नहीं होता। जनता खुश है। कम से कम इस दिन तो राज संपर्क पोर्टल सच में जनता से ‘संपर्क’ में दिखा। डर बस इतना है कि कल को कोई कॉल उठाते ही बोले “मैं आपका मोहल्ला सुधारने आया हूं”… और सामने सच में मुख्यमंत्री खड़े मिलें!
अजमेर में फिर चमका पुराना ‘त्याग’
राजनीति भी अजीब कला है। कभी आंसू मांग लेती है, कभी मुस्कान उधार। अजमेर में अचानक पड़ा यह ठहराव मानो एक भावुकता-स्टेशन हो, जहां वसुंधरा राजे ने फिर याद दिलाया कि सत्ता उनकी नहीं, जनता की अलमारी में रखा वही पुराना “त्याग” है, जिसे हर चुनाव से पहले झाड़-पोंछकर पहन लिया जाता है।
‘हाऊ लक्की आई एम!’ सुनकर तो लगा जैसे किसी राजनेता की नहीं, किसी लॉटरी विजेता की आवाज़ गूंज उठी हो। वैसे भी राजनीति में सबसे बड़ा जैकपॉट जनता का प्यार ही तो है। जिसे कभी सेवा कहा जाता है, कभी नीति, और कभी बजट को घर की रसोई से जोड़कर। पर सबसे रोचक था “दो को लड़ाकर फायदा लेने वाले” वाला ज्ञान। इसे सुनकर विपक्ष भी मुस्कुराया होगा और पार्टी के भीतर वाले कई चेहरे चौंके होंगे, क्योंकि राजनीति में लड़ाई और फायदा अलग-अलग जेब में रखने का हुनर ज़्यादातर लोग बखूबी जानते हैं। कुल मिलाकर बातें ऐसी थीं कि देवता भी सोचें, कितनी भक्ति राजनेताओं में है और कितनी राजनीति भगवान के भरोसे चल रही है!
अब राजनीति बन गई है भांडा-फोड़ प्रतियोगिता
राजस्थान की राजनीति में रिफाइनरी ऐसा मुद्दा बन गया है, मानो घर की छत पर रखा वह पुराना डिब्बा हर सरकार खोलती है, झाड़ती है, अंदर झांकती है, पर काम कुछ नहीं निकलता। अशोक गहलोत ने फिर सवाल उठाया, “उत्पादन कब शुरू होगा?” यह सवाल अब इतना पुराना हो चुका है कि खुद रिफाइनरी भी शायद जवाब देने लगे, “मुझे भी नहीं पता भाई, मैं तो अभी बन ही रही हूं!” राजेन्द्र राठौड़ ने देरी का सारा ठीकरा गहलोत पर फोड़ दिया, जैसे राजनीति कोई भांडा-फोड़ प्रतियोगिता हो। एक सरकार 2024 कहती है, दूसरी 2025, और जनता सोचती है “साल लिखते हैं या जन्मपत्री?” लागत 38 हजार करोड़ से बढ़कर एक लाख करोड़ पहुंचने की खबरें हैं, पर कोई इसकी असली उम्र या खर्च नहीं बताता। शायद रिफाइनरी नहीं, यह चुनावी एटीएम मशीन हो। हर बार नया कैश, नया वादा, और नई तारीख। कुल मिलाकर रिफाइनरी शुरू हो न हो, बयानबाज़ी का उत्पादन राजस्थान में कभी बंद नहीं होता।
पेयजल योजना बनी पे-जल योजना
दूदू की पेयजल योजनाओं का हाल देखकर तो लगता है अधिकारियों ने पानी की जगह पेमेंट का नल खोल रखा था। सरकार ने सोचा था कि गांवों तक पेयजल पहुंचेगा, पर साहब लोगों ने उसे बदलकर सीधे पे-जल बना दिया। जहां पानी नहीं, सिर्फ पैसे बहते थे। नरैना के गांवों में नल सूखे रहे, पर फाइलें इतनी तर थीं कि देखें तो लगे बरसात हो रही हो। ऑपरेशन और मेंटेनेंस के नाम पर जो खेल चला, उसमें पाइपलाइन कम और पेमेंट लाइन ज़्यादा थी। 108 गांवों में तो पानी से ज़्यादा रकम का प्रवाह चला। मोटर बदलने से पहले मन बदलते थे और ठेकेदारों से पहले बिल पहुंच जाता था। ग्रामीणों की शिकायतें जब पहाड़ जितनी हो गईं, तब जांच दल पहुंचा और साबित कर दिया कि नल ही नहीं, नियत भी सूखी है। सरकार ने हड़बड़ाकर इंजीनियर साहब को एपीओ कर दिया। कम से कम कार्रवाई का बहाव तो शुरू हो! लेकिन गांव वाले आज भी नल पकड़कर बैठे हैं। साहब, पे–जल बहुत बह गया… अब सच में थोड़ा पेयजल भी बहा दो।
– बलवंत राज मेहता, वरिष्ठ व्यंग्यकार






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