युवा संकल्प से विश्वगुरु भारत
भारत के भविष्य की डोर उसकी युवा पीढ़ी के हाथों में है। तकनीक, शिक्षा, रोजगार, नैतिकता और नेतृत्व के मोर्चे पर युवाओं के सही संकल्प ही 2026 के बाद भारत को विश्वगुरु बनने की दिशा...

आजादी के सौवें वर्ष की ओर युवा भारत का संकल्प
राजेश कसेरा,
वरिष्ठ पत्रकार
Table Of Content
- आजादी के सौवें वर्ष की ओर युवा भारत का संकल्प
- बड़ा प्रश्न : युवाओं को किस दिशा में ले जा रहे?
- युवाओं की ताकत : जेन-Z ने खोल अपार संभावनाओं के दरवाजे
- शिक्षा : संभावनाएं कम, संकट ज्यादा
- बेरोजगारी : युवाओं की सबसे बड़ी परेशानी
- तकनीक और सोशल मीडिया : आभासी दुनिया के छलावे से दूरी जरूरी
- समाज : नैतिक मूल्यों का संकट सबसे ज्यादा उपजा
- नशा और अपराध : आज के दौर की कड़वी सच्चाई
- राजनीति : दशा-दिशा सुधारने को आगे आएं युवा
- आधी आबादी : युवा बेटियों को बहना होगा बदलाव की नई धारा में
- युवा पीढ़ी से देश की अपेक्षाएं
- 2026 को पहला और आखिरी रेजोल्यूशन
आखिर साल 2026 आ ही गया। 21वीं सदी के इस चौथाई काल में जितनी तेजी से हमने दुनिया को बदलते देखा है, उससे कहीं द्रुतगति से हम कुछ सालों में सबकुछ बदलते देखेंगे। जेन-Z के दौर में टेक्नोलॉजी ने इंसानों का स्थान लेना शुरू दिया तो मानवता के स्थापित मूल्यों को तेजी से पतन होते भी देखा। युवाओं में अध्यात्म के प्रति जागृति दिखी तो सामाजिक ताने-बाने को भी बिखरते देखा। जिन्दगी के असली मायने भी अंगुलियों में सिमट गए। रीयल लाइफ तक रील्स और शॉर्ट्स के 30 से 40 सेकण्ड में सिमट गई। इस दौर में सबसे ज्यादा चिंता यदि बढ़ाई है तो वह है युवा पीढ़ी में धैर्य और संवेदना के घटते मूल्यों ने। गुस्सा इनमें इस कदर हावी होता जा रहा है कि वे इंसान से ज्यादा खुद को एनिमल कहलाना पसंद करते हैं। अपराध को अंजाम देना उनकी हॉबी का हिस्सा बन गया है। सही और गलत का फासला इनमें इतनी तेजी से घटा कि उनको कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनका आने वाला समय किन चुनौतियों से गुजरेगा। हालांकि इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी काफी अद्भुत और आकर्षक है।
समय से आगे की सोच रखने वाले युवाओं ने अपनी दमदार प्रतिभा के बूते ऐसे इतिहास रच दिए जिनकी कल्पना तक नहीं की होगी। खासकर भारत के युवाओं ने जिस तरह से अपनी कुशलता का परिचय दिया उसने न केवल दुनियाभर का ध्यान अपनी ओर खींचा, बल्कि यह अनुभव भी कराया कि उनके शब्दकोष में असंभव या नामुमकिन जैसे तो शब्द ही नहीं। भविष्य की ऐसी ही आवाजें भारत का नाम इस तरह से गुंजायमान करेंगी कि विश्वगुरु बनने का जो सपना आंखों के सामने तैर रहा है, वह 2026 में धरातल पर साकार दिखेगा।
बड़ा प्रश्न : युवाओं को किस दिशा में ले जा रहे?
किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसकी युवा पीढ़ी के कंधों पर टिका होता है। इतिहास गवाह है कि जब-जब किसी देश ने प्रगति की ऊंचाइयों को छुआ, उसके पीछे युवाओं की ऊर्जा, सोच और साहस रहा। आज भारत विश्व का सबसे युवा देश है। हमारी आबादी का लगभग 65 फीसदी हिस्सा 35 वर्ष से कम आयु का है। यह आंकड़ा गर्व का विषय है, लेकिन साथ ही बड़ी गंभीर चुनौतियां भी हैं। प्रश्न केवल यह है कि हम युवाओं को किस दिशा में ले जा रहे हैं? आज की युवा पीढ़ी ऐसे दौर में जी रही है, जहां अवसर पहले से कहीं अधिक हैं, लेकिन भ्रम, दबाव और प्रतिस्पर्धा भी उतनी ही ज्यादा है। तकनीक ने दुनिया को हमारी हथेलियों में ला दिया, पर उसने भटकाने के रास्ते भी खोल दिए। ऐसे समय में यह समझना बेहद जरूरी है कि देश की युवा पीढ़ी की स्थिति, ताकत व समस्याएं क्या हैं और उससे राष्ट्र को क्या अपेक्षाएं हैं।
युवाओं की ताकत : जेन-Z ने खोल अपार संभावनाओं के दरवाजे
आज का युवा केवल विद्यार्थी नहीं रहा, वह वैज्ञानिक, खिलाड़ी, स्टार्ट-अप संस्थापक, सैनिक, कलाकार और सामाजिक कार्यकर्ता तक बन गया है। भारत के युवा आज अंतरिक्ष में पहुंच रहे हैं, ओलंपिक में पदक जीत रहे हैं, टेक्नोलॉजी में नए कीर्तिमान रच रहे हैं और वैश्विक मंच पर अपनी पहचान बना रहे हैं। भारत के पूर्व राष्ट्रपति और वैज्ञानिक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने कहा था, युवा शक्ति किसी राष्ट्र की असली ताकत होती है। आज देश में लाखों युवा स्टार्ट-अप शुरू कर आत्मनिर्भर भारत की रीढ़ बन रहे हैं और बेरोजगारी को चुनौती दे रहे हैं। डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, स्टार्ट-अप इंडिया जैसी योजनाओं में उनकी भूमिका निर्णायक बनती जा रही है। खेलों में देश का नाम रोशन कर रहे हैं। विज्ञान और तकनीक में दुनिया की नामी आईटी कंपनियों का नेतृत्व कर रहे हैं।
शिक्षा : संभावनाएं कम, संकट ज्यादा
युवा पीढ़ी की नींव शिक्षा पर टिकी होती है। आज शिक्षा के अवसर पहले से कहीं अधिक हैं। ऑनलाइन कोर्स, डिजिटल क्लास रूम, विदेशी विश्वविद्यालयों से जुड़ाव। लेकिन इसके साथ कई समस्याएं भी हैं। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अभाव है। बहुत से युवा ज्ञान और कौशल के बजाए केवल डिग्री के पीछे भाग रहे हैं। रटंत शिक्षा प्रणाली ने युवाओं को सोचने वाला नहीं, नंबर लाने वाली मशीन बना दिया। परिणामस्वरूप पढ़े-लिखे बेरोजगारों की लंबी लाइनें हैं, जिनके पास डिग्री तो है लेकिन व्यावहारिक कौशल नहीं। यह स्थिति न केवल उनको कमजोर कर रही है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था पर भी बोझ बन रही है। ऐसे में शिक्षा को रोजगार से जोड़ना बहुत जरूरी हो गया है।
बेरोजगारी : युवाओं की सबसे बड़ी परेशानी
देश का युवा जब सपने लेकर पढ़ाई करता है और अंत में उसे बेरोजगारी मिलती है तो उसका आत्मविश्वास टूटता है। आज एक-एक सीट के लिए हजारों दावेदार खड़े हैं। वर्षों की तैयारी के बाद विफलता उनको मानसिक रूप से तोड़ रही है। इसका परिणाम कई बार अवसाद, आत्मग्लानि और गलत रास्तों की ओर झुकाव के रूप में सामने आता है। इससे देश का नैतिक, चारित्रिक और समाजिक संतुलन बिगड़ जाता है। यानी बेरोजगारी केवल आर्थिक समस्या नहीं बढ़ाती यह देश की सामाजिक व्यवस्था के लिए खतरा पैदा कर देती है। ऐसे में युवाओं की दशा सुधारने के लिए उनके आने वाले कल को सही दिशा देनी की जरूरत है।
तकनीक और सोशल मीडिया : आभासी दुनिया के छलावे से दूरी जरूरी
आज का युवा डिजिटल युग की देन है। मोबाइल फोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया उसकी जीवनशैली का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। यह तकनीक जहां एक ओर जानकारी, शिक्षा और अवसरों के नए द्वार खोल रही है, दूसरी तरफ भ्रम, दिखावा और लत भी पैदा कर रही है। कई युवा आज वास्तविक जीवन से अधिक इंस्टाग्राम और रील्स की दुनिया में उलझे हैं। सोशल मीडिया पर तुलना, बॉडी-इमेज दबाव और लाइक्स की भूख उनके मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित कर रही है। तकनीक को उपयोग करने वाला युवा शक्तिशाली बनता है, लेकिन उसकी गुलामी करने वाला युवा कमजोर। इसी अंतर को आज दूर करने की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
समाज : नैतिक मूल्यों का संकट सबसे ज्यादा उपजा
आज की युवा पीढ़ी पर अक्सर आरोप लगते हैं कि वे अनुशासनहीन हैं, संस्कार भूलते जा रहे है और केवल भौतिक सुखों के पीछे दौड़ते है। ये आरोप भले पूरी तरह से गलत नहीं हैं, पर पूरे सच भी नहीं है। वास्तविकता यह है कि आज का युवा संस्कारहीन नहीं, बल्कि दिशाहीन हो रहा है। उसे सही-गलत का ज्ञान दिखाने वाले परिवार, विद्यालय और समाज तीनों की भूमिका यहां कमजोर हुई है। ईमानदारी, धैर्य, कर्तव्यबोध, त्याग जैसे मूल्य आज पीछे छूटते जा रहे हैं। इस स्थिति से उबरना अत्यंत जरूरी है। विश्वगुरु बनने की सबसे बड़ी बाधा यही से प्रारंभ होती है और यही पर उसका अंत भी होता है।
नशा और अपराध : आज के दौर की कड़वी सच्चाई
युवाओं में नशे की बढ़ती प्रवृत्ति गंभीर राष्ट्रीय समस्या बन चुकी है। शराब, ड्रग्स, सिगरेट और अन्य नशे युवाओं की ऊर्जा और उन्नति को भीतर से खोखला कर रहे हैं। कई युवा दोस्ती, फैशन या तनाव के कारण इसके जाल में फंस जाते हैं और इसे निकल पाना मुश्किल हो जाता है। नशे के साथ साइबर अपराध, धोखाधड़ी, हिंसा जैसी प्रवृत्तियां भी हमारे आस-पास के परिवेश में बढ़ रही हैं। इसका बड़ा कारण बेरोजगारी, पारिवारिक तनाव और गलत संगत है। यह चुनौती केवल कानून-व्यवस्था की नहीं है, सामाजिक और मानसिक स्वास्थ्य की भी है। इसे केवल पुलिस या अदालत नहीं बल्कि परिवार, शिक्षक और समाज मिलकर हल कर सकते हैं।
राजनीति : दशा-दिशा सुधारने को आगे आएं युवा
लोकतंत्र की आत्मा उसके युवा मतदाता होते हैं, लेकिन दुर्भाग्य से आज का बड़ा हिस्सा राजनीति से दूर भागता है। उसे लगता है कि राजनीति गंदी है, इसमें बेईमान लोग ज्यादा आते हैं और इससे कुछ भी नहीं बदला जा सकता। यह सोच नकारात्मक होने से कहीं ज्यादा खतरनाक है। यदि युवा राजनीति से दूर रहेंगे तो सत्ता गलत लोगों के हाथों में जाती रहेगी। पर, कुछ बदलाव भी दिख रहा है। कुछ जागरूक युवा सामाजिक आंदोलनों, चुनावों और नीति-निर्माण में हिस्सा ले रहे हैं। देश को ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जो केवल सोशल मीडिया पर बहस नहीं करें, बल्कि जमीनी स्तर पर बदलाव की जिम्मेदारी उठाएं।
आधी आबादी : युवा बेटियों को बहना होगा बदलाव की नई धारा में
आज की बेटियां पहले से कहीं अधिक सशक्त, शिक्षित और आत्मनिर्भर हैं। वे हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। शिक्षा, सेना, विज्ञान, खेल, प्रशासन। यह भारत के लिए सबसे अधिक शुभ संकेत है। हालांकि इसके बावजूद उन्हें आज भी असमानता, उत्पीड़न और सामाजिक बंदिशों से जूझना पड़ता है। कई जगह आज भी उनको पढ़ाना बोझ समझा जाता है और आगे बढ़ाने को पाप। देश तभी सशक्त बनेगा जब उसकी आधी आबादी यानी उसकी युवा बेटियां पूरी तरह सुरक्षित, शिक्षित और आत्मनिर्भर होंगी।
युवा पीढ़ी से देश की अपेक्षाएं
देश युवाओं से केवल नौकरी करना नहीं चाहता, बल्कि नेतृत्व, चरित्र और निर्माण चाहता है। देश चाहता है कि उसका युवा ईमानदार बने, आत्मनिर्भर बने। सामाजिक जिम्मेदारी निभाए, अंधविश्वास से दूर रहे, तर्कशील और वैज्ञानिक सोच रखे, संविधान और देश के मूल्यों का सम्मान करे। युवा को यह समझना, जानना और आत्मसात करना होगा कि राष्ट्र केवल नेताओं से नहीं बनता, बल्कि हर जिम्मेदार नागरिक से बनता है।
2026 को पहला और आखिरी रेजोल्यूशन
देश की युवा पीढ़ी आज दोराहे पर खड़ी है। एक रास्ता उसे ऊंचाइयों पर ले जा सकता है तो दूसरा उसे अंधेरे में धकेल सकता है। यह निर्णय केवल सरकार या समाज नहीं करेगा, यह निर्णय स्वयं युवा करेगा। यदि युवा जागरूक, अनुशासित, परिश्रमी और नैतिक बना तो भारत को विश्वगुरु बनने से कोई नहीं रोक सकता। लेकिन यदि वही युवा भ्रम, आलस्य, नशे और नकारात्मकता में डूब गया तो यह सुनहरा समय और अवसर उसके हाथ से निकल जाएगा। 2026 का पहला और आखिरी संकल्प यानी रेजोल्यूशन इसी से तय होगा।






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