स्मृतियों से आत्मबोध तक
आत्मकथा केवल स्मृतियों का क्रम नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर उतरने की प्रक्रिया है। यह आलेख आत्मकथा लेखन की परंपरा, उसकी सामाजिक उपयोगिता और आज के दौर में उसकी गहरी प्रासंगिकता को रेखांकित करता...

आत्मकथा लेखन में आत्मस्वीकृति और आत्मसंवाद का महत्व
बलवंत राज मेहता,
वरिष्ठ पत्रकार
आत्मकथा लेखन केवल जीवन की घटनाओं को क्रमबद्ध ढंग से लिख देना नहीं है, बल्कि यह आत्ममंथन, आत्मस्वीकृति और आत्मसंवाद की गहरी प्रक्रिया है। नववर्ष का आगमन हमें ठहरकर पीछे देखने और आगे की दिशा तय करने का अवसर देता है। ऐसे समय में यदि हम लेखन, विशेषकर आत्मकथा लेखन का संकल्प लें, तो यह हमारे जीवन को अधिक अर्थपूर्ण और संतुलित बना सकता है। आज के दौर में, जब जीवन की गति तेज़ है और मन निरंतर दबाव में रहता है, आत्मकथा लेखन स्वयं को समझने और सहेजने का एक सशक्त माध्यम बनकर उभरता है।
आज का मनुष्य बाहरी उपलब्धियों, लक्ष्यों और प्रतिस्पर्धा में इतना उलझ गया है कि वह अपने भीतर झांकना भूलता जा रहा है। आत्मकथा लेखन हमें अपने जीवन के अनुभवों को शब्द देने का अवसर देता है। वे अनुभव जो सफलता से जुड़े हों या असफलता से, प्रसन्नता से जुड़े हों या पीड़ा से। जब व्यक्ति अपने जीवन को ईमानदारी से लिखता है, तो वह अपने निर्णयों, भूलों और संघर्षों को नए दृष्टिकोण से देखने लगता है। यह प्रक्रिया व्यक्ति को मानसिक रूप से सशक्त बनाती है और आत्मविश्वास भी बढ़ाती है।
आधुनिक जीवन में मानसिक तनाव, अकेलापन और असंतोष आम समस्याएं बन गई हैं। ऐसे में आत्मकथा लेखन एक प्रकार का मानसिक उपचार भी है। जब दबे हुए भाव और अनुभव काग़ज़ पर उतरते हैं, तो मन हल्का होता है। यह लेखन व्यक्ति को अपने जीवन की कथा का साक्षी बनाता है, न कि केवल पीड़ित। यही कारण है कि आज आत्मकथा लेखन को केवल साहित्यिक विधा नहीं, बल्कि आत्मविकास का साधन भी माना जाने लगा है।
आत्मकथा केवल “मैं” तक सीमित नहीं रहती। उसमें लेखक का समय, समाज, परिवेश और परिस्थितियां स्वतः ही समाहित हो जाती हैं। इस प्रकार आत्मकथा सामाजिक इतिहास का भी एक अनौपचारिक दस्तावेज़ बन जाती है। एक साधारण व्यक्ति की आत्मकथा भी आने वाली पीढ़ियों को यह समझाने में सक्षम होती है कि किसी विशेष समय में जीवन कैसा था, चुनौतियां क्या थीं और उनसे निपटने के तरीके कैसे थे। इस दृष्टि से आत्मकथा लेखन को केवल प्रसिद्ध व्यक्तियों का विशेषाधिकार मानना एक भूल है।
नववर्ष की शुरुआत में संकल्प लेने की परंपरा रही है। अधिकतर संकल्प शरीर, धन या करियर से जुड़े होते हैं, लेकिन लेखन का संकल्प व्यक्ति को भीतर से समृद्ध करता है। आत्मकथा लेखन के लिए न तो बड़े लेखक होने की आवश्यकता है और न ही किसी विशेष भाषा-कौशल की। आवश्यकता केवल निरंतरता और सच्चाई की है। प्रतिदिन या सप्ताह में कुछ समय निकालकर अपने जीवन के किसी एक प्रसंग को लिखना बचपन, शिक्षा, परिवार, कार्य, संघर्ष या सीख धीरे-धीरे एक मूल्यवान जीवन-वृत्तांत का रूप ले सकता है। यह अभ्यास बुज़ुर्गों के लिए स्मृतियों को सहेजने का माध्यम है, तो युवाओं के लिए आत्मपहचान और दिशा तय करने का अवसर।
हिंदी साहित्य में आत्मकथा लेखन की परंपरा आधुनिक काल से बहुत पहले दिखाई देती है। इसी परंपरा में बनारसी दास जैन द्वारा रचित ‘अर्धकथानक’ का विशेष स्थान है। इसे हिंदी की पहली आत्मकथा माना जाता है। सत्रहवीं शताब्दी में रचित यह कृति लेखक के जीवन के पहले पचास वर्षों का विवरण प्रस्तुत करती है, इसी कारण इसका नाम ‘अर्धकथानक’ रखा गया। यह ग्रंथ आत्मकथा के साथ-साथ अपने समय का सजीव सामाजिक और सांस्कृतिक दस्तावेज़ भी है। बनारसी दास जैन का जीवन एक व्यापारी का जीवन था, जिसमें लाभ-हानि, विश्वास-भंग, धार्मिक द्वंद्व और मानसिक अस्थिरता सबकुछ शामिल था। उन्होंने बिना किसी आत्मश्लाघा के अपने जीवन की कमजोरियों को स्वीकार किया। यही उनकी आत्मकथा को कालजयी बनाता है।
आधुनिक हिंदी और भारतीय साहित्य में भी आत्मकथा लेखन की यही सच्ची परंपरा आगे बढ़ती दिखाई देती है। महात्मा गांधी की ‘सत्य के प्रयोग’ केवल एक महापुरुष की जीवनगाथा नहीं है, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति की कथा है जो अपनी भूलों, भय, प्रयोगों और नैतिक संघर्षों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करता है। गांधी आत्मकथा में स्वयं को महिमामंडित नहीं करते, बल्कि पाठक को यह बताते हैं कि सत्य तक पहुंचना निरंतर प्रयास और आत्मसंशोधन की प्रक्रिया है। उनकी यह स्पष्ट स्वीकृति आत्मकथा को नैतिक बल प्रदान करती है।
इसी तरह जवाहरलाल नेहरू की ‘आत्मकथा’ और ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में आत्मावलोचन का स्वर स्पष्ट दिखाई देता है। वे अपने राजनीतिक निर्णयों, वैचारिक उलझनों और व्यक्तिगत कमजोरियों को स्वीकार करते हैं। यह स्वीकारोक्ति उनकी छवि को कमज़ोर नहीं, बल्कि अधिक मानवीय और विश्वसनीय बनाती है।
पंजाबी और हिंदी साहित्य में अमृता प्रीतम की आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ आत्मकथा लेखन में स्त्री-सत्य की निर्भीक अभिव्यक्ति का उदाहरण है। उन्होंने अपने प्रेम, अकेलेपन, सामाजिक बंधनों और मानसिक पीड़ा को बिना किसी आवरण के प्रस्तुत किया। उनकी स्पष्टता ने आत्मकथा को आत्मस्वीकृति का साहसी दस्तावेज़ बना दिया।
हिंदी में फणीश्वरनाथ ‘रेणु’, हरिवंश राय बच्चन और दलित आत्मकथाकारों जैसे ओमप्रकाश वाल्मीकि की ‘जूठन’ भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाती हैं। इन रचनाओं में जीवन की कठिन सच्चाइयां, अपमान, संघर्ष और पीड़ा को छिपाया नहीं गया। विशेषकर दलित आत्मकथाएं बताती हैं कि आत्मकथा केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध का माध्यम भी बन सकती है।
आज के संदर्भ में ‘अर्धकथानक’ और बाद की आत्मकथाएं हमें यही सिखाती हैं कि आत्मकथा लेखन में सजावट नहीं, सच्चाई आवश्यक है। आज जब लोग सार्वजनिक मंचों और सोशल मीडिया पर केवल अपनी सफल छवि प्रस्तुत करते हैं, आत्मकथा हमें याद दिलाती है कि असफलताएं, भ्रम और कमजोरियां भी जीवन की कथा का अभिन्न हिस्सा हैं। सच्ची आत्मकथा वही है जो मनुष्य को उसके पूरेपन के साथ प्रस्तुत करे।
एक तरह से आत्मकथा लेखन आत्मा का लेखा-जोखा है। नववर्ष की शुरुआत में यदि हम अपने जीवन को शब्दों में ढालने का संकल्प लें, तो यह न केवल व्यक्तिगत संतोष देगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए अनुभवों की धरोहर भी बनेगा। ‘अर्धकथानक’ से लेकर आधुनिक आत्मकथाओं तक की परंपरा हमें यह विश्वास दिलाती है कि साधारण जीवन भी, यदि ईमानदारी से लिखा जाए, तो असाधारण साहित्य और गहरे आत्मबोध का स्रोत बन सकता है। आइए, इस नववर्ष लेखन को आत्मसंवाद का माध्यम बनाएं और अपने जीवन की सच्चाई को स्वीकार करने का साहस करें।






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