धुरंधर: गोलियों से लिखा गया राष्ट्रवाद
‘धुरंधर’ केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि बीते दो दशकों के आघात, असहायता और संकल्प का सिनेमाई दस्तावेज है। यह रोमांच के साथ दर्शक को सोचने, सवाल करने और जागने के लिए मजबूर करती...

देशवासियों में नवजागरण की अद्भुत सिनेमाई दस्तक
हरीश मलिक,
फिल्म विश्लेषक
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मल्टीप्लेक्स के इस सुस्त और सतही दौर में, जब फिल्में रिलीज से पहले ही ओटीटी की सांसें गिनने लगती हैं, तब ‘धुरंधर’ का तीसरे सप्ताह तक हाउसफुल चलना क्या संकेत देता है? यह फिल्म केवल परदे पर नहीं चल रही, यह स्मृतियों में, बहसों में और उस सामूहिक चेतना में चल रही है, जिसे वर्षों तक जानबूझकर अधूरी कहानियों पर जीवित रखा गया। शायद इसी वजह से लोग पगलाए हुए हैं। शायद इसी वजह से तालियां अपने-आप बज उठती हैं और शायद इसी वजह से कुछ लोग असहज होकर इसे राजनीति, निजी स्वार्थ और ‘खतरनाक नैरेटिव’ कहने लगते हैं।
फिल्म ‘धुरंधर’ दरअसल भारत के उस दौर को छूती है, जब देश ने एक के बाद एक ऐसे आघात सहे, जिनका असर सिर्फ सुरक्षा तंत्र पर नहीं, बल्कि भारतीय जनमानस पर पड़ा। कंधार हाइजैक की घटना जब फिल्म में आती है, तो वह महज एक विमान अपहरण नहीं लगती। वह एक ऐसे राष्ट्र की विवशता बन जाती है, जिसे अपने नागरिकों की जान और अपनी संप्रभुता के बीच भयावह चुनाव करना पड़ा था। उस दृश्य में हवाई जहाज सिर्फ रनवे पर खड़ा नहीं है, वह देश की असहायता का प्रतीक बन जाता है। दर्शक सीट पर बैठे-बैठे वही सवाल पूछता है, जो उस समय पूरा देश पूछ रहा था- क्या मजबूरी भी कभी नीति बन सकती है?
सनसनी नहीं, एक चेतावनी
इसके बाद संसद पर हमले की घटना एक झटके की तरह रूबरू हो जाती है। यह हमला केवल इमारत पर नहीं, बल्कि लोकतंत्र की जननी भारत की आत्मा पर था। ‘धुरंधर’ इस घटना को सनसनी की तरह नहीं, बल्कि चेतावनी की तरह प्रस्तुत करती है। संसद के दरवाजों पर गोलियां चलती हैं, लेकिन असल में गोलियां उस भ्रम को चीर देती हैं कि हम सुरक्षित हैं। यही वह मोड़ है, जहां फिल्म का स्वर और गंभीर हो जाता है, और दर्शक समझने लगता है कि यह कहानी किसी एक घटना की नहीं, बल्कि एक लंबे संघर्ष को लेकर है।
इसके बाद आता है 26/11 यानी मुंबई हमले का अध्याय। यहां फिल्म पूरी तरह चुपचाप चीखती है। कोई अनावश्यक बैकग्राउंड म्यूजिक नहीं। कोई मेलोड्रामा नहीं। होटल ताज, रेलवे स्टेशन और समुद्र के रास्ते आए आतंकियों के दृश्य दर्शकों को झकझोरते हैं, लेकिन उससे ज्यादा झकझोरती है सिस्टम की सुस्ती और निर्णय लेने में हुई देरी। यह वह क्षण है जब दर्शक को समझ आता है कि आतंकवाद केवल गोलियों से नहीं लड़ता, वह भ्रम, ढिलाई, लापरवाही, धोखाबाजी और असमंजस से भी ताकत पाता है।
इनोवेटिन थाॅट
फिल्म में जितनी घटनाएं दिखाई गई हैं, उन्हे इतने व्यवस्थित ढंग से एक-दूसरे में पिरोया गया है कि आप कहानी से साथ बहते हुए चले जाते हैं। हीरो-हिरोइन के जबरदस्ती के इंटिमेट सीन नही रखे गए हैं। बैकग्राउंड म्यूजिक में पुराने गानों का इस्तेमाल करना एक बहुत ही इनोवेटिव और सक्सेसफुल थॉट रहा। इसे आप डायरेक्टर आदित्य धर का मास्टरस्ट्रोक भी कह सकते हैं। अब ना जाने कितने ही फिल्ममेकर अपनी फिल्मों में ये करना शुरू कर सकते हैं।
इन घटनाओं को जोड़ने का काम कलाकारों ने असाधारण गंभीरता के साथ किया है। रणवीर इस फिल्म में भारतीय जासूस हमजा का केवल एक किरदार नहीं निभाते, वे उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं जो गुस्से में है, सवालों से भरी है और जवाब चाहती है। उनकी आंखों में जो बेचैनी है, वह अभिनय नहीं लगती, वह अनुभूति लगती है। अक्षय खन्ना अपनी खामोशी से भारी पड़ते हैं। उनका किरदार वह तंत्र है, जो सब जानता है, लेकिन हर बार समय पर बोल नहीं पाता। संजय दत्त का किरदार अनुभव और पश्चाताप का मिश्रण है। वे उस सिस्टम का चेहरा हैं जिसने बहुत कुछ देखा है, लेकिन बहुत कुछ बदल नहीं पाया।
हर कलाकार का उम्दा किरदार
फिल्म में आर. माधवन का किरदार, जिसे एनएसए डोभाल से प्रभावित बताया जा रहा है, सबसे सधा हुआ निर्णय है। वे ना नायक की तरह उछलते हैं, ना खलनायक की तरह गरजते हैं। वे रणनीतिक हैं- बेहद शांत, ठोस और दीर्घकालिक। उनकी आंखों में कोई नाटकीय क्रोध नहीं, बल्कि दृढ़संकल्प है। वे बताते हैं कि राष्ट्र सुरक्षा भाषणों से नहीं, निरंतर सोच और निर्णायक कार्रवाई से बनती है। शातिर पॉलिटीशियर बने राकेश बेदी जिन्होंने पूरी जिंदगी कॉमेडी करके निकाल दी, उनसे डायरेक्टर ने इतना शेडी काम कैसे करवा लिया। फिल्म में हर एक कलाकार के किरदार को इक्वली स्ट्रॉंग लिखा गया है कि आप इसे वन मैन मूवी नहीं कह सकते है। अगर एक किरदार भी इधर-उधर हुआ तो कहानी लचरती सी नजर आएगी।
आईएसआई एजेंट और मेजर इकबाल बने अर्जुन रामपाल चीफ का किरदार फिल्म की सबसे खौफनाक परतों में से एक है। यहां खलनायक शोर नहीं मचाता, साजिश रचता है। उसकी मुस्कान, उसका धैर्य और उसकी रणनीतिक चुप्पी बताती है कि भारत के खिलाफ युद्ध केवल सीमा पर नहीं, बल्कि दिमागों में लड़ा जाता है। यह भूमिका आईएसआई के उस असली चेहरे को उजागर करती है जो हथियारों से कम और योजनाओं से ज्यादा खतरनाक है।
हिंसा के दुष्परिणामों का रेखांकन
‘धुरंधर’ के बारे में यह नैरेटिव भी चल रहा है कि यह फिल्म हिंसा और रक्तपात को बढ़ावा देती है, लेकिन सच यह है कि यह फिल्म हिंसा को महिमामंडित नहीं करती, बल्कि उसके दुष्परिणामों को रेखांकित करती है। खून यहां रोमांच नहीं, चेतावनी है। यह फिल्म साफ कहती है कि शांति की कीमत चुकानी पड़ती है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि कुछ लोग इस फिल्म में देशभक्ति देखकर परेशान हैं। उन्हें हैरानी है कि लोग तालियां क्यों बजा रहे हैं, क्यों भावुक हो रहे हैं। शायद इसलिए क्योंकि वर्षों बाद उन्हें यह महसूस हो रहा है कि उनका दर्द, उनका गुस्सा और उनकी स्मृतियां परदे पर जगह पा रही हैं। ‘धुरंधर’ किसी पार्टी या विचारधारा की फिल्म नहीं है, यह उस देश की फिल्म है, जिसने बहुत सहा है और अब भूलने के बजाय समझना चाहता है।
इस फिल्म की सफलता का रहस्य इसके प्रचार में नहीं, इसके सच में है। यह दर्शकों को रोमांच के साथ-साथ सोचने पर भी मजबूर करती है। सवाल पूछने पर मजबूर करती है। और जब दर्शक सवाल पूछने लगते हैं, तब सिनेमा मनोरंजन से ऊपर उठकर दस्तावेज बन जाता है। शायद यही कारण है कि तीसरे हफ्ते में भी थिएटर भरे हुए हैं। हालांकि कुछ विश्लेषक करीब 800 करोड़ के वर्ल्डवाइड कलेक्शन को फेक और प्रचार का हिस्सा बता रहे हैं, लेकिन यह फिल्म कलेक्शन से ज्यादा पिछले दो दशक की बेहद अहम घटनाओं से मजबूत कनेक्शन बनाती है। और कुछ लोग अब भी यह पूछ रहे हैं—“पता नहीं क्यों लोग इसे देखने पगलाए हुए हैं?” दरअसल, लोग पगलाए नहीं हैं। भारतवासी जाग रहे हैं और ‘धुरंधर’ उसी जागरण की सिनेमाई दस्तक है।






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