भारतीय शास्त्रों से सीखें मैनेजमेंट के सूत्र
प्रत्येक राष्ट्र का अपना मैनेजमेंट सिस्टम है तो भारत ‘कॉपीकैट’ क्यों बन रहा है? हमें यह समझना होगा कि यदि हमारे राष्ट्र की संस्कृति अमेरिका या जापान से अलग है तो हमारा प्रशासन चलाने का तरीका अमेरिकी...

डॉ. गौरव बिस्सा,
एसोसिएट प्रोफ़ेसर, राज. इंजी. कॉलेज बीकानेर
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स्वामी विवेकानंद के अनुसार नकल करके कोई भी राष्ट्र प्रगति नहीं कर सकता। अतः प्रत्येक राष्ट्र को अपनी संस्कृति के अनुसार अपने राष्ट्रीय चरित्र का विकास करना चाहिए। इसी बात को प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक और मैनेजमेंट एक्सपर्ट कार्ल जंग ने अपने ‘कलेक्टिव अनकोंशियस्नेस’ सिद्धांत में वर्णित किया है। वर्तमान में हम सभी प्रशासन के विदेशी सिद्धांतों को अक्षरशः सत्य मानकर आचरण कर रहे हैं। इसी कारण संगठनों में प्रशासनिक व्यवस्था चरमरा गई है। आन्दोलन हो रहे हैं। व्यवसाय में अनैतिक आचरण बढ़ रहा है। मैनेजमेंट एक कला है और इसे संस्कृति से जुड़ा हुआ होना चाहिए। जापानी संस्कृति भिन्न है, इसीलिए वहां पर मैनेजमेंट का सिस्टम अन्य राष्ट्रों से भिन्न है। प्रत्येक राष्ट्र का अपना मैनेजमेंट सिस्टम है तो भारत ‘कॉपीकैट’ क्यों बन रहा है? हमें यह समझना होगा कि यदि हमारे राष्ट्र की संस्कृति अमेरिका या जापान से अलग है तो हमारा प्रशासन चलाने का तरीका अमेरिकी क्यों हो? हमें भारतीय शास्त्रों से कुछ मैनेजमेंट के मुक्तक प्राप्त हुए हैं जो प्रशासन को श्रेष्ठ बनाने में योगदान देते हैं।
अहम् ब्रह्मास्मि, तत्वमसि
यह सिद्धांत सिखाता है कि जो ईश्वर मेरे अन्दर निवास करता है, वही ईश्वर आपके भीतर भी है। यदि हम दोनों के भीतर एक ही ईश्वर का निवास है तो हम दोनों तो एक ही हुए! भेद कहां है? इसका अर्थ है कि कोई किसी से कम नहीं, कोई किसी से बढ़कर नहीं। प्रत्येक व्यक्ति अद्वितीय है। यह है भारतीय सिद्धांत। यह सिद्धांत कहता है कि जो शक्ति आपके पास, वही शक्ति मेरे पास। किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं। कोई ऊंच– नीच नहीं। इस सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक जीव अव्यक्त ब्रह्म है और जीवन का उद्देश्य उस ब्रह्म भाव की अभिव्यक्ति है। इसका अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर ईश्वरीय तत्त्व, अर्थात श्रेष्ठता छिपी है। इस श्रेष्ठता को हमारे मनोविकारों, ईर्ष्या, द्वेष, जलन आदि दुर्गुणों ने ढक रखा है। लालटेन में प्रकाश होता है, लेकिन कांच की अंदरूनी सतह पर कालिमा जम जाने के कारण नज़र नहीं आता। जिस प्रकार अन्दर की कालिमा हटाने पर प्रकाश दिखता है, उसी प्रकार अंतर्मन में छिपे ईश्वरीय तत्त्व को बाहर लाते ही जीवन का नवसृजन होता है।
यदि इसे हम वर्तमान मैनेजमेंट से जोड़ दें तो क्या कई समस्याएं स्वतः समाप्त नहीं हो जाएंगी? जब सभी समान हैं तो विवाद काहे का? हो गया न कनफ्लिक्ट मैनेजमेंट। विवाद समाप्त हुए। जब मैं सभी को एक ही ईश्वर की संतान मानने लगूंगा तो कहां गई हायरारकी अर्थात कौन ऊपर, कौन नीचे का क्रम? यह सिद्धांत सिखाता है कि प्रत्येक व्यक्ति में अद्वितीय क्षमता छिपी पड़ी है। उसे बस बाहर लाने की देर है। क्या यह सकारात्मकता की पराकाष्ठा नहीं है? यही सकारात्मक सन्देश भारतीय मैनेजमेंट प्रणाली का मूल तत्त्व है।
आत्मनो मोक्षार्थ जगत हिताय च
यह सिद्धांत सिखाता है कि प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं के मोक्ष अर्थात प्रगति और समाज के कल्याण के लिए जीवन जीना चाहिए। यह ‘अदर्स सेंट्रिक कांसेप्ट’ कहलाता है। भारतीय संस्कृति स्वार्थपरकता में विश्वास नहीं करती। भारतीय संस्कृति दूसरों के लिए, समाज के लिए, देश के लिए जीने में विश्वास रखती है। जब आप समाज और राष्ट्र का कल्याण करते हैं तो आपका कल्याण तो स्वतः ही हो जाता है। यही इस सिद्धांत का मर्म है। भारतीय शास्त्र के अनुसार– भूख लगने पर खाना प्रकृति है। भूखे न होते हुए भी दूसरे के हिस्से का छीनकर खाना विकृति है। स्वयं भूखे रहकर समाज का पेट भरना ही भारतीय संस्कृति है। राष्ट्र और समाज के विकास में छिपा है स्वयं के विकास। यही भारतीय दर्शन है।
इस सिद्धांत को यदि हम मैनेजमेंट से जोड़ें तो हम यह पाएंगे कि यदि हम अपने संस्थान के लिए कटिबद्ध होकर दिन- रात श्रम करते हैं तो संस्थान ऊंचाई के शिखर छू लेता है। यदि संस्थान उच्च स्थान पर सुशोभित है तो हम भी स्वतः उच्च स्थान पर आ गए। इसी भारतीय सिद्धांत को महान मैनेजमेंट एक्सपर्ट पीटर एफ ड्रकर ने एमबीओ सिद्धांत अर्थात मैनेजमेंट बाय ऑब्जेक्टिव्स के सिद्धांत से समझाया है।
भारतीय शास्त्र और एल्ट्रूइस्म
भारतीय दर्शन दूसरों के लिए जीने की सलाह देता है। ज़रा सोचिये:
आपके कारण कितने लोग नित्य मुस्कुराते हैं?
क्या आपको देखते ही आपके मित्रों या परिचितों में प्रसन्नता की लहर दौड़ पड़ती है?
दूसरों की खुशी के लिए क्या आप अपनी खुशी त्याग सकते हैं?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर हां है तो यह निश्चित है कि आप दूसरों के जीवन में खुशियां बिखेरने का श्रेष्ठ कार्य कर रहे हैं। हमारे कारण अन्य जन प्रसन्न हों, आनंदित हों- यही जीवन का सार है। इसी को समाज वैज्ञानिक एल्ट्रूइस्म कहते हैं। देश के नाम उत्सर्ग होने वाले सैनिक, समाजोत्थान के लिए अपना सर्वस्व देने वाले समाज सुधारक एल्ट्रूइस्म के सिद्धांत पर ही कार्य करते हैं। यही उन्हें महान बनाता है। इसका विपरीत है ईगोइस्म। इस सिद्धांत में व्यक्ति सिर्फ स्वयं का स्वार्थ और प्रसन्नता देखता है। दूसरों से उसे सरोकार नहीं होता। यह पशु प्रवृत्ति है। भारतीय शास्त्र एक सार्थक उद्देश्य के लिए जीवन जीने की वकालात करता है।
ओम सहनाववतु, सहनौभुनक्तु, सहवीर्यमकरवावहै
यह सिद्धांत टीम बिल्डिंग के समस्त सिद्धातों का जनक है। यह सिद्धांत साथ कार्य करने की, साथ मिलकर खेलने- खाने की अद्भुत प्रेरणा देते हुए समझाता है कि जो भी हो जाए पर हम दोनों में द्वेष न हो। ज़रा सोचिये कि यदि द्वेष नहीं है तो टीम तो बन ही गई ना? विदेशियों ने भी अपने सिद्धांतों में समझाया है कि टीम की पहली शर्त है द्वेष या जलन का अभाव।
कॉर्पोरेट मैनेजमेंट में यह सिद्धांत अहम है। टीम निर्माण के मूल तत्त्व है– आपसी मतभेदों को भूलना, दूसरों की गलतियों को नज़रअंदाज़ करने की शक्ति, दूसरों के साथ मिलकर कार्य करने की ताकत और सिनर्जी अर्थात एक और एक ग्यारह होने का दम। इसके बिना प्रभावी टीम बन नहीं सकती।
कोटि जनों की संघ शक्ति हो, सब हृदयों में राष्ट्र भक्ति हो,
कोटि बढ़ें पग एक दिशा में, सबके मन में एक युक्ति हो
तन्मे मन शिव संकल्पमस्तु
यह मैनेजमेंट का सबसे गूढ़ और श्रेष्ठ मन्त्र है। यह मन्त्र कहता है कि मेरा मन उत्तम संकल्पों वाला हो। उत्तम संकल्पों से तात्पर्य है सकारात्मक सोच, सभी के उत्थान और राष्ट्र की प्रगति में योगदान देने वाला हो। हमारा संकल्प द्वेष, क्लेश, समस्याओं के भंडारण, दूसरों को कष्ट देने, बदला लेने आदि से सम्बंधित नहीं होना चाहिए।
ज़रा सोचिये कि यदि कॉर्पोरेट जगत में भी इसे अपना लिया जाए तो क्या कार्य करना सहज और सरल नहीं हो जाएगा? क्या सकारात्मक विचारों से संगठन सफलता के उच्च शिखर पर नहीं पहुंच जाएगा? कहीं हमारी सोच राक्षसी तो नहीं है कि हम दूसरों के प्रति इतनी नकारात्मक सोच रखते हों जैसा राक्षसों में होता है कि मेरी एक आंख भले ही फूट जाए पर दूसरे व्यक्ति की दोनों आंखें फूटनी चाहिए? नकारत्मक न सोचना ही वास्तविक मैनेजमेंट है।
विदेशी शास्त्रों की नकल के बजाय यदि हम हमारी संस्कृति और सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित सिद्धांतों को लेकर प्रशासन चलाएंगे तो शायद समस्याएं कम से कम होंगी। भारतीय मैनेजमेंट प्रणाली में परिवार को प्राथमिकता दी गई है, क्योंकि हमारे राष्ट्र में परिवार से बढ़कर कुछ भी नहीं है। भारतीय शास्त्र सदा समाज के उत्थान, नैतिक मूल्यों के पालन, नैतिक व्यवसाय और आर्डिनरी कार्मिकों से एक्स्ट्रा आर्डिनरी परिणाम प्राप्त करने की बात करता है। भारतीय तंत्र में अंतर्मन के गुणों और आंतरिक शक्ति को बाहरी गुणों से ज़्यादा तवज्जो दी गई है और इसी कारण भारतीय प्रणाली विश्व में बेहतरीन है।






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