जवाई और जालोर का अधूरा न्याय
जवाई नदी जालोर की संस्कृति, कृषि और जीवनरेखा है, लेकिन अपने ही प्राकृतिक बहाव के पानी के लिए जिला दशकों से संघर्ष कर रहा है। जल कानूनों और राज्य जल नीति के बावजूद जालोर को उसका हक नहीं...

सात दशकों से टलता जल अधिकार व गिरते भूजल की त्रासदी
तरुण गहलोत,
लेखक
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जवाई और जालोर एक दूसरे के पर्याय हैं। इस क्षेत्र के लिए जवाई मात्र एक नदी नहीं, बल्कि उसकी संस्कृति और खुशहाली है, लेकिन इस खुशहाली को फिर से प्राप्त करने के लिए पिछले 70 साल से संघर्ष किया जा रहा है। जवाई पर जालोर का हक तय करने की समय सीमा लगातार बढ़ती ही जा रही है। इधर पिछले 35 वर्षों से तो विभिन्न किसान संगठन जवाई बांध के पानी पर हक तय करने की मांग को लेकर प्रदर्शन और महापड़ाव कर रहे हैं, लेकिन अभी तक सफलता नहीं मिल सकी है। इसे चाहे राजनीतिक कमजोरी कहें या सत्ता में आने वाली दोनों बड़ी राजनीतिक पार्टी द्वारा जालोर के साथ सौतेला व्यवहार।
गौरतलब है कि जवाई बांध से निकलकर करीब 187 किलोमीटर जवाई नदी जालोर में बहने के बाद जिले के सांचौर क्षेत्र में लूनी नदी में जाकर मिलती है। जवाई नदी की लंबाई जहां जालोर जिले में 157 किलोमीटर है, वहीं इसका बहाव क्षेत्र पाली और सिरोही दोनों जिलों में मिलाकर मात्र 30 किलोमीटर ही है। जवाई पर जालोर का हक तय नहीं करने के कारण ही भूजल स्तर लगातार गिरता ही जा रहा है। वर्ष 1984 में इस क्षेत्र का भूजल स्तर जहां 40 फिट हुआ करता था, वही आज जालोर, आहोर और सायला ब्लॉक में भूजल स्तर औसतन 110 से 130 फ़ीट तक पहुंच गया है।
जालोर के साथ कुठाराघात क्यों..?
आखिर चार दशकों से राजस्थान में बनने वाली सरकारों ने जालोर जिले के साथ इतना बड़ा कुठाराघात क्यों किया..? जबकि पानी से संबंधित कानून चाहे वे राष्ट्रीय हो या अंतरराष्ट्रीय, स्पष्ट कहते हैं कि किसी नदी के प्राकृतिक बहाव क्षेत्र को उसका पानी प्राथमिकता से मिलना चाहिए। लेकिन, जालोर के मामले में इस कानून का कभी पालन ही नहीं हुआ। अगर बात राज्य जल नीति 2010 की करें तो भी जालोर के हाथ निराशा ही लगी। जल नीति भी यह कहती है कि किसी भी बांध या जलाशय के लिए यह अनिवार्य है कि डाउनस्ट्रीम क्षेत्र में उसका कुछ मात्रा में पानी छोड़े, ताकि नदी का प्राकृतिक बहाव बना रहे। इसके बावजूद जवाई बांध से जालोर को पानी नहीं मिल रहा है। पहले लगातार यह मांग की जा रही थी कि बांध की एक भराव क्षमता तय कर जालोर के हक का एक तिहाई पानी दिया जाए, बल्कि होता यह है कि बांध छलकने के एक-दो फ़ीट पहले भी जालोर के लिए बांध के दरवाजे नहीं खुलते। जब बांध में लगातार पानी की आवक होती रहे और इधर वह छलकने को आतुर हो तब मजबूरी में दरवाजे खोले जाते हैं, लेकिन वे जालोर के लिए नहीं होते हैं, बल्कि वह उनकी मजबूरी होती है।
नहीं सुनी जाती किसानों की गुहार
किसान संघ और जालोर वासियों द्वारा लगातार यह मांग की जाती रही है कि बांध में पानी भरने के बाद एक नियत भराव क्षमता तय कर उसके ऊपर आने वाले पानी को नदी में छोड़ा जाए, ताकि जवाई नदी बहने से जालोर, आहोर और सायला से लगाकर सांचौर तक भूजल स्तर बढ़े और जालोर को उसका हक मिले। लेकिन पिछले कुछ सालों से जवाई पुनर्भरण के विषय ने उलझा के रख दिया है। जवाई पुनर्भरण में भी कई दिमाग लग रहे हैं जो जालोर के दिलों के साथ धोखा कर रहे हैं। अरावली की पहाड़ियों में लंबी-लंबी कई टनल बनाकर पानी को जवाई बांध में लाना और उसे भरना और बाद में जवाई नदी में छोड़ना। इतना लंबा प्रोसेस और बहुत ही ज्यादा बजट। कई बार ऐसा लगता है कि कहीं ये सिर्फ सर्वे कंपनियों को फायदा देने की ही मशक्कत तो नहीं की जा रही है। न जाने कब यह योजना धरातल पर उतरेगी, जबकि इसी बीच कुछ सालों में ही जोधपुर के लिए अलग ही एक डीपीआर तैयार कर दी गई है और जालोर के राजनीतिक प्रतिनिधित्व करने वाले लोग देखते ही रह गए।
यह है जवाई बांध पुनर्भरण की हकीकत
– 1984 में जवाई बांध पुनर्भरण योजना के तहत माही, जाखम, सोम-कमला-अंबा नदियों के अधिशेष पानी को जवाई बांध तक लाने के लिए खाका तैयार किया गया। इसके लिए सिरोही में अधीक्षण अभियंता के अधीन कार्यालय खोला गया था। बाद में शुरू हुआ सर्वे का कार्य। अधिकारियों द्वारा तकनीकी रिपोर्ट बनाई गई। वर्ष 1986 में तकनीकी रिपोर्ट में सामने आया कि 20 से 30 साल तक समय लगने के साथ 10 से ज्यादा टनल बनेगी, जिसका उस समय अनुमानित खर्च 3340 करोड़ आंका गया था। 1986 में भी ज्यादा दूरी और अधिक बजट के कारण इस प्रोजेक्ट पर विराम लग गया था।
2016 में एक बार फिर हुआ सर्वे, लेकिन धरातल पर कुछ नहीं
– जवाई पुनर्भरण को लेकर 2014 में एक प्रस्ताव तैयार किया गया और 2016 में सर्वे भी करवाया गया। इसके बाद भी कई बार जवाई बांध पुनर्भरण को लेकर केंद्र और राज्य सरकार के बड़े-बड़े नेताओं ने चुनावी वादे करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन आज भी यह मुद्दा सिर्फ मुद्दा ही बना हुआ है। 2014 में बने प्रपोजल के अनुसार चार बांध बनाने प्रस्तावित किए गए। गुजरात सीमा से सटे कोटरा गांव के नजदीक और साबरमती-1 और वाकल नदी जिनकी समुद्र तल से ऊंचाई करीब 350 मीटर और जवाई बांध से करीब 36 मीटर ऊंचाई पर है, सर्वे के अनुसार चार अलग-अलग टनल से नाणा गांव तक पानी लाना था। जहां से जवाई बांध में पहुंच जाता, लेकिन यहां भी लोगों के विरोध के कारण यह प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ पाया।






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