पदक गया, सत्ता नहीं आई
यह व्यंग्यात्मक टिप्पणी वेनेज़ुएला की राजनीति और वैश्विक कूटनीति की विडंबना को उजागर करती है, जहाँ सत्ता से अधिक प्रतीक और स्मृति-चिह्न अहम हो गए हैं। नोबेल शांति पुरस्कार जैसे सम्मान अब शांति का...

वेनेज़ुएला की राजनीति अब उस मोड़ पर आ गई है जहाँ सत्ता से ज़्यादा स्मृति-चिह्न मायने रखने लगे हैं। किसी दौर में नेता भाषणों से इतिहास बनाते थे, अब इतिहास गिफ्ट रैप होकर व्हाइट हाउस पहुँच रहा है।
नोबेल शांति पुरस्कार का पदक — जो कभी युद्ध रोकने, शांति स्थापित करने और मानवता के नाम पर दिया जाता था — अब कूटनीतिक स्माइली बन चुका है।
विपक्षी नेता का तर्क बड़ा भावुक है—“यह हमारी आज़ादी के लिए आपके योगदान की मान्यता है।”मतलब आज़ादी अब देश के भीतर नहीं, विदेश नीति की अलमारी में रखी जाएगी। कल को अगर आज़ादी को फ्रेम कर दीवार पर टाँग दिया जाए, तो आश्चर्य नहीं।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि पदक दे दिया गया, लेकिन सत्ता नहीं मिली। यानी सम्मान आउटसोर्स हो गया और समर्थन इन-सोर्स ही रहा। इसे कहते हैं—“सम्मान आपका, फैसला हमारा।”
नोबेल समिति की सफ़ाई भी कम व्यंग्यात्मक नहीं—“पदक का स्वामित्व बदल सकता है, पुरस्कार नहीं।”यानि शादी में अंगूठी किसी और को पहना दो, पर दूल्हा वही रहेगा। दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित सम्मान का यह बयान खुद में एक अंतरराष्ट्रीय चुटकुला बन गया है।
उधर अमेरिका की कूटनीति भी कमाल की है। एक तरफ “स्वतंत्रता सेनानी” की तारीफ़, दूसरी तरफ सत्ता की चाबी किसी और की जेब में। इसे कहते हैं डिप्लोमैटिक योग—एक पैर प्रशंसा में, दूसरा यथार्थ में।
तेल की खुशबू आते ही आदर्शवाद वैसे भी हल्का हो जाता है। 500 मिलियन डॉलर का तेल सौदा बता देता है कि वैश्विक राजनीति में शांति का रंग अक्सर कच्चे तेल से तय होता है। लोकतंत्र की मोमबत्ती जलती है, लेकिन बाती पेट्रोलियम की होती है।
इतिहास का हवाला भी खूब दिया गया—बोलिवर, वॉशिंगटन, भाईचारा, स्वतंत्रता…बस फर्क इतना है कि तब तलवारें चलती थीं, अब प्रेस रिलीज़।इस पूरी कहानी का सार यही है—नोबेल अब पुरस्कार नहीं, प्रस्ताव है।पदक अब सम्मान नहीं, संकेत है।और राजनीति अब विचार नहीं, इवेंट मैनेजमेंट है।
आख़िर में वेनेज़ुएला के आम नागरिक के हिस्से क्या आया?ना पदक, ना सत्ता, ना शांति—बस एक और अंतरराष्ट्रीय फोटो-ऑप।कह सकते हैं कि यह शांति पुरस्कार नहीं,“शांति की प्रतीकात्मक किश्त” थी —बाक़ी किश्तें शायद अगली मुलाकात में दी जाएँगी।






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