चंदे का खेल: बॉण्ड गया, बहार आई
चुनावी बॉण्ड पर सुप्रीम कोर्ट की रोक के बावजूद राजनीतिक दलों की चंदे से होने वाली आय में कमी नहीं आई। भाजपा को रिकॉर्ड चंदा मिला, जबकि कांग्रेस की आय घटी। चुनावी खर्च लगातार बढ़ता जा रहा...

चंदे का धंधा।
जी हां, वही चंदा जो आम आदमी की जेब से निकलकर सियासी दलों की तिजोरी में पहुंचता है। चुनावी नारों, झंडों और रैलियों के पीछे जो असली ईंधन है, वह पैसा है। फरवरी 2024 में जब सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बॉण्ड पर रोक लगाई, तो लगा था कि राजनीति में पैसों की रफ्तार धीमी पड़ेगी। लेकिन हकीकत ने इस उम्मीद को पूरी तरह झुठला दिया।
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चुनावी बॉण्ड पर रोक, लेकिन चंदे पर नहीं
देश की सबसे बड़ी अदालत के फैसले के बाद यह माना जा रहा था कि पार्टियों के लिए चंदा जुटाना मुश्किल होगा। मगर चुनाव आयोग के ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि बॉण्ड खत्म हुए, चंदा नहीं। बल्कि राजनीतिक दलों की आमदनी और तेज़ी से बढ़ी।
भाजपा की तिजोरी: बॉण्ड गया, नोट आए
सत्ताधारी भाजपा को एक ही साल में 6,124 करोड़ रुपये का चंदा मिला। यह पिछले साल के मुकाबले 54 फीसदी ज्यादा है।2023-24 में जहां कुल चंदा 3,967 करोड़ था, वहीं एक साल में ही इसमें 2,158 करोड़ रुपये का इजाफा हो गया। दिलचस्प बात यह है कि चुनावी बॉण्ड से 1,686 करोड़ मिलने के बावजूद, बॉण्ड बंद होने के बाद कंपनियों और संगठनों से मिलने वाला दान लगभग तीन गुना बढ़ गया।2024-25 में भाजपा को कंपनियों से 5,422 करोड़ रुपये मिले, जबकि एक साल पहले यह आंकड़ा 1,885 करोड़ था।
कांग्रेस का ग्राफ नीचे
कांग्रेस को भी चंदा मिला, लेकिन उसकी कहानी अलग है।2024-25 में कांग्रेस को 522 करोड़ रुपये का चंदा मिला, जबकि 2023-24 में यह राशि 1,130 करोड़ थी। यानी एक साल में कांग्रेस की चंदे से होने वाली आय 54 फीसदी घट गई। सियासत में जहां एक की तिजोरी भर रही है, वहीं दूसरे की जेब ढीली हो रही है।
चुनावी खर्च: प्रचार पर अरबों की बारिश
खर्चों के आंकड़े भी कम चौंकाने वाले नहीं हैं।भाजपा ने 2024-25 में कुल 3,775 करोड़ रुपये खर्च किए, जिनमें से 3,335 करोड़ रुपये सिर्फ चुनाव प्रचार पर झोंक दिए गए। यह खर्च 2023-24 के मुकाबले लगभग दोगुना है।कांग्रेस ने भी चुनाव प्रचार पर 896 करोड़ रुपये खर्च किए, जो पिछले साल के 620 करोड़ से कहीं ज्यादा है।
आम आदमी का सवाल
अब सवाल यह है कि जिन दलों के लिए आम आदमी वोट डालता है, बहस करता है और सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक लड़ता है—उसे बदले में क्या मिलता है? चुनावी बॉण्ड खत्म हो गए, लेकिन चंदे का खेल बदस्तूर जारी है। तिजोरियां और भारी हो रही हैं, और आम आदमी सिर्फ हिसाब लगाने में लगा है।






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