रसूख का जाम
क्या अरबों के फ्लाईओवर और 'सिग्नल फ्री' सड़कों का सपना रसूखदार काफिलों और धार्मिक जुलूसों की भेंट चढ़ रहा है? आखिर क्यों जयपुर, जोधपुर और कोटा जैसे शहर जाम के जाल में फंसते जा रहे...

शहरों का दम: जयपुर, जोधपुर और कोटा की सड़कों पर रेंगता भविष्य
आजकल हम सब जाम से परेशान हैं। कभी सोचा है कि यह जाम सिर्फ बढ़ती गाड़ियों की वजह से है या हमारी व्यवस्था और व्यवहार की वजह से? हाल ही में एक रिपोर्ट आई है जिसने जयपुर जैसे शहरों को दुनिया के सबसे ज्यादा ट्रैफिक वाले शहरों में खड़ा कर दिया है। सवाल यह है कि करोड़ों के फ्लाईओवर बनने के बाद भी हम सड़कों पर रेंग क्यों रहे हैं?
Table Of Content
जब रसूख बन जाए रुकावट
सरकारों का दावा है कि शहर ‘सिग्नल फ्री’ हो रहे हैं। लेकिन हकीकत यह है कि जैसे ही किसी नेता का काफिला आता है, पूरा ‘सिग्नल फ्री’ सिस्टम फेल हो जाता है।
- क्या लोकतंत्र में जनता के समय की कोई कीमत नहीं है?
- सुरक्षा के नाम पर एम्बुलेंस और आम आदमी को घंटों रोकना कहां का न्याय है? जब तक वीआईपी कल्चर सड़कों पर रहेगा, तब तक आम आदमी को रास्ता नहीं मिलेगा।
तीन शहर: एक जैसी कहानी
- जयपुर: यहां की विरासत अब बेतरतीब पार्किंग और रसूखदारों की गाड़ियों के बीच फंस गई है।
- जोधपुर: सूर्यनगरी की गलियों में अनुशासन से ज्यादा ‘अधिकार’ की लड़ाई दिखती है।
- कोटा: हालांकि यह शहर सिग्नल फ्री है, फिर भी कई बार नेताओं के कारण यहां कोचिंग जाने वाले बच्चों व एम्बुलेंस का कीमती समय जाम की भेंट चढ़ जाता है।
हमारी भी है जिम्मेदारी
सिर्फ सिस्टम को कोसने से काम नहीं चलेगा। हमारी आस्था और उत्सव दूसरों के लिए मुसीबत नहीं बनने चाहिए। क्या हम सड़क को ‘पंडाल’ बनाए बिना त्योहार नहीं मना सकते? लेन ड्राइविंग और ट्रैफिक नियमों का पालन करना किसी पर एहसान नहीं, बल्कि खुद को सभ्य साबित करना है।
बात पते की
ट्रैफिक का समाधान कंक्रीट के पुलों में नहीं, बल्कि हमारी सोच में है। जिस दिन एम्बुलेंस को रास्ता देना और नेताओं के काफिले को रोकना हमारी प्राथमिकता बन जाएगी, उस दिन हमारे शहर सच में ‘स्मार्ट’ हो जाएंगे। सवाल यह भी है कि आखिर नेताओं के काफिलों को यह ‘सुपर-फास्ट’ अनुमति मिलती ही क्यों है? क्या किसी जनप्रतिनिधि का समय उस छात्र से ज्यादा कीमती है जिसकी परीक्षा छूट रही है, या उस मरीज से ज्यादा अहम है जो एम्बुलेंस में जिंदगी की जंग लड़ रहा है? सुरक्षा का तर्क दिया जाता है, लेकिन असल में यह सुरक्षा से ज्यादा ‘रसूख का प्रदर्शन’ नजर आता है। लोकतंत्र में जनता ‘मालिक’ है, तो फिर ‘सेवकों’ के लिए मालिक का रास्ता क्यों रोका जाए? अब समय आ गया है कि इस ‘काफिला संस्कृति’ पर कानूनी लगाम लगे और नेताओं को भी उसी ट्रैफिक का हिस्सा बनाया जाए जिसका सामना जनता हर रोज करती है।






अभिनंदनीय प्रयास.