सोना क्यों मुस्कुरा रहा है, जब दुनिया बेचैन है ?
यह लेख वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, डॉलर पर घटते भरोसे और केंद्रीय बैंकों की बदली रणनीति के बीच सोने की तेज़ी को समझने की कोशिश करता है। सवाल यह नहीं कि दाम गिरे या बढ़े, बल्कि यह है कि दुनिया जिस...

देखिए, यह सवाल शायद आपके मन में भी उठा होगा—अभी सोने के दाम थोड़े गिरे हैं, तो क्या अब रफ्तार थम रही है ? या यह बस एक गहरी साँस है, थकान नहीं ? पिछले कुछ हफ्तों में 10 ग्राम सोना जहाँ लगभग 1.6 लाख रुपये तक जा पहुँचा था, वहीं अब कुछ बाज़ारों में 1.55 लाख के आसपास दिख रहा है। पहली नज़र में यह गिरावट लगती है। लेकिन अगर ज़रा ठहरकर सोचें, तो तस्वीर उतनी सीधी नहीं है।
बाज़ार के भीतर जो फुसफुसाहट चल रही है, वह कहती है—यह ठहराव नहीं, तैयारी है। कई विशेषज्ञ मान रहे हैं कि अगर वैश्विक हालात ऐसे ही बने रहे, तो इसी साल सोना 2 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम का आँकड़ा भी छू सकता है। सवाल यह नहीं कि ऐसा होगा या नहीं; सवाल यह है कि दुनिया आखिर किस ओर जा रही है कि सोने की तरफ़ इतनी बेचैनी से देखा जा रहा है ?
आपने भी देखा होगा—ग्रीनलैंड अचानक सुर्ख़ियों में है। वजह पर्यावरण नहीं, भू-राजनीति है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से ग्रीनलैंड पर दावों की भाषा जैसे-जैसे तेज़ हुई, यूरोप उतना ही सख़्त और रक्षात्मक होता गया। फ्रांस और जर्मनी जैसे देश वहाँ सैनिक भेजने लगे। अब सोचिए, दुनिया का सबसे ताक़तवर देश और सबसे समृद्ध व्यापारिक ब्लॉक आमने-सामने खड़े हों—तो निवेशकों की नींद कैसे न उड़े ?
यह टकराव यूँ ही नहीं आया। अभी कुछ ही दिन पहले अमेरिका ने वेनेज़ुएला के तेल संसाधनों पर कार्रवाई की और वहाँ के राष्ट्रपति को कैद की स्थिति में डाल दिया। संदेश साफ़ था—ताक़त का इस्तेमाल अब पर्दे के पीछे नहीं, खुले मंच पर होगा। ऐसे में जब राष्ट्र अपने-अपने हित ऊपर कर रहे हों, तो सोने की कीमतों का उछलना लगभग स्वाभाविक हो जाता है।
यहाँ सोने की वह पुरानी पहचान फिर सामने आती है—‘सेफ़ हेवन’। न किसी देश से बँधा, न किसी मुद्रा से। जब यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ, फिर इज़राइल–फिलिस्तीन संघर्ष भड़का, और अब ग्रीनलैंड को लेकर तनाव—हर बार सोने ने चमक पकड़ ली। ईरान का नाम बस औपचारिक तौर पर लिया जा रहा है, क्योंकि वहाँ अभी आग भड़की नहीं है। लेकिन डर की हवा चल रही है, और बाज़ार डर को बहुत गंभीरता से लेता है।
पर एक दिलचस्प मोड़ यहाँ आता है। सोने की तेज़ी सिर्फ़ डर की कहानी नहीं है; यह भरोसे की भी कहानी है—या यूँ कहें, भरोसे के टूटने की। रूस पर प्रतिबंधों के बाद जब पश्चिमी देशों ने उसकी संपत्तियाँ फ्रीज़ कीं, तो दुनिया के कई देशों ने चुपचाप नोटिस लिया। संदेश साफ़ था—अगर कल को आप ‘गलत पक्ष’ में हुए, तो आपकी डॉलर में रखी जमा-पूँजी भी सुरक्षित नहीं।
यही वह पल था जब ‘डॉलर हमेशा सुरक्षित है’ वाला विश्वास दरकने लगा। चीन ने अपनी मुद्रा को आगे बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन उसकी सीमाएँ हैं—कठोर नियंत्रण और सीमित परिवर्तनीयता। ब्रिक्स देशों ने जब सिर्फ़ यह कहा कि वे डॉलर के विकल्पों पर सोच सकते हैं, तो अमेरिका की प्रतिक्रिया तीखी और लगभग धमकी भरी थी—ब्राज़ील से लेकर भारत तक को निशाने पर लिया गया।
तो फिर विकल्प क्या है? जवाब बहुत पुराना, लेकिन आज पहले से ज़्यादा प्रासंगिक—सोना। न झंडा, न राष्ट्रगान, न प्रतिबंध। शायद इसी वजह से दुनिया के केंद्रीय बैंक हाल के वर्षों में सोने की खरीद बढ़ा रहे हैं। आँकड़े भी यही कहते हैं—इस सदी की शुरुआत में वैश्विक भंडार में डॉलर की हिस्सेदारी 71 प्रतिशत थी, जो 2024 तक घटकर 58 प्रतिशत रह गई। आज सोना दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी रिज़र्व एसेट बन चुका है।
अब ज़रा अपने घर की बात करें। भारत में सोने की कीमतें सिर्फ़ वैश्विक डर से नहीं बढ़ रहीं। रुपये की डॉलर के मुक़ाबले कमज़ोरी, व्यापार समझौतों पर अनिश्चितता, और अर्थव्यवस्था का वह ‘K-शेप’ ढाँचा—जहाँ कुछ ऊपर जा रहे हैं, कुछ नीचे—यह सब मिलकर सोने को और आकर्षक बनाता है। ऊपर से पड़ोसियों के साथ तनाव—चाहे वह पाकिस्तान हो या चीन—अनिश्चितता का बोझ और बढ़ा देता है।
इसीलिए शायद आपको यह जानकर हैरानी नहीं होगी कि भारत में गोल्ड ETF रिकॉर्ड रन पर हैं। सिर्फ़ पिछले महीने लगभग 12,000 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश इनमें आया। यह सिर्फ़ निवेश नहीं, यह एक मनोविज्ञान है—लोग भविष्य को लेकर आश्वस्त नहीं हैं, इसलिए वे उस धातु की ओर लौट रहे हैं, जिसने सदियों से भरोसा निभाया है।
और जब सोना चमकता है, तो क्या चाँदी पीछे रह सकती है ? इस हफ्ते चाँदी 100 डॉलर प्रति औंस तक पहुँच गई—सोचिए, एक साल पहले यही कीमत 28 डॉलर थी। यह उछाल सिर्फ़ औद्योगिक माँग की कहानी नहीं कहता; यह भी बताता है कि निवेशक ‘हार्ड एसेट्स’ की ओर झुक रहे हैं।
तो आखिर निष्कर्ष क्या है ? क्या हमें मान लेना चाहिए कि सोना ही भविष्य है और बाकी सब धुँधला ? शायद नहीं। लेकिन यह मानना पड़ेगा कि दुनिया जिस मोड़ पर खड़ी है, वहाँ अनिश्चितता स्थायी लगने लगी है। और जब अनिश्चितता स्थायी हो जाए, तो सोना अस्थायी उछाल नहीं, बल्कि एक लंबी कहानी बन जाता है।
देखिए, आप अकेले ऐसा नहीं सोच रहे कि “कुछ तो गड़बड़ है।” यही सवाल मेरे मन में भी है। शायद सोना हमें अमीर बनाने का वादा नहीं कर रहा—बस इतना कह रहा है कि जब भरोसे टूटें, तब मेरे पास आ जाना। अब यह हम पर है कि हम इसे चेतावनी समझें या सिर्फ़ एक निवेश अवसर।
सोचिए।






Very nice description sir.you have nicely elaborate the contemporary burning issue.
Regards
OP Chitara
Ashapura city