कविता का सच: इतिहास नहीं, अनुभूति
कविता तथ्य नहीं, अनुभूति है। यह लेख काव्यात्मक सत्य और ऐतिहासिक सत्य के अंतर को सरल उदाहरणों से स्पष्ट करता है, तर्क नहीं बल्कि संवेदना रचना के मर्म तक पहुंचाती...

अभिव्यक्ति – काव्यात्मक सत्य और ऐतिहासिक सत्य का अंतर
दिनेश सिंदल,
लेखक एवं कवि
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कवि वह सपेरा होता है जिसकी पिटारी में सांपों की जगह लोगों के दिल बंद होते हैं।
कभी-कभी किसी रचना को पढ़ कर रचनाकार से यह सवाल किया जाता है कि यह रचना आपने किसको देखकर लिखी। विशेषकर प्रेम कविता को पढ़/ सुन कर श्रोता/ पाठक की जिज्ञासा होती हैं की आपकी इस रचना का नायक कौन है?
कवि अपने आसपास से ही चरित्र उठाता है।
तुम से पाया तुम्हीं को लौटाया
गीत कहकर कभी ग़ज़ल कहकर
लेकिन उसमें रचनाकार वह देखता है जो कोई अन्य सामान्य व्यक्ति नहीं देख पाता। कवि की यह दृष्टि ही उसे आम आदमी से अलग करती है।
पूरा अंक देखें-

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कवि के जहन में कोई एक व्यक्ति नहीं होता। बल्कि बहुत से व्यक्तियों के जोड़ से बना कोई एक अमूर्त चरित्र होता है। जो वास्तव में भौतिक रूप से कहीं नहीं होता। कवि उसे अपने शब्दों से आकर देता है। उसे गढ़ता है। वह कवि द्वारा रचा हुआ चरित्र होता है।
किसी इक फूल की बू तो किसी का रंग भाया है
तुझे इक मुश्त खो बैठा मगर किस्तों में पाया है
अपनी रचना में कवि जो है को नकारता है व जैसा होना चाहिए को स्थापित करने की कोशिश करता है।
जब कोई चित्रकार किसी सुंदर स्त्री का चित्र बनाता है तो जो चित्र बनता है, वह किसी एक विशेष स्त्री का चित्र नहीं होता। वैसी स्त्री कहीं होती भी नहीं है, जिसका चित्र उस चित्रकार ने बनाया होता है। वह चित्र उस चित्रकार की कल्पना की कई स्त्रियों का जोड़ होता है।
कवि की कल्पना का चरित्र होता है कविता का ‘तुम’
कविता का ‘तुम’ भी किसी एक व्यक्ति विशेष को संबोधित नहीं होता। वह कवि की कल्पना का चरित्र होता है। और ये भी हो सकता है कि वह ‘तुम’ कोई व्यक्ति नहीं हो, कोई प्रवृति, कोई मौसम, कोई अच्छा- बुरा समय भी हो सकता है।
काव्यात्मक सत्य वह सत्य है जो भावना, अनुभव, मानवीय स्वभाव और जीवन की गहराई को व्यक्त करता है। यह कल्पना, रूपक, प्रतीक, अतिशयोक्ति और संवेदना के माध्यम से व्यक्त होता है। काव्यात्मक सत्य तथ्य के स्तर पर सदैव सही नहीं होता, परंतु अनुभव के स्तर पर गहरा और वास्तविक लगता है।
ऐतिहासिक सत्य वह सत्य है जो तथ्यों, दस्तावेजों, साक्ष्यों और विश्वसनीय प्रमाणों पर आधारित होता है। यह कल्पना की नहीं, बल्कि घटनाओं की वास्तविकता की बात करता है। शोध, तिथियां, साक्ष्य, क्रम सब इसमें महत्वपूर्ण होते हैं।
इसीलिए कविता को इतिहास की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। किसी काव्य- कृति में कोई घटना या कोई पात्र का किसी रूप में होना जरूरी नहीं कि ऐतिहासिक सत्य हो। वह आभासी सत्य है। वह काव्यात्मक सत्य है।
जैसे महावीर जंगल में तपस्या कर रहे हैं। वे समाधी में बैठे हैं। उन्हें एक सांप काटता है। और हम पढ़ते- सुनते आए हैं कि उनके शरीर से खून की जगह दूध निकालता है। क्या इसे विज्ञान मानेगा? नहीं! क्योंकि किसी भी व्यक्ति के शरीर में अगर खून की जगह दूध है तो वह व्यक्ति जीवित ही नहीं रह सकता। इस घटना का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं हो सकता। यह ऐतिहासिक सत्य नहीं है। यह घटना महावीर की करुणा को दर्शाती है। रचनाकार इस घटना के माध्यम से कहना चाहता है कि महावीर इतने करुणावान थे की जो उन्हें नुकसान पहुंचाए उसका भी वे सदैव भला ही सोचते थे।
सांप काटे जाने पर शरीर से खून की जगह दूध का निकलना ऐतिहासिक सत्य नहीं, काव्यात्मक सत्य है।
संवेदना से परिचय कराना ही कवि का काम
कवि का काम इतिहास पढ़ना नहीं है। वह अपने पाठक व श्रोता का उस संवेदना से परिचय करवाता है जिससे जीवन आगे बढ़ता है।
हमें कविता को कविता की तरह देखना चाहिए। कविता में विचार के साथ कवि की कल्पना भी है। वह विचार को ऐसे प्रस्तुत करता है कि वह सर्वमान्य हो जाए, सबके हित का हो जाए।
जो शब्दों तक में ठहर जाते हैं वे काव्यात्मक सत्य को नहीं सोच पाते। वो घटनाओं का ऐतिहासिक विश्लेषण करते हैं। उनकी सत्यताओं की परख- खोज करते हैं, शोध करते हैं। वे तर्क से समझने की कोशिश करते है। भाव वहां खत्म हो जाता है। रस खत्म हो जाता है। इस तरह वे रचना में उल्लेखित उस ऐतिहासिक पात्र के खोल को तो पकड़ पाते है, उसके शरीर को तो पकड़ पाते हैं लेकिन उसकी आत्मा को नहीं पकड़ पाते। वह तत्व जो महावीर को महावीर बनता है या बुद्ध को बुद्ध बनता है, उससे वे वंचित रहे जाते हैं। लेकिन जो शब्दों के पार, भाव तक पहुंचाते हैं वे रचना के मर्म को समझ पाते है।
कवि एक सूत्र के रूप में आपके समक्ष चीजों को रखता है, कोडिंग करता है। जो उसे डिकोड कर पाते हैं वे कवि के हृदय तक पहुंच पाते हैं।
इसीलिए कविता के मर्म तक पहुंचाने के लिए, कविता के रस तक पहुंचाने के लिए, उसके भाव को स्पर्श करने के लिए श्रद्धा की जरूरत है, समझ की नहीं। कविता के पास श्रद्धा के साथ जाना चाहिए। अगर हम अपनी समझ के साथ जाते हैं तो हम वही चीज देख पाते हैं जो पहले से हमारे भीतर है।






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