तीन पीढ़ियां, एक सच
तीन पीढ़ियों की चीनी स्त्रियों के जीवन, पीड़ा और संघर्ष के जरिए यह बातचीत सत्ता, पितृसत्ता और इतिहास में दबाई गई स्त्री आवाज़ को सामने लाती...

विश्व प्रसिद्ध चीनी लेखिका जुंग चांग से विशेष बातचीत
विश्वप्रसिद्ध लेखिका जुंग चांग का नाम उस निर्भीक आवाज़ के लिए जाना जाता है जिसने चीन के बंद दरवाज़ों के पीछे छिपी सच्चाई को दुनिया के सामने रखा। 1952 में जन्मी जुंग चांग ने चीन की सांस्कृतिक क्रांति को नज़दीक से देखा, खेतों में काम किया और 1978 में ब्रिटेन में स्थायी रूप से बस गईं। उनकी लेखनी स्त्री अनुभव और इतिहास के बीच की नाजुक रेखा को उजागर करती है। चीन की सोच, महिलाओं की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और इतिहास के पन्नों से गायब कर दी गई स्त्री कथाओं पर वरिष्ठ पत्रकार मणिमाला शर्मा ने उनसे विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत हैं उस बातचीत के मुख्य अंश-
प्रश्न: तीन पीढ़ियों की स्त्रियों की कहानी कहने की प्रेरणा आपको कहां से मिली?
जुंग चांग: इसकी शुरुआत मेरी मां से हुई। चीन में रहते हुए हम अपने जीवन की सच्ची बातें भी खुलकर नहीं कह सकते थे। डर केवल राजनीतिक नहीं था; वह पारिवारिक बातचीत तक में घुला हुआ था। इन्हीं सब हालात से जूझते हुए मैं 1978 में ब्रिटेन आ गई। वहां मेरी मां मुझसे पहली बार मिलने आईं, तब उन्होंने पहली बार अपनी मां और अपने जीवन की कहानियां मुझे सुनाईं। यह केवल पारिवारिक संवाद नहीं था, बल्कि स्त्री की उस आवाज़ का उभरना था जिसे पहली बार सुरक्षित माहौल मिला। वह केवल पारिवारिक स्मृतियां नहीं थीं, बल्कि तीन पीढ़ियों की स्त्रियों का अनकहा इतिहास था। तब मुझे लगा कि अगर यह सब नहीं लिखा गया, तो यह कहानी भी हमेशा के लिए इतिहास में खो जाएगी।
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प्रश्न: आपकी दादी के ‘बंधे हुए पैरों’ का विवरण स्त्री देह पर नियंत्रण की भयावहता दिखाता है। आपके लिए इसका क्या महत्व है?
जुंग चांग: मेरी दादी के पैर दो साल की उम्र में बांध दिए गए थे। स्त्रियों के छोटे छोटे पैरों को चीन में सुंदरता का मापदंड माना जाता था। लेकिन वास्तव में यह स्त्री देह पर पुरुष सत्ता द्वारा थोपा गया अनुशासन था। छोटी उम्र में ही लड़कियों के पैरों की उंगलियों को तलवे के नीचे मोड़कर पत्थरों से कुचलकर हड्डियां तोड़ी जाती थीं, ताकि पैर ‘तीन इंच के सुनहरे कमल’ जैसे दिखें। उन्हें नाप से छोटे जूतों को घंटों पहनाया जाता था ताकि पैर छोटे दिखें और चलने की क्षमता सीमित हो जाए। चीनी में इसे ‘लोटस गेट’ या ‘स्वर्ण कमल की चाल’ माना जाता था। असल में यह चाल सौंदर्य नहीं, विवशता थी। पैर बांधने के कारण स्त्री ठीक से कदम नहीं बढ़ा पाती थी, संतुलन बनाए रखने के लिए उसका शरीर हल्का आगे-पीछे झुकता था, जिससे चाल ‘लहराती’ दिखती थी। बस उसी चाल को हल्की हवा में झुकते हुए ‘विलो के पेड़’ (चीन में पाए जाने वाला पेड़) की तरह देखा जाता था। स्त्री के उसी दर्द और असहायता को पुरुष-दृष्टि ने ‘कोमलता’ और ‘नारी सुकुमारता’ का नाम दे दिया था। मैंने अपनी नानी को देखा था कि बाहर से लौटकर वे अपने पैरों को गरम पानी में भिगोती थीं। उनकी अंगूठे को छोड़कर बाकी उंगलियां तलवे के नीचे दबी रहती थीं। इससे उनकी चाल तो कोमल लगती थी, लेकिन वह जीवनभर के दर्द की चाल थी। मेरे लिए बचपन की यह स्मृति पितृ सत्तात्मक उस घटिया सोच की प्रतीक है जिसमें स्त्री से सहनशील होने की उम्मीद की जाती है।
प्रश्न: क्या आपको लगता है कि स्त्री के शरीर पर यह नियंत्रण अब अतीत की बात हो चुकी है?
जुंग चांग: नहीं, यह सोच केवल रूप बदल चुकी है। पहले शरीर को बांधा जाता था, पर आज एक आत्मनिर्भर और मज़बूत महिला की आवाज़ को दबाया जाता है। पहले शरीर को तोड़ा जाता था, आज आत्मविश्वास को। पहले दर्द दिखाई देता था, आज उसे सामान्य और स्वाभाविक बना दिया गया है। पितृसत्ता समय के साथ अपने तरीके बदलती है, लेकिन उसका उद्देश्य वही रहता है और वो है महिलाओं पर अपना नियंत्रण बनाए रखना। मेरे लिए वो सब सिर्फ़ एक व्यक्तिगत स्मृति नही हैं, बल्कि उस दमनकारी सोच का प्रतीक है, जिसने महिलाओं को शारीरिक और मानसिक दोनों रूपों में अपाहिज बनाया हुआ था।
प्रश्न: ‘वाइल्ड स्वान्स: थ्री डॉटर्स ऑफ चाइना’ लिखने से आपके अपने परिवार को देखने का नज़रिया कैसे बदला?
जुंग चांग: लिखते हुए मुझे समझ में आया कि मेरे परिवार की कहानी कोई अपवाद नहीं है। वह पूरे चीन की कहानी है। अपमान के इस जीवन को मेरी नानी या मां ने ही नहीं, उनकी जैसी हज़ारों लाखों चीनी स्त्रियों ने भोगा था। मैंने खुद खेतों में और स्टील वर्कर के रूप में काम किया। उस समय यह सब मुझे व्यक्तिगत संघर्ष लगता था, लेकिन लेखन की प्रक्रिया ने स्पष्ट किया कि यह अनुभव सामूहिक था, विशेष रूप से स्त्रियों के लिए। इसने मुझे अपने माता-पिता को, खासकर पिता के संघर्ष को नए सिरे से समझने का अवसर दिया।
प्रश्न: ब्रिटेन में रहने से चीन के बारे में लिखने के आपके दृष्टिकोण पर क्या असर पड़ा?
जुंग चांग: चीन से दूरी ने मुझे स्पष्टता दी। चीन में डर केवल बोलने तक सीमित नहीं रहता; वह सोचने के तरीके को भी प्रभावित करता है। यूके में आकर मैंने पहली बार बिना भय के अपने आप से भी कई सवाल पूछे और उत्तर ढूंढकर उन्हें लिखने का साहस पाया। यह दूरी मुझे अधिक ईमानदार बनाती है। मैं चीन को न अपना आदर्श बनाकर देखती हूं और न नफ़रत के साथ। लेकिन मैं उसे वैसा ही लिखती हूं जैसा मैंने जिया है।
प्रश्न: क्या आज का चीन सांस्कृतिक क्रांति की विरासत से ईमानदारी से निपट पाया है?
जुंग चांग: नहीं। सत्ता ने अब तक अपनी गलतियों को स्वीकार नहीं किया है। सांस्कृतिक क्रांति पर खुली बातचीत आज भी संभव नहीं है। संरचना अब भी पितृसत्तात्मक और नियंत्रण-केंद्रित बनी हुई है। 2026 में भी चुप्पी को स्थिरता कहा जाता है और आज भी चीन में सवाल पूछना खतरे के बराबर माना जाता है।
प्रश्न: माओ ज़ेदोंग की जीवनी पर शोध करते समय सबसे बड़ी चुनौती क्या रही?
जुंग चांग: सबसे कठिन काम था तथ्यों तक पहुंचना। माओ के जीवन को लंबे समय तक मिथक की तरह प्रस्तुत किया गया। दस्तावेज़ छुपाए गए और गवाहों को चुप कराया गया। शोध के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि सत्ता किस तरह एक व्यक्ति की छवि को लाखों लोगों की पीड़ा से ऊपर रख देती है। तब मुझे महसूस हुआ कि इतिहास को समझने के लिए सत्ता की नहीं, बल्कि पीड़ितों की आवाज़ सुननी पड़ती है।
प्रश्न: सत्य को लेकर आपका नज़रिया क्या है?
जुंग चांग: सत्य कोई दार्शनिक अवधारणा नहीं है। सत्य वह है, जो किसी स्त्री ने अपने जीवन और देह पर सहा है। अगर हम सत्य नहीं लिखेंगे, तो झूठ धीरे-धीरे परंपरा बन जाएगा और जब झूठ परंपरा बन जाए, तो दमन सामान्य लगने लगता है। इसलिए सच लिखना और सबके सामने लाना मेरे लिए किसी भी प्रकार का साहित्यिक प्रयोग नहीं है बल्कि यह मेरी लेखक के तौर पर नैतिक ज़िम्मेदारी है।






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