बीमारी बना रही कर्जदार
इलाज अब सिर्फ स्वास्थ्य का सवाल नहीं रहा, यह आर्थिक तबाही का कारण बन चुका है। महंगी दवाएं, निजी अस्पतालों की मनमानी और कमजोर सरकारी ढांचे ने आम परिवारों को कर्ज के दलदल में धकेल दिया...

स्वास्थ्य संकट, महंगाई और आम आदमी की टूटती कमर
भारत में बीमारी अब सिर्फ स्वास्थ्य संकट मात्र नहीं है, यह आर्थिक आपदा भी बन चुकी है। इलाज का खर्च इतना अधिक है कि हर साल देश के लाखों लोग गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं। हालत यह है कि आउट‑ऑफ‑पॉकेट यानी जेब से सीधे होने वाला खर्च कुल स्वास्थ्य व्यय का लगभग आधा है। यही वजह है कि गंभीर बीमारी की खबर सुनते ही मरीज ही नहीं पूरा परिवार सदमे में आ जाता है। इलाज के चक्कर में जमीन और गहने बिक रहे हैं, लोग कर्ज और क्रेडिट कार्ड के जाल में फंस रहे हैं। कई बार कर्ज का जुगाड़ नहीं होने के कारण इलाज अधूरा छोड़ कर मरीज अपने आपको भगवान भरोसे छोड़ देता है। विकसित देश का ख्वाब देखने वाले देश में यह स्थिति चिंताजनक और निराशाजनक है।
Table Of Content
- स्वास्थ्य संकट, महंगाई और आम आदमी की टूटती कमर
- स्वास्थ्य व्यवस्था पर बढ़ता दबाव
- ग्रामीणों क्षेत्र में बड़ा संकट
- बन जाते हैं कर्जदार
- महंगे इलाज की मार
- सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की भूमिका
- धार्मिक संस्थाएं हो सकती हैं मददगार
- केरल का स्वास्थ्य मॉडल
- स्वास्थ्य बजट बढ़ाना जरूरी
- टेलीमेडिसिन भी है महत्वपूर्ण
- बदलनी होगी मानसिकता और जीवनशैली
- यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज का लक्ष्य
- सरकार की सक्रियता नाकाफी
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स्वास्थ्य व्यवस्था पर बढ़ता दबाव
असल में भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था दोहरे बोझ के नीचे दबी है। एक ओर मलेरिया, डेंगू, टीबी जैसे रोग अभी खत्म नहीं हुए हैं, दूसरी ओर मधुमेह, उच्च रक्तचाप, दिल की बीमारी और कैंसर जैसे गैर‑संक्रामक रोग तेजी से बढ़ रहे हैं। अनुमान है कि हर वर्ष 50–60 लाख भारतीय इन गैर‑संक्रामक रोगों से जान गंवा रहे हैं। ऐसे रोगों का इलाज काफी लंबा, थका देने वाला और महंगा होता है।
ग्रामीणों क्षेत्र में बड़ा संकट
तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो ग्रामीण भारत सबसे अधिक संकट में है। देश की आबादी का करीब 70 प्रतिशत हिस्सा गांवों में रहता है। जबकि स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे का करीब एक‑तिहाई हिस्सा ही वहां मौजूद है। कई जिलों में प्रति हजार आबादी पर डॉक्टर और नर्सों की संख्या वैश्विक मानकों से आधी भी नहीं है। परिणाम यह होता है कि साधारण बुखार या प्रसव में भी लोगों को 50–100 किलोमीटर दूर जिला मुख्यालय जाना पड़ता है। वहां सरकारी अस्पतालों में भीड़ के कारण बेड नहीं मिलने और दवा उपलब्ध न होने से ऐसे परिवार मजबूरन किसी निजी अस्पताल तक पहुंचते हैं, लेकिन वहां के खर्च से उनकी आर्थिक सेहत भी जवाब दे जाती है।
बन जाते हैं कर्जदार
किसी भी बीमारी की शुरुआत में होने वाला खर्च जैसे डॉक्टर की फीस, जांच, दवा, बार‑बार आने‑जाने का किराया परिवार खुद वहन करते हैं। आयुष्मान भारत या अन्य बीमा योजनाएं मुख्य रूप से भर्ती (इंडोर) इलाज का खर्च उठाती हैं, जबकि बाह्य रोगी (ओपीडी) उपचार पर काफी खर्च हो जाता है। राजस्थान जैसे कुछ राज्यों के सरकारी अस्पतालों में निःशुल्क जांच, उपचार और दवा जैसी योजनाएं चल रही हैं, लेकिन कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार के कारण मरीजों को इनका अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। मधुमेह, उच्च रक्तचाप या अस्थमा जैसी बीमारियों से ग्रस्त मरीजों को अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत कम पड़ती है, लेकिन जीवन भर दवा और जांच की जरूरत रहती है। परिवार महीनों तक इन दवाओं पर खर्च करता रहता है। बचत खत्म हो जाती है और वह कर्ज के दलदल में फंस जाता है। यदि कैंसर, किडनी फेलियर या हार्ट सर्जरी जैसी स्थिति आ जाए, तो जमीन बिक जाना और घर गिरवी रखना आम बात हो चुकी है। इसके बावजूद कई बार इलाज पूरा नहीं हो पाता और मरीज भी नहीं रहता।
महंगे इलाज की मार
महंगे इलाज की एक वजह दवाओं की ऊंची कीमतें और भारी जांच शुल्क तो है ही, जन औषधि केंद्रों के बाद भी जेनेरिक दवाओं की पहुंच सीमित है। अधिकांश मरीज अब भी ब्रांडेड दवाइयां खरीदने के लिए मजबूर हैं। प्राइवेट डायग्नोस्टिक सेंटरों में एमआरआई, सीटी स्कैन, एंडोस्कोपी जैसी जांचों का शुल्क बहुत ज्यादा है। निजी डॉक्टरों पर लक्ष्य पूरा करने का दबाव और कमीशन‑आधारित रेफरल व्यवस्था ने भी इस बोझ को बढ़ाया है।
ऐसे हालात में परिवार दोहरी मार झेलता है। एक ओर जहां बीमार व्यक्ति काम करने की स्थिति में नहीं रहता, वहीं बीमारी का खर्च बढ़ने से परिवार की आर्थिक रीढ़ ही टूट जाती है। यहां तक की इस तरह की व्यस्तता के चलते परिवार के दूसरे सदस्यों की आजीविका भी प्रभावित होती है, जिससे आर्थिक संकट बढ़ जाता है। विषम आर्थिक हालात में कई बार लोग इलाज के बीच में ही हार मान लेते हैं, दवा अधूरी छोड़ देते हैं या सर्जरी टाल देते हैं।
सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की भूमिका
इस भयावह तस्वीर के बावजूद आशा की किरण खत्म नहीं हो जाती। सबसे पहली जरूरत सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत करने की है। यदि गांव स्तर पर ही सरकारी अस्पताल में ब्लड प्रेशर, शुगर, टीबी, कैंसर‑स्क्रीनिंग जैसी सेवाएं नियमित रूप से उपलब्ध हों और लोगों को शुरुआती अवस्था में बीमारी का पता चल जाए, तो मरीज की बीमारी जटिल नहीं होगी और वह महंगे इलाज से बच जाएगा। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में ही हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर चलाए जाएं, जहां दवा के साथ पोषण सलाह और मानसिक स्वास्थ्य परामर्श सब एक ही छत के नीचे मिलें। केरल जैसे राज्यों ने दिखाया है कि मजबूत प्राथमिक स्वास्थ्य नेटवर्क से शिशु मृत्यु दर और गंभीर बीमारियों पर खर्च भी घट सकता है।
धार्मिक संस्थाएं हो सकती हैं मददगार
सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों की संतुलित साझेदारी जरूरी है। सरकारी अस्पतालों को बुनियादी ढांचे, मानव संसाधन और दवाओं के लिए आवश्यक बजट से मजबूत करना होगा। साथ ही निजी अस्पतालों के लिए भी स्पष्ट नियम बनाए जाएं, जिससे उनकी मनमानी कम हो सके। कई स्थानों पर मिशनरी और ट्रस्ट आधारित अस्पतालों का नेटवर्क कम लागत पर गुणवत्तापूर्ण सेवा दे रहा है। ऐसे अस्पतालों को विशेष दर्जा देकर आयुष्मान और राज्य योजनाओं से अधिक मजबूती से जोड़ा जा सकता है। केरल में मिशनरी अस्पतालों ने बहुत अच्छा काम किया है। इन अस्पतालों की तर्ज पर सभी धर्मों के लोग अस्पताल चलाने के लिए आगे आएं तो हालात सुधर सकते हैं क्योंकि ऐसे अस्पताल मुनाफे के लिए नहीं सेवा के लिए चलाए जाएंगे।
केरल का स्वास्थ्य मॉडल
केरल स्वास्थ्य सूचकांकों में सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाला राज्य है। जहां राजस्थान जैसे राज्यों में जिला अस्पताल तक बदहाली के शिकार हैं, वहीं वर्ष 2023 में केरल के जिला-स्तरीय सरकारी अस्पताल में किडनी का सफल प्रत्यारोपण किया गया था। यह भारत में अपनी तरह की पहली उपलब्धि थी। एर्नाकुलम स्थित जनरल हॉस्पिटल में 50 वर्षीय महिला ने अपने 28 वर्षीय बेटे को किडनी दान दी थी। वहां के सरकारी अस्पतालों में गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा के साथ- साथ मिशनरी अस्पताल भी बेहतर काम कर रहे हैं। इसकी वजह से आम आदमी इलाज की आशा नहीं छोड़ता।
स्वास्थ्य बजट बढ़ाना जरूरी
यदि हम सचमुच बीमारी‑जनित गरीबी को रोकना चाहते हैं, तो सार्वजनिक स्वास्थ्य बजट को शीघ्र सकल घरेलू उत्पाद के 2.5 प्रतिशत तक लाकर 6 प्रतिशत तक ले जाना होगा। इसके लिए तंबाकू, शराब और चीनी युक्त पेय पर विशेष स्वास्थ्य उपकर लगाकर एक समर्पित “राष्ट्रीय स्वास्थ्य फंड” बनाया जा सकता है। इस फंड का उपयोग प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के विकास, मुफ्त जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति और गरीब मरीजों के लिए विशेष सहायता में किया जा सकता है।
टेलीमेडिसिन भी है महत्वपूर्ण
टेलीमेडिसिन भी कर्ज के बोझ को कम करने में अहम भूमिका निभा सकती है। यदि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले मरीज अपने गांव से ही वीडियो कॉल के माध्यम से विशेषज्ञ डॉक्टर से सलाह ले सकें और स्थानीय केंद्र पर जरूरी जांच हो जाए, तो उन्हें हर बार शहर जाने का खर्च और दिन‑भर की मजदूरी का नुकसान नहीं होगा। आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन के तहत बने डिजिटल हेल्थ रिकॉर्ड का उपयोग कर डॉक्टर पूर्व उपचार और जांच देख सकते हैं, लेकिन यह कार्य गंभीरता से होना चाहिए। टेलीमेडिसिन को खानापूर्ति या दिखावटी इलाज का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए।
बदलनी होगी मानसिकता और जीवनशैली
यह तो निश्चित है कि सुधार केवल ढांचे और पैसे से नहीं होगा, मानसिकता भी बदलनी होगी। यदि स्वास्थ्य को मौलिक अधिकार मानकर नीति बनाई जाए, तो सरकार, समाज और बाजार तीनों की प्राथमिकताएं बदलेंगी। स्वास्थ्य‑शिक्षा, साफ पानी और स्वच्छता, प्रदूषण नियंत्रण के साथ तंबाकू और अल्कोहल पर सख्त नीति बने तो लोग बीमार कम होंगे। साथ ही इलाज के कारण गरीबी के दुष्चक्र में फंसने से भी एक हद तक बचाव होगा। लोगों को स्वस्थ जीवनशैली के प्रति जागरूक करना होगा।
यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज का लक्ष्य
यदि नीतियों का फोकस प्राथमिक स्वास्थ्य, किफायती बीमा, मजबूत सार्वजनिक ढांचे और पारदर्शी निजी भागीदारी पर ईमानदारी से रखा जाए, तो आम आदमी का बजट नहीं बिगड़ेगा और आर्थिक बदहाली से बचा जा सकेगा। भारत ने वर्ष 2030 तक यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज का लक्ष्य बनाया है। इसके लिए देश की स्वास्थ्य प्रणाली का मजबूत ढांचा आवश्यक है। यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज का अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी आर्थिक बोझ के आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं प्राप्त हों। लोगों को चिकित्सा खर्च के कारण होने वाली निर्धनता से बचाने और 2047 तक भारत को विकसित देश बनाने के लिए जरूरी है कि यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज का लक्ष्य पूरा हो। ऐसा अनुमान है कि 2050 तक लगभग हर पांचवां भारतीय 60 वर्ष या उससे अधिक आयु का हो सकता है। जाहिर है इससे स्वास्थ्य ढांचे पर दबाव बढ़ेगा। इसलिए सरकार को इस मोर्चे पर गंभीरता से काम करना होगा।
सरकार की सक्रियता नाकाफी
सरकार ने स्थिति में सुधार के लिए कुछ कदम जरूर उठाए हैं। आयुष्मान भारत के तहत पूरे देश में स्वास्थ्य और कल्याण केंद्रों यानी आयुष्मान आरोग्य मंदिरों का नेटवर्क बनाया जा रहा है। इनका उद्देश्य गांव‑गांव तक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवाना है। माना जा रहा है कि इससे उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसी सामान्य जांचों की पहुंच ग्रामीणों तक होगी। साथ ही प्रसव और मातृ‑शिशु देखभाल का काम भी ठीक होगा। इसी तरह ई‑संजीवनी जैसे टेलीमेडिसिन प्लेटफॉर्म पर करोड़ों ऑनलाइन परामर्श का दावा किया गया है। इससे मरीजों को कितना फायदा हुआ, इस बारे में अभी कोई डेटा नहीं है। जाहिर है, मरीजों को राहत देने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।






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