बचपन का अदृश्य बोझ
भारत में बच्चों और किशोरों में आत्महत्या के बढ़ते मामले सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि उस मौन त्रासदी का संकेत हैं, जिसे हम समय रहते समझ नहीं पा रहे। अदृश्य अपेक्षाएं, तुलना, सोशल मीडिया, परिवारिक तनाव और...

बच्चों की मुस्कान छीन रहा है अदृश्य दबाव, समाज नहीं सुन पा रहा उनकी चुप्पी
डॉ. मधु बैनर्जी,
वरिष्ठ पत्रकार
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बच्चों में बढ़ती आत्महत्या आज एक ऐसी त्रासदी बन चुकी है जिसकी जड़ें हमारे घरों, स्कूलों और सामाजिक ढांचे तक फैली हुई हैं। भारत का बचपन खतरों के साये में है और इस बोझ का आकार इतना गहरा है कि वह दिखाई भी नहीं देता। स्कूल बैग का वजन जो दिखता है, उससे कहीं भारी वह दबाव है जो न पकड़ा जा सकता है न पहचाना। तुलना, डर, अवसाद और असफलता का भय बच्चों पर ऐसी अदृश्य जिम्मेदारियों का पहाड़ बनकर टूटता है, जिसे नए दौर में बच्चे खुद ‘मिस्टर इंडिया ड्यूटी’ कहते हैं। यानी वह ड्यूटी जो दिखाई नहीं देती, पर हर दिन निभानी पड़ती है। यही मौन दबाव आज ऐसी खामोश त्रासदियों का कारण बन रहा है, जिन्हें पढ़कर हम केवल पछताते हैं।
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भारत में बच्चों और किशोरों में आत्महत्या के मामले केवल बढ़ नहीं रहे, बल्कि खतरनाक स्तर पर पहुंच चुके हैं। 2023 में 13,892 छात्रों ने आत्महत्या की। यह संख्या केवल एक सांख्यिकीय तथ्य नहीं, बल्कि हमारे समाज, परिवार और व्यवस्था की विफलताओं का कठोर आईना है। ताज़ा घटनाएं बार-बार हमें झकझोरती हैं पर समाज हर बार सामान्य होकर आगे बढ़ जाता है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट बताती है कि 2023 में छात्र आत्महत्याओं में वृद्धि पिछले एक दशक की तुलना में 65 प्रतिशत से अधिक है। बच्चों की आत्महत्या किसी एक कारण से नहीं होती। यह कई छोटे-छोटे मानसिक बोझों का संयुक्त भार है जो अंततः उन्हें तोड़ देता है। सबसे बड़ा बोझ शैक्षणिक दबाव है, जिसने बच्चों से उनका बचपन छीन लिया है। रैंक की दौड़ में धकेले गए बच्चे जब कहते हैं कि वे ‘डर के मारे पढ़ते हैं’, तो यह उन अदृश्य घावों का संकेत है जिन्हें हम अनदेखा करते रहते हैं। यह डर धीरे-धीरे अवसाद में बदलता है और बच्चा यह सोचने लगता है कि यदि वह यह बोझ नहीं उठा पाया तो उसके जीने का क्या अर्थ है।
सोशल मीडिया ने उनके मन पर एक नया दबाव डाल दिया है। तुलना की इस फैक्ट्री ने बच्चों में ‘कमतर होने का डर’ पैदा कर दिया है। दूसरों की चमकती तस्वीरों के बीच अपनी संघर्षभरी वास्तविकता उन्हें और अकेला कर देती है। लाइक कम आना, ऑनलाइन मजाक उड़ाया जाना या बॉडी शेमिंग जैसे अनुभव वयस्कों को तोड़ सकते हैं, तो एक बच्चे पर इसका क्या असर होता होगा, इसे समझना मुश्किल नहीं। घर, जो सबसे सुरक्षित जगह होनी चाहिए, आज तनाव का केंद्र बन गया है। लड़ाई, आर्थिक दबाव, अनबन और अलगाव बच्चों की मानसिक सुरक्षा को भीतर तक हिला देते हैं। बच्चे जब खुद को घर की समस्याओं का कारण मानने लगते हैं, तब उनकी मासूम मानसिकता टूटने लगती है।
कोचिंग संस्कृति ने इसे और गंभीर बनाया
कोचिंग संस्कृति ने इस स्थिति को और गंभीर बना दिया है। 12 साल के बच्चे को 12 घंटे पढ़ने की बाध्यता क्या उसे इंसान बनाएगी या सिर्फ एक मशीन? आज बच्चे दो वर्गों में बांटे जा रहे हैं— टॉपर और फेलियर। यह टैगिंग मानसिक हिंसा बन चुकी है जिसकी चोट उनके भीतर जमा होती रहती है और कभी-कभी घातक रूप में फूटती है। सबसे बड़ी समस्या है संवाद की कमी। बच्चे बोलना चाहते हैं पर डरते हैं कि उन्हें जज किया जाएगा। वे अपने मन की बात भीतर ही भीतर जमा करते रहते हैं और वही चुप्पी कभी अंतिम चुप्पी बन जाती है।
नजरअंदाज किए जाने वाले संकेत
अक्सर माता-पिता और स्कूल उन संकेतों को नजरअंदाज कर देते हैं जो मदद की पुकार होते हैं। अचानक चुप हो जाना, दोस्तों से दूरी, पढ़ाई में रुचि कम होना, नींद या भूख में बदलाव, गुस्सा और बार-बार खुद को बेकार कहना— ये सब संकेत हैं कि बच्चा मदद चाहता है। वह कहना चाहता है कि कोई उसे सुने, समझे, थामे। पर अक्सर सुनने वाला कोई नहीं होता। ‘मिस्टर इंडिया ड्यूटी’ यानी वह अदृश्य बोझ जो बच्चे हर दिन उठाते हैं। खुश दिखो, परफेक्शन दिखाओ, परिवार को गर्व दिलाओ, गलती मत करो, कमजोर मत दिखो। यह अदृश्य ड्यूटी ही बच्चों को भीतर से कुचल देती है। जब यह भार सीमा से ज्यादा हो जाता है, बच्चा टूट जाता है।
समाधान एक दिशा में नहीं, चारों दिशाओं में खोजने होंगे। संवाद सबसे बड़ा उपचार है। हर दिन केवल दस मिनट बच्चे की भावनाओं पर बात की जाए तो यह समय जीवन बदल सकता है। तुलना खत्म की जाए क्योंकि बच्चा कोई मॉडल नंबर नहीं बल्कि भावनाओं वाला इंसान है। स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य और काउंसलिंग अनिवार्य हो। डिजिटल जीवन को संतुलित किया जाए और असफलता को सामान्य रूप में स्वीकार करवाया जाए। बच्चों की आत्महत्या व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक असफलता है। बच्चे पढ़ाई, मोबाइल या कोचिंग के नंबर नहीं होते। वे भावनाओं, सपनों और डर के साथ जीते हुए इंसान हैं। यदि हम अब भी नहीं बदले तो आने वाली पीढ़ियां हमसे यही पूछेंगी कि जब हम टूट रहे थे तब आप कहां थे। क्योंकि बचपन एक बार खो जाए तो कभी लौटता नहीं।






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