
बोल हरि बोल
हरीश मलिक,
लेखक और वरिष्ठ व्यंग्यकार
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आजकल बुलियन एक्सचेंज में सोने-चांदी के भाव और स्टॉक मार्केट में शेयरों का संतुलन मानो छुट्टी जैसे मजे ले रहे हैं। चांदी इतिहास की सीढ़ियां फांदती हुई चांद पर जाने को आतुर है। रोज सुबह का भाव देखकर खुद से ही कहती है, ‘आज नहीं तो कल गोल्ड मेडल में भी चांदी का झंडा गाड़ दूंगी।’ निवेशक दूरबीन लेकर खड़े हैं कि चांद दिखे न दिखे, चांदी जरूर दिख रही है। उधर सोना है, जो लोगों का ‘सोना’ उड़ाकर सूरज से आंखें चार किए बैठा है। उसकी चाल में अब पुरानी शालीनता नहीं रही। पहले वह तिजोरी में बैठकर चुपचाप दमकता रहता था। अब हर दिन सुर्खियों में आकर कहता है- ‘मैं सुरक्षित निवेश से आगे निकलकर, अब फलानी पार्टी का अति महत्वाकांक्षी नेता भी हूं।’ इसलिए वह भी अब तिजोरी में बैठे साधु-सी तपस्या छोड़कर तेज रफ्तार योगी बन गया है।
रोज-ब-रोज सोने-चांदी के भाव ऐसे उछल रहे हैं मानो गुरुत्वाकर्षण ने इस्तीफा दे दिया हो। अखबारों की सुर्खियों की होड़ में सोना इतनी तेजी से चमक रहा है कि लोग धूप का चश्मा पहनकर ज्वैलरी शोरूम जा रहे हैं। हालांकि, ज्वैलरी शोरूम में ग्राहक कम और खिड़की पर चिपके दर्शक ज्यादा हैं, जो कह रहे हैं- ‘भैया, खरीदना नहीं है, बस देखना है कि आज कितना आगे निकल गया।’ दिलचस्प यह है कि आम आदमी दोनों को बड़े प्रेम से देखता है, लेकिन छूता किसी को नहीं। चांदी की कीमत सुनकर वह चांद की ओर देखता है और सोने का भाव देखकर सीधे सूरज को प्रणाम कर देता है कि भाई लोग तुम इनकी हेकड़ी के गवाह रहो।
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इस बीच में बेचारा शेयर बाजार। सेंसेक्स बार-बार गोते लगाकर ऐसे डांस कर रहा है कि फिल्म धुरंधर वाला वायरल वीडियो भी शरमा जाए। समझ किसी को नहीं आ रहा, लेकिन देख सब रहे हैं। कभी ऊपर, कभी नीचे। मानो कह रहा हो, ‘निवेश नहीं, मनोरंजन चाहिए तो टिकट मत काटो, स्क्रीन खोलो।’ विशेषज्ञ टीवी पर माथा पकड़कर बैठते हैं, एंकर उत्साह से उछलते हैं और आम निवेशक सोचता है कि यह बाजार है या मोबाइल की ऊपर-नीचे होती रील? शेयर बाजार की ऊपर-नीचे होती सांसों ने निवेशकों को ऐसा योगाचार्य बना दिया है, जो हर मिनट अनुलोम-विलोम कर रहे हैं। ग्रीन दिखा तो लंबी श्वांस, रेड हुआ तो जोर का उच्छ्वास। सुबह पोर्टफोलियो देखकर दिल धक-धक करता है, दोपहर तक उम्मीद का ड्रिप चढ़ता है और शाम होते-होते ‘लॉन्ग टर्म’ का दर्शन याद आ जाता है। मोबाइल हाथ में, नजर स्क्रीन पर और दिल भगवान भरोसे। क्योंकि बाजार जब छींकता है, तो निवेशक बुखार में चला जाता है। कोई मुनाफे में है तो डर रहा है, कोई घाटे में है तो धैर्य पर भाषण दे रहा है। कुल मिलाकर, निवेशक अब पैसा नहीं गिनता, वह अपनी धड़कनें गिनता है।
आम आदमी देख रहा है कि चांदी चांद का टिकट मांग रही है, सोना सूरज की किरणें नाप रहा है और सेंसेक्स डांस फ्लोर पर है। धरती पर खड़ा आदमी बस तालियां बजा रहा है। क्योंकि इस शो में भाग लेने की उसकी हैसियत अब सिर्फ दर्शक बनने की रह गई है। बाजार के पंडित कह रहे हैं कि यह चमक विकास की है। आम आदमी कह रहा है कि यह चमक हमारी पहुंच से बाहर की है। चांदी चांद पर पहुंच जाए या सोना सूरज को पछाड़ दे। अपन तो वहीं के वहीं रहेंगे। फर्क बस इतना है कि धरती पर बैठे लोग केवल खबरों सोने-चांदी और शेयरों की खरीद-फरोख्त कर सकते हैं।
ममता का तुष्टिकरण का निवेश और मतदाता
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इन दिनों चुनावी ध्यान-योग में हैं। दरअसल, उनके ही एक पुराने सहयोगी और विधायक हुमायूं कबीर ने ऐसी पसोपेश में फंसा दिया है, ना उगले बन रहा है और ना निगले। कबीर ने ‘बाबरी मस्जिद’ के नाम पर ईंट क्या रखीं और मानो ममता के माथे पर राजनीति का पूरा संविधान रख दिया। अब समस्या यह नहीं कि मस्जिद बनेगी या नहीं, समस्या यह है कि मुख्यमंत्री बोलें तो क्या बोलें। वे विरोध करें, तो अल्पसंख्यक तुष्टिकरण का वर्षों का निवेश डूबने का खतरा है। अगर समर्थन करें, तो बहुसंख्यक मतदाता यह मान लेंगे कि राजनीति में इतिहास का मलबा उठाकर भविष्य की इमारत खड़ी की जा रही है। इसलिए ममता ने सबसे सुरक्षित रास्ता चुना है- चुप्पी। यही चुप्पी चुनावी ध्यान-योग है। टीएमसी कहती है कि यह व्यक्तिगत मामला है। सरकार कहती है कि कानून अपना काम करेगा और नेतृत्व कहता है कि हम सब देख रहे हैं। असल में कोई कुछ नहीं देख रहा, सब सिर्फ यह देख रहे हैं कि वोट किस तरफ गिरते हैं। यह वही राजनीति है जिसमें आग लगे तो कहा जाता है कि हमने माचिस नहीं जलाई, बस पेट्रोल रखा था। हुमायूं कबीर ने मस्जिद की नींव नहीं रखी, उन्होंने ममता के राजनीतिक संतुलन की नींव हिला दी है।
ठाकरे बंधु, अब किसे बनाएं अपना बंधु
महाराष्ट्र की राजनीति में इन दिनों ठाकरे बंधु उस बेपेंदे के लोटे की तरह हैं, जिसे ना घर की शेल्फ पहचानती है और न मोहल्ले का हैंडपंप। मजबूरी के नाम पर बना यह गठबंधन अब मजबूरी से भी बाहर हो गया! उद्धव ठाकरे ने विचारधारा की ऐसी परिक्रमा की कि अंततः उन्हें खुद ही नहीं याद रहा कि वे किस देवता की आरती उतार रहे हैं। उधर राज ठाकरे मराठी मानुष का वही पुराना राग अलापते रहे, जिसे सुनकर मतदाता अब रिमोट से दूसरा चैनल लगा लेते हैं। बीएमसी, जो कभी शिवसेना की राजनीतिक तिजोरी थी, अब इतिहास के उस अध्याय में दर्ज हो चुकी है, जिसे बच्चे परीक्षा के बाद फाड़ देते हैं। सबसे दिलचस्प स्थिति यह है कि जो ठाकरे बंधु एक-दूसरे से दशकों तक दूरी बनाकर बैठे रहे, वे अब एक-दूसरे की शरण में हैं। दोनों को समझ नहीं आ रहा कि आगे किसके चरण पकड़ें। कांग्रेस कहती है ‘लाइन में लगिए’, एनसीपी मुस्कुराती है और भाजपा दूर खड़ी यह तमाशा नोट कर रही है। सयाने कहते हैं कि सियासत में शरण हमेशा उसी को मिलती है जिसके पास कुछ देने को हो। ठाकरे बंधुओं के पास फिलहाल सिर्फ यादें हैं और यादें चुनाव नहीं जितातीं।
खरगे जी की हिचकी अटकी!
भाजपा अध्यक्ष की ताजपोशी में पीएम मोदी ने सहजता से कह दिया- ‘नितिन नबीन मेरे बॉस हैं, मैं उनका कार्यकर्ता हूं।’ इस पर लोकतंत्र मुस्कराया, संगठन ने पीठ थपथपाई और कार्यकर्ताओं को लगा कि यहां तो कुर्सी भी संगठन के आगे बौनी है। उधर कांग्रेस मुख्यालय में पहुंचते-पहुंचते यह वाक्य गले में फंस गया। मल्लिकार्जुन खरगे जी ने चश्मा ठीक किया, गला साफ कर आवाज संभाली और बोले— ‘0हमारी पार्टी में ऐसा कुछ क्यों नहीं है?’ कुर्सी के पीछे से आवाज आई यहां तो सर्वेसर्वा हाईकमान ही होता है। कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष भी ऐसे चुना जाता है जैसे मंदिर का पुजारी: नाम पहले तय, प्रक्रिया बाद में। यहां नेतृत्व ऊपर से टपकता है, नीचे सिर्फ श्रद्धा टपकती है। यह फर्क सिर्फ एक वाक्य का नहीं है। वह पूरी राजनीतिक संस्कृति का एक्स-रे है। एक तरफ संगठन, दूसरी तरफ संप्रभुता… और बीच में अटकी खरगे जी की हिचकी।






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