घर का बजट, जीवन की सुरक्षा
घरेलू बजट, बचत और अनुशासित खर्च ही आर्थिक स्वतंत्रता की कुंजी है। दिखावे और अनावश्यक खर्च से बचकर सही निवेश अपनाएं ताकि भविष्य सुरक्षित और तनावमुक्त बन...

बचत और निवेश से बनाएं आर्थिक मजबूती
पार्किंसन का नियम कहता है कि खर्चे हमेशा आमदनी की बराबरी पर आने के लिए बढ़ते जाते हैं। इसका अर्थ है कि अगर आप उस कमाई को खर्च करने में अनुशासित और कठोर नहीं हैं तो अंततः आप उस संपूर्ण राशि से थोड़ा ज्यादा खर्च कर चुके होंगे। केन्द्र या राज्य के बजट के निर्माण और उसके विश्लेषण से पूर्व हमें अपने घर के बजट का निर्धारण, आय और व्यय तथा भविष्य के खर्चों को ध्यान में रखकर लिखित बजट बनाना चाहिए। बजट बनाते समय ये निश्चित करना जरूरी है कि हम अधिकतम कितनी बचत कर सकते हैं। बजट का अहम हिस्सा बचत है। प्रसिद्ध इन्वेस्टर वारेन बुफे के अनुसार, ‘आपकी कमाई आपकी आय नहीं होती। आपकी आय तो वह रकम है जो बचत कर चुकने के बाद शेष बची हो।’
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दिखावे की बजाए बचत पर ध्यान जरूरी
एक शोध के अनुसार, समाज में लगभग 70 फ़ीसदी व्यक्ति जितना कमाते हैं लगभग उतना ही खर्च भी कर लेते हैं। वर्तमान में क्रेडिट कार्ड से खर्च करने की प्रवृत्ति के चलते बचत की प्रवृत्ति कम हो रही है। दिखावा, खुद को धनी साबित करने का प्रयास, अत्यंत प्रसन्न और आनंदित दिखाने की चाहत ने इंसान की बचत की प्रवृत्ति को कम किया है। हमें यह मानकर चलना चाहिए कि कठिन आपदा कभी भी आ सकती है और उसके लिए हमारे पास कम से कम तीन से चार माह तक घर चलाने जितना पैसा होना ही चाहिए। इसके लिए आज से ही हमें अपनी आय का बीस से तीस फीसदी बचाना शुरू करना होगा।
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बचत, खर्च और शोध
हमें घरेलू बजट बिगड़ने के सबसे बड़े कारणों पर निगाह रखनी होगी। शोध अध्ययनों के अनुसार खर्च बढ़ने और बजट बिगड़ने के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं-
• इकोनॉमिक टाइम्स के अनुसार, भारत में केवल 28 प्रतिशत युवा वित्तीय अवधारणाओं को समझते हैं। ज्ञान की कमी के कारण युवा वित्तीय निर्णय नहीं ले पाते। इससे आवेगपूर्ण खर्च होता है।
• एक अध्ययन के अनुसार, ग्रामीण भारत में परिवारों द्वारा विवाह पर खर्च उनके वार्षिक आय का दो से चार गुना होता है। इससे वित्तीय असुरक्षा बढ़ जाती है।
• स्लोनकिट द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार, खरीदारी में भारतीय अपनी आय का लगभग 30 प्रतिशत ऑनलाइन शॉपिंग पर खर्च करते हैं।
• इंडियन जर्नल ऑफ कैपिटल मार्केट्स की रिपोर्ट के अनुसार, ऑनलाइन शॉपिंग में बेवजह की खरीदारी होती है और ऑनलाइन पेमेंट होने से खर्च का भय नहीं रहता।
क्यों बिगड़ता है बजट
हाथ में पैसा हो तो उसे उल-जलूल खर्च करना और खर्च के बाद पछताना अजीब आदत है। हमें याद रखना चाहिए कि यदि आज हम अनावश्यक चीज़ें खरीद रहे हैं तो कल हमें अपने रोजमर्रा के आवश्यक खर्च के लिए ज़रूरी वस्तुओं को बेचना पड़ेगा। भारत में पिछले कुछ समय में आर्थिक संरचना के बदलाव का प्रभाव विशेष रूप से युवा वर्ग की वित्तीय आदतों पर पड़ा है। खर्च की बढ़ती प्रवृत्ति बचत प्रधान देश भारत के लिए घातक संकेत बनती जा रही है। भारत में विवाह और जन्मदिन जैसे सामाजिक आयोजनों में बड़ा व्यय होने लगा है, जो चिंताजनक है। बचत बढ़ाने के लिए घर में समझाइश जरूरी है। साथ ही युवाओं को श्रम का महत्व समझाया जाना जरूरी है। छोटे से बच्चे को एक शार्पनर दिलाने से पहले उससे कुछ घरेलू श्रम करवाएं, ताकि उसे महसूस हो कि मेहनत के बाद ही सफलता मिलती है।
कम में ज्यादा सुख
अपनी आमदनी से कम पर जीवन जीने के लिए खुद को तैयार करना आज की ज़रूरत है। जितनी आमदनी हो, उसके 60 प्रतिशत में जीवन यापन करने का प्रयास करना चाहिए। यदि ऐसा न किया तो बुढापे में भी काम करना होगा। समाज, संतान और रिश्तेदारों पर बिल्कुल भी निर्भर न हों, क्योंकि उनका प्रेम और निष्ठा भी अक्सर धन से जुड़ी होती है। अनर्गल खर्च से बचते हुए कम से कम खर्चे में आनंदित रहने के बारे में सोचना चाहिए।
सुरक्षित निवेश पर ध्यान
घरेलू बजट में सबसे ज़रूरी है अच्छा व सुरक्षित निवेश। एक ही जगह पर सारे पैसे निवेश करने के बजाय अपना निवेश विभिन्न विकल्पों में करना उचित रहता है। जमीन, शेयर बाजार, बॉन्ड, फिक्स्ड डिपॉजिट्स इत्यादि में आनुपातिक निवेश उचित है। इन सबके साथ कर्ज से बचने की कोशिश करना चाहिए। ‘ऋणं कृत्वा घृतं पीवेत’, यानी उधार लेकर घी पीने की प्रवृत्ति को छोड़िये। यही वित्तीय स्वतंत्रता का मार्ग है।






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