मोदी युग की नई सत्ता रणनीति
नितिन का भाजपा के शीर्ष पद तक पहुंचना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भाजपा की संगठनात्मक संरचना, नेतृत्व और शक्ति-संतुलन को नए सिरे से गढ़ने...

नितिन नवीन की ताजपोशी बदलाव का संकेत
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में इन दिनों एक अघोषित लेकिन स्पष्ट बदलाव चल रहा है। यह बदलाव न नारों में दिखता है, न मंचों से घोषित होता है, बल्कि नई नियुक्तियों और अचानक उभरते चेहरों में चुपचाप आकार ले रहा है। भाजपा में नेतृत्व परिवर्तन अब व्यक्तियों की अदला-बदली भर नहीं रह गया है। यह एक सुनियोजित डेमोग्राफिक री-इंजीनियरिंग यानी जनसांख्यिकीय पुनर्गठन का रूप ले चुका है, जिसमें उम्र, भूमिका और सत्ता के स्तर के आधार पर नेतृत्व को नए सिरे से परिभाषित किया जा रहा है।
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बिहार से पांच बार के विधायक 45 वर्षीय नितिन नवीन का भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना इसी बदलाव का प्रतीकात्मक ही नहीं, पुख्ता प्रमाण है। नितिन भाजपा के न सिर्फ सबसे युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हैं, बल्कि वे पहले ऐसे अध्यक्ष हैं, जिनका जन्म भाजपा की स्थापना के बाद हुआ है। भाजपा उनके जन्म से 47 दिन पहले स्थापित हुई थी। हालांकि वे एक पारम्परिक राजनीतिक परिवार से आते हैं और उनके पिता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा भाजपा के वरिष्ठ नेता थे और बिहार विधानसभा में कई बार विधायक रहे। नितिन पहली बार साल 2006 में अपने पिता की मृत्यु के बाद हुए उप चुनाव के जरिए राजनीति में आए थे।
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नितिन का अचानक दुनिया के सबसे बड़े संगठन के रूप में प्रसिद्ध हो रहे भाजपा जैसे संगठन का राष्ट्रीय अध्यक्ष पद तक पहुंचना भाजपा में हो रहे बदलाव का ज्वलंत उदाहरण है।नितिन कभी पार्टी के सबसे चमकदार चेहरों में नहीं गिने गए। यही बात उन्हें मोदी युग की राजनीति में उपयुक्त बनाती है।
पार्टी के कई वरिष्ठ नेता मानते हैं कि नितिन ने कभी न कभी उनके साथ काम किया है। अक्सर तब, जब वे टीम में एक जूनियर सदस्य हुआ करते थे। कुछ उन्हें भाजपा की युवा शाखा के दिनों से याद करते हैं, जब वे पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर के साथ भारतीय जनता युवा मोर्चा में काम कर रहे थे और दिल्ली के अशोका रोड स्थित पुराने भाजपा मुख्यालय में नियमित नजर आते थे। लेकिन उनकी सबसे बड़ी योग्यता शायद यही है कि वे न तो किसी बड़े नेता के खेमे से जुड़े हैं, न किसी प्रभावशाली जातीय या संगठनात्मक लॉबी से। और शायद की आज की भाजपा में टिके रहने या आगे बढ़ने के लिए यही गुण सबसे अहम है।
दरअसल, नितिन का भाजपा के शीर्ष पद तक पहुंचना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भाजपा की संगठनात्मक संरचना, नेतृत्व और शक्ति-संतुलन को नए सिरे से गढ़ने की रणनीति का हिस्सा है। यह रणनीति “युवा बनाम वरिष्ठ” की सरल बहस से कहीं आगे जाकर सत्ता के केंद्रीकरण, नेतृत्व के रोटेशन और स्थायी शक्ति-केंद्रों को तोड़ने की राजनीति का संकेत है।
प्रयोग नहीं, प्रक्रिया
भाजपा में युवा नेताओं को आगे लाना कोई नई बात नहीं है। अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के दौर में भी शिवराज सिंह चौहान जैसे नेता 46 वर्ष की उम्र में मुख्यमंत्री बने थे। फर्क यह है कि तब यह अपवाद था, आज यह पैटर्न बन चुका है। पिछले एक दशक में भाजपा ने जिस तरह अपने मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों और संगठनात्मक पदों पर नियुक्तियाँ की हैं, उससे साफ संकेत मिलता है कि पार्टी अब नेतृत्व को स्थायी नहीं मानती। सत्ता अब विरासत या लंबे अनुभव की गारंटी नहीं रही।
आज भाजपा शासित 14 राज्यों में से केवल पांच मुख्यमंत्रियों की उम्र शपथ ग्रहण के समय 55 वर्ष से अधिक थी। शेष नौ मुख्यमंत्री अपेक्षाकृत युवा थे। कुछ तो 40 के दशक में ही सत्ता की कमान संभाल चुके थे यानी औसत उम्र रही 54 वर्ष। यह भारतीय राजनीति के लिहाज़ से बड़ा संकेत है। राजस्थान के भजनलाल शर्मा, दिल्ली की रेखा गुप्ता या मध्य प्रदेश के मोहन यादव, ये सभी ऐसे नेता हैं जिन्हें सत्ता के केंद्र में अचानक लाया गया। इनमें से कई नेता ऐसे थे, जो चुनाव से पहले तक संभावित मुख्यमंत्रियों की सूची में होना तो दूर मंत्री बनने की कल्पना भी नहीं करते थे या यूं कहें कि इनकी खास पहचान तक नहीं थी।
नेतृत्व की नजर में रहना जरूरी
मोदी-शाह युग की भाजपा में नेतृत्व की कसौटी भी बदल गई है। पार्टी के भीतर अब यह धारणा मजबूत है कि मीडिया में लोकप्रियता अब तरक्की की गारंटी की बजाय कई बार बाधा बन जाती है। एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि पहले लोग सोचते थे कि टीवी पर दिखना, अख़बारों में नाम आना उन्हें ऊपर ले जाएगा। अब वही चीज़ ठहराव की वजह बन सकती है। असली पैमाना है, केंद्रीय नेतृत्व की नजरों में रहना।
इन नेता का तर्क था कि प्रधानमंत्री मोदी अपने शीर्ष नेताओं से भारी ‘लेगवर्क’ की अपेक्षा करते हैं। लगातार दौरे, संगठनात्मक बैठकें, चुनावी तैयारियां आदि। युवा नेताओं को इसमें स्वाभाविक बढ़त मिलती है। पार्टी के भीतर यह टिप्पणी अब आम है कि जो नेता स्वास्थ्य या उम्र के कारण तेज़ी से काम नहीं कर सकते, वे इस नए मॉडल में फिट नहीं बैठते।
युवा मुख्यमंत्री, वरिष्ठ संगठन
दिलचस्प बात यह है कि भाजपा ने पूरी तरह युवाओं पर दांव नहीं लगाया है। मुख्यमंत्री अपेक्षाकृत युवा हैं, लेकिन राज्य अध्यक्षों और संगठन प्रमुखों में अनुभव को प्राथमिकता दी गई है। राज्य अध्यक्षों की औसत उम्र 58 वर्ष है, जो मुख्यमंत्रियों से अधिक है। यह संकेत देता है कि भाजपा नेतृत्व अनुभव और ऊर्जा का मिश्रण बनाए रखना चाहता है। उत्तर प्रदेश इसका बड़ा उदाहरण है। योगी आदित्यनाथ 49 वर्ष की उम्र में दूसरी बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए 61 वर्षीय पंकज चौधरी। असम और महाराष्ट्र को छोड़कर लगभग सभी भाजपा शासित राज्यों में मुख्यमंत्री से उम्र में बड़े नेता संगठन की कमान संभाल रहे हैं। यह मॉडल सत्ता और संगठन के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास है, ताकि युवा नेतृत्व के साथ अनुभवी मार्गदर्शन बना रहे।
युवा वरिष्ठ का कॉकटेल
भाजपा नेतृत्व ने भले ही कम उम्र के नेताओं को मुख्यमंत्री बनाने की रणनीति अपनाई है, लेकिन उनके मंत्रिमंडलों में वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं का पलड़ा अब भी भारी है। भाजपा के उपमुख्यमंत्रियों की औसत उम्र 57 वर्ष है, जो मुख्यमंत्रियों से अधिक है। केंद्र में स्थिति और भी स्पष्ट है। साल 2024 में तीसरी बार बनी मोदी सरकार की केंद्रीय मंत्रिपरिषद की औसत उम्र 59 वर्ष है। यहां युवा चेहरों की मौजूदगी प्रतीकात्मक है, निर्णायक नहीं। यह दर्शाता है कि भाजपा सत्ता के शीर्ष स्तर पर स्थिरता चाहती है, जबकि राज्यों और संगठन में प्रयोग की गुंजाइश रखती है।
स्थायी शक्ति-केंद्रों का खात्मा
प्रदेशों में स्थायी शक्ति-केंद्रों पर अंकुश मोदी युग की राजनीति की सबसे अहम विशेषता है। यही वजह है कि शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे, रमन सिंह और बीएस येदियुरप्पा जैसे दिग्गज नेताओं को राज्यों की राजनीति से शक्तिविहीन किया गया है। साथ ही राजस्थान, मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में बहुमत मिलने के बावजूद इन नेताओं की उम्मीदों पर तुषारापात करते हुए जिस तरह नए चेहरों को सत्ता की कमान सौंपी गई, उसका संदेश साफ था कि चुनावी सफलता भी सत्ता की स्थायी गारंटी नहीं है। शिवराज को केंद्र में लाकर मंत्री बना दिया गया। रमन ठंडे बस्ते में हैं। वसुंधरा अब भी अपनी सियासी जमीन बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। इसके उलट, पुष्कर सिंह धामी जैसे नेता को चुनाव हारने के बावजूद न सिर्फ मुख्यमंत्री बनाया गया, बल्कि उन्हें राजनीतिक रूप से स्थापित होने का लगातार मौका दिया जा रहा है।
राजनीति का केंद्रीयकरण
इस पूरी प्रक्रिया ने भाजपा को एक बार फिर राजनीति के केंद्रीयकरण वाली यानी “आलाकमान पार्टी” बना दिया है, जबकि भाजपा इसी सियासी केंद्रीयकरण को मुद्दा बनाते हुए कांग्रेस नेतृत्व को पानी पी-पीकर कोसती रही है। कांग्रेस दुर्दिनों में है तो भाजपा के फैसले अब मोदी-शाह के इर्दगिर्द केंद्रित हैं। भाजपा के पैतृक संगठन राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) की पारंपरिक परामर्श भूमिका भी तुलनात्मक रूप से सीमित हो गई है। नितिन नवीन का चयन भी इसी बदलाव की ओर इशारा करता है। वे न तो आरएसएस के सीधे पसंदीदा हैं, न किसी बड़े नेता के प्रतिनिधि। हालांकि आरएसएस के लिए भी इस नियुक्ति में एक संतोष हो सकता है कि 45 से 55 वर्ष की उम्र के बीच, साफ छवि वाला, गैर-विवादित नेता शीर्ष पर पहुंचा है।
सैंकड लाइन अब भी चिंता
भाजपा के भीतर एक चिंता लगातार उभरती है और वह है दूसरी पंक्ति के नेतृत्व का अभाव। मोदी-शाह की जोड़ी पार्टी को चुनावी मशीन बना चुकी है, लेकिन उनके नीचे वैसी मज़बूत परत दिखाई नहीं देती, जैसी वाजपेयी-आडवाणी दौर में थी। उस समय जेटली, सुषमा स्वराज, प्रमोद महाजन, वेंकैया नायडू और उमा भारती जैसे नेता पार्टी की वैचारिक और संगठनात्मक रीढ़ थे। आज ऐसे नाम दिखाई नहीं देते, जो नाम हैं वे मोदी-शाह की परिभाषा में फिट नहीं बैठते।
नितिन के लिए भी चुनौती
नितिन नवीन के लिए भी भाजपा नेतृत्व या यूं कहें कि मोदी-शाह की रणनीति के अनुरूप चलना दुधारू तलवार पर चलने से कम नहीं है। हालांकि वे अब निर्वाचित राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, लेकिन स्वतंत्र रूप से फैसले कर पाना उनके लिए किसी चुनौती से कम नहीं होगा। पहली चुनौती तो उन्हें अपनी संगठनात्मक टीम खड़ी करने के दौरान ही झेलनी पड़ सकती है। अगर वे सिर्फ मौजूदा ढांचे को आगे बढ़ाते हैं, तो कहा जाएगा कि वे रिमोट की तरह ही काम कर रहे हैं। ऐसे में पहले तो उम्र में बड़े और अनुभवी लोगों को अपनी टीम में जोड़ना उनके लिए मुश्किल भरा होगा और जोड़ भी लेते हैं तो सामंजस्य में दिक्कत आ सकती है। खुद पार्टी के वरिष्ठ नेता मानते हैं कि 140 करोड़ की आबादी वाले देश की सत्ता चलाने वाली पार्टी पूरी तरह नई टीम के भरोसे नहीं चल सकती। अनुभव और ऊर्जा—दोनों चाहिए।
नितिन नवीन फिलहाल मोदी-शाह की छत्रछाया में हैं। उस से निकलकर अपनी पहचान बनाना आसान नहीं होगा, खासकर उस पार्टी में, जहां फैसले ऊपर से नीचे आते हैं। मोदी युग की भाजपा में यही नई कसौटी है। और, शायद यही इस पूरी कवायद का सार भी है कि चेहरे बदलते रहेंगे, सत्ता घूमती रहेगी, लेकिन नियंत्रण एक ही केंद्र में रहेगा।
उम्र की सीमा हो….
भाजपा के मुख्यमंत्री चयन का विश्लेषण करें तो एक स्पष्ट पैटर्न उभरता है। अभी भाजपा 14 राज्यों में सत्ता में है। इनमें से केवल पांच मुख्यमंत्री शपथ ग्रहण के समय 55 वर्ष से अधिक आयु के थे। शेष 9 मुख्यमंत्री 55 वर्ष से कम उम्र के थे। पिछले चार वर्षों में भाजपा मुख्यमंत्रियों की औसत शपथ ग्रहण आयु 54 वर्ष रही है। भारतीय राजनीति के परंपरागत मानकों में यह अपेक्षाकृत कम मानी जाएगी, जहां मुख्यमंत्री अक्सर अपने राजनीतिक जीवन के उत्तरार्ध में शीर्ष पद तक पहुंचते रहे हैं।
आंकड़ों पर नजर
55 से अधिक उम्र वाले मुख्यमंत्री (5) – मानिक साहा, त्रिपुरा (70), भूपेंद्र पटेल, गुजरात (60), विष्णु देव साय, छत्तीसगढ़ (59), मोहन यादव, मध्य प्रदेश (58) और भजनलाल शर्मा, राजस्थान (56)
55 से कम उम्र वाले मुख्यमंत्री (9) – पेमा खांडू, अरुणाचल प्रदेश (44), हिमंत बिस्वा सरमा, असम (52), रेखा गुप्ता, दिल्ली (50), गोवा प्रमोद सांवत (48), नायबसिंह सैनी, हरियाणा (54), देवेंद्र फड़नवीस, महाराष्ट्र (54), मोहन मांझी, ओडिशा (52), योगी आदित्यनाथ, उत्तर प्रदेश (49), पुष्करसिंह धामी उत्तराखंड (46)
केंद्रीय मंत्रिमंडल
21 मंत्री 55 वर्ष से अधिक उम्र के
केवल 5 मंत्री 55 वर्ष से कम उम्र के
मंत्रिमंडल की औसत आयु 59 वर्ष
सबसे वरिष्ठ मंत्री राव इंद्रजीत सिंह (74 वर्ष)
सबसे युवा मंत्री रक्षा निखिल खडसे (37 वर्ष)
प्रदेश अध्यक्ष
20 राज्य अध्यक्षों की उम्र 55 वर्ष से अधिक
14 राज्य अध्यक्ष 55 वर्ष से कम उम्र के
प्रदेशाध्यक्षों की औसत आयु 58 वर्ष






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