होली से पहले बाजार की रंगीन गुलाल गाथा
अब होली पर रासायनिक रंगों से ज्यादा खतरा बाजार के हाल से बिगड़े रंगों का है।

अब होली पर रासायनिक रंगों से ज्यादा खतरा बाजार के हाल से बिगड़े रंगों का है। पहले लोग पूछते थे भैया, गुलाल में केमिकल तो नहीं? अब पूछते हैं भैया, सोने में गिरावट तो नहीं?” फर्क बस इतना है कि पहले त्वचा जलती थी, अब सीधा दिल जलता है। होली का त्योहार आते ही जहां घरों में पकवानों की खुशबू फैलनी चाहिए, वहीं इन दिनों सर्राफा बाजार और शेयर बाजार की खबरों से लोगों के माथे से धुआं निकल रहा है।
होली आने से पहले ही सोना-चांदी रंग बदलने में जुट गए हैं। कभी लाल, कभी हरे, तो कभी सीधे आसमान की ओर उड़ते भाव देखकर सर्राफ भी माथा खुजाने लगे हैं और ग्राहक जेब टटोलने लगे हैं। हालत यह है कि कल तक जो अंगूठी ,बस अभी ले लेते हैं वाली थी, आज त्योहार बाद देखेंगे की श्रेणी में पहुंच गई है। दुकानों में ग्राहक ऐसे दाखिल होते हैं जैसे किसी रिश्तेदार के यहां उधार मांगने आए हों धीमे कदम, झुकी नजर और पहले ही मन में तय कि ज्यादा देर रुकना नहीं है।
बाजार में चर्चा है कि होली पर अब लोग गुलाल कम और रेट लिस्ट ज्यादा उड़ाएंगे। बच्चे रंग उड़ाएंगे, बड़े भाव उड़ाएंगे। कोई कह रहा है, सोना निवेशकों के लिए डीजे पर नाच रहा है, तो चांदी कभी ढोल बजा रही है, कभी चुपचाप कोने में बैठकर भाव बदल रही है। सर्राफा बाजार में ग्राहक आते हैं, भाव सुनते हैं, अरे बाप रे कहते हैं और ऐसे गायब होते हैं जैसे उधार मांग लिया हो। दुकानदार मन ही मन सोचता है ग्राहक नहीं आया, बस “भाव सुनने वाला दर्शक” आया था।
इधर शेयर बाजार ने भी तय कर लिया है कि होली से पहले ही लोगों को रंग दिखा दिए जाएं। अमरीका की नीति ने शेयर बाजार को ऐसा रंग लगाया कि हरा देखते-देखते लाल हो गया, और निवेशक समझ ही नहीं पाए कि यह होली का रंग है या दिल का दौरा। कल तक जो शेयर भाग्यशाली घोड़ा बने दौड़ रहे थे, आज वही “लंगड़े गधे” की तरह कोने में बैठे सुस्ता रहे हैं।
टीवी चैनलों पर एंकर ऐसे समझा रहे हैं मानो बाजार नहीं, कोई पारिवारिक ड्रामा चल रहा हो। अमरीका नाराज़, बाजार उदास।नीचे टिकर चलता है, ऊपर एंकर गरजता है और बीच में निवेशक पसीना पोंछता है। निवेशक मोबाइल खोलते हैं, स्क्रीन देखते हैं, गहरी सांस लेते हैं और कहते हैं, आज तो चाय भी फीकी लगेगी। कुछ तो ऐसे हैं जो मोबाइल देखकर तुरंत पावर बटन दबा देते हैं, मानो स्क्रीन बंद करते ही नुकसान भी बंद हो जाएगा।
कुछ लोग इसे वैश्विक असर बता रहे हैं, कुछ इसे विदेशी छींक और देसी जुकाम कह रहे हैं। हकीकत यह है कि नीति की एक खांसी से यहां पोर्टफोलियो को बुखार आ गया। पहले बुखार में लोग काढ़ा पीते थे, अब निवेशक लॉन्ग टर्म का काढ़ा पीकर खुद को समझाते हैं।
होली के मौके पर जहां लोग एक-दूसरे को रंग लगाते हैं, वहीं इस बार बाजार ने सबको अपने-अपने रंग लगा दिए हैं। किसी को लाल, किसी को पीला और किसी को सीधा नीला कर दिया है। फर्क बस इतना है कि ये रंग न पानी से उतरते हैं, न साबुन से।
बाजार की इस होली में सबसे ज्यादा मजे वे लोग ले रहे हैं, जिनके पास न सोना है, न शेयर। वे आराम से बोलते हैं भैया, हमारा क्या बिगड़ेगा? असली परेशानी उनकी है, जिन्होंने बचत को भविष्य की सुरक्षा समझकर निवेश किया और अब भविष्य ही उन्हें आंखें दिखा रहा है।
हालत यह है कि इस बार होली पर लोग एक-दूसरे से यह नहीं पूछेंगे कि कौन सा रंग लगाया, बल्कि यह पूछेंगे कि आज बाजार ने कौन सा रंग दिखाया। और सच तो यह है कि शेयर बाजार में रंग बदलने के लिए गुलाल नहीं, सिर्फ एक बयान काफी है, जबकि सोना-चांदी तो पहले से ही रंगों के उस्ताद बने बैठे हैं।






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