सामरिक ऊंचाई और आर्थिक चुनौतियां
जहां वाशिंगटन ने भारत के मानचित्र पर मुहर लगाकर कूटनीतिक जीत का मार्ग प्रशस्त किया है, वहीं मास्को से तेल खरीद और घरेलू कृषि सुरक्षा को लेकर दिल्ली की 'टाइटरोप वॉक' शुरू हो गई...

भारत-अमेरिका व्यापार समझौता
भारत और अमेरिका के बीच हालिया अंतरिम व्यापारिक सहमति केवल दो देशों के बीच आयात-निर्यात का आंकड़ा भर नहीं है, बल्कि यह बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन का एक नया अध्याय है। ‘बड़ी डील’ की दिशा में बढ़े इन कदमों ने स्पष्ट कर दिया है कि नई दिल्ली अब बीजिंग के मुकाबले दुनिया के लिए सबसे भरोसेमंद ‘सप्लाई चेन’ बनने की दौड़ में सबसे आगे है। इस समझौते के केंद्र में भारत का वह आत्मविश्वास है, जहां वह एक ओर अमेरिकी बाजार में अपनी पैठ मजबूत कर रहा है, तो दूसरी ओर अपनी क्षेत्रीय अखंडता पर वैश्विक महाशक्ति की मुहर लगवाने में भी सफल रहा है।
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कूटनीतिक विजय और रणनीतिक संकेत
इस समझौते का सबसे चौंकाने वाला और सुखद पहलू व्यापार से इतर रणनीतिक है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय द्वारा साझा किए गए नक्शे में पीओके और अक्साई चिन को भारत का अभिन्न हिस्सा दिखाना एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि है। यह संकेत देता है कि अमेरिका अब दक्षिण एशिया में भारत की संप्रभुता को लेकर अधिक मुखर और सकारात्मक है। इसके साथ ही, भारतीय उत्पादों (विशेषकर फार्मा और इंजीनियरिंग) पर टैरिफ को 50% से घटाकर 18% करना भारतीय विनिर्माण क्षेत्र के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है।
क्या सस्ता और क्या महंगा?
एक आम उपभोक्ता और उद्योगपति के लिहाज से इस समझौते के मिलेजुले परिणाम होंगे। भारत ने अमेरिकी औद्योगिक वस्तुओं और कुछ चुनिंदा कृषि उत्पादों के लिए अपने दरवाजे खोले हैं-
ये सस्ता होगा: अमेरिकी तकनीक, प्रीमियम बाइक, लक्जरी कारें, अखरोट, बादाम और ताजे फल अब भारतीय बाजारों में कम कीमतों पर उपलब्ध हो सकते हैं। साथ ही, चिकित्सा उपकरण और घरेलू सजावट के सामान पर आयात शुल्क घटने से इनकी पहुंच बढ़ेगी।
महंगा होने की आशंका: इस सिक्के का दूसरा पहलू ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा है। यदि अमेरिका के दबाव में रूस से कच्चे तेल का आयात प्रभावित होता है या उस पर 25% पेनाल्टी लगाई जाती है, तो देश में पेट्रोल, डीजल और माल ढुलाई की लागत बढ़ना तय है।
अवसर बनाम आशंकाएं
यदि निष्पक्ष नजरिए से देखें तो यह समझौता भारत के लिए ‘अवसरों का द्वार’ भी है और ‘सावधानी की घंटी’ भी।
लाभ का पक्ष: भारत-यूरोपीय संघ के बीच प्रस्तावित एफटीए और अब अमेरिका के साथ यह समझ, भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करती है। जेनेरिक दवाओं और रत्न-आभूषणों पर शून्य टैरिफ से भारत का विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होगा।
जोखिम का पक्ष: समझौते की सबसे कमजोर कड़ी ‘रूस-तेल-पेनाल्टी’ का त्रिकोण है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए मास्को पर निर्भर है, जबकि रणनीतिक भविष्य के लिए वाशिंगटन जरूरी है। यदि अमेरिकी पेनाल्टी प्रभावी होती है, तो भारतीय निर्यातकों को मिलने वाला टैरिफ लाभ तेल की बढ़ी हुई कीमतों की भेंट चढ़ सकता है। इसके अलावा, डेयरी और पोल्ट्री सेक्टर को भले ही फिलहाल सुरक्षित रखा गया हो, लेकिन भविष्य में अमेरिकी लॉबी का दबाव भारतीय किसानों के लिए चुनौती बन सकता है।
बहरहाल भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि 1.4 अरब भारतीयों की ‘ऊर्जा सुरक्षा’ उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल का यह रुख कि संवेदनशील कृषि उत्पादों पर कोई समझौता नहीं होगा, घरेलू हितों की रक्षा की प्रतिबद्धता दर्शाता है। हालांकि, विपक्षी दलों और किसान संगठनों के विरोध के स्वर बताते हैं कि सरकार को इस डील के सूक्ष्म बिंदुओं पर और अधिक पारदर्शिता बरतनी होगी। अंततः, यह समझौता भारत की उस ‘स्वतंत्र विदेश नीति’ की परीक्षा है, जहां उसे आर्थिक महाशक्ति बनने के लिए अमेरिका का साथ भी चाहिए और अपनी संप्रभुता बनाए रखने के लिए रूस के साथ पुराने रिश्तों का संतुलन भी।





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