षष्ठीपूर्ति– आयु नहीं अनुभूति का उत्सव
षष्ठीपूर्ति केवल आयु का पड़ाव नहीं, बल्कि आत्मावलोकन और जीवन परिष्कार का संस्कार है। यह परंपरा मनुष्य को अतीत की समीक्षा वर्तमान की समझ और भविष्य के संकल्प की दिशा देती...

आत्मचिंतन
डा0 राकेश तैलंग,
शिक्षाविद्
यह हम सनातनी परम्परा के अनुवर्त्ती भारतीयों के लिए रोचक विमर्श का विषय होना चाहिए कि वे प्राचीन परम्पराएं जो हमें अपने समस्त ईश्वर प्रदत्त मानव जीवन के विभिन्न आयु क्रम में हमारा मार्गदर्शन करती हैं, श्रेष्ठ सामाजिक व्यवहार की दिशा में उत्कर्ष के लिए रास्ता बताती हैं और आत्मालोचन के अवसर देती हैं कि हम कौन थे, क्या हो गए और क्या होंगे अभी। इस दृष्टि से दक्षिण भारत से मूलत: उद्भूत और समस्त भारतवर्ष में एक सामाजिक महोत्सव के रूप में स्थापित षष्ठीपूर्त्ति परंपरा पर चर्चा प्रासंगिक बनती है। अंतत: साठ वर्ष की वय में राज्य सेवा से निवृत्त होने वाले कार्मिक के जीवन का यह दिन इसी कारण महत्वपूर्ण है।
षष्ठीपूर्त्ति एक वैदिक अनुष्ठान है, जिसे साठ वर्ष की पूर्णता पर आयु चक्र के एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में आयोजित किया जाता है। यह सामान्यत: षष्ठीपूर्त्ति, षष्ठ्यपर्थपूर्त्ति, अरुबाधाम्कल्याणम्, सदाभिषेक के नाम से जाना जाता है। सनातन मान्यताओं के अनुसार मनुष्य की वय 120 वर्ष की मानी गई है। इसलिए षष्ठीपूर्त्ति अर्द्ध वार्षिकी की पूर्णता का वर्ष है। मूलत: इसका स्रोत दक्षिण भारत की द्राविड़ परम्परा है, जहां साठ वर्षीय विवाह की पूर्णता पर भी इसे उत्सव के रूप में परिवार के पुत्र- पुत्री, पौत्र- पौत्रियों व कुटुंबजन के साथ मनाया जाता है। व्यक्ति इस अवसर पर अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य के बारे में विचार कर प्रसन्न होता है और अपने अनुभवोँ को परिजन के साथ साझा कर वर्तमान और भविष्य के लिए परिजन का मार्गदर्शन भी करता है। कतीत का स्मरण, वर्तमान की समीक्षा और भविष्य की योजना सुनिश्चित करने का यह पर्व है।
षष्ठीपूर्त्ति दिवस एक अन्य दृष्टि से आने वाले वानप्रस्थ आश्रम के लिए अब तक की गई गलतियों के स्वीकार के साथ शुद्धिकरण के संकल्प का दिवस भी है। यह व्यक्तित्व में परिष्कार की चेतना के स्फुरण और संकल्प का पर्व भी है। इसीलिए इसे “प्रायश्चित कर्म दिवस” के नाम से भी जाना जाता है।
समग्रत: आत्म प्रेक्षण की इस अंत: प्रक्रिया में अत्यधिक सहनशील और स्वयं के तटस्थ अन्वेषण की जहां आवश्यकता है, वहीं अब आगे से शेष रही जीवन यात्रा में सभी सम्पर्क आने वाले व्यक्तियों व परिस्थितियों के बारे में अन्य की सर्वमान्य धारणा की स्थापना की परिस्थिति विकसित करने के प्रयास का संकल्प दिवस भी है।
‘स्व’ से ‘सर्व’ के चिंतन का मार्ग
षष्ठीपूर्ति का यह सोपान मात्र कालखंड की गणना नहीं, अपितु संचित अनुभवों की पोटली से लोक-कल्याण के मोती चुनने का अवसर है। साठ की आयु तक पहुंचते-पहुंचते मनुष्य वैयक्तिक महत्वाकांक्षाओं और ‘स्व’ के संकुचित घेरे से मुक्त होकर ‘सर्व’ के व्यापक चिंतन की ओर अग्रसर होता है। यह वह संधि-वेला है जहां व्यक्ति अपने व्यावसायिक कौशल और सामाजिक अनुभवों की विरासत अगली पीढ़ी को सौंपने की मानसिक तैयारी करता है। जिस प्रकार एक वृक्ष अपने पूर्ण विस्तार के बाद फल और छाया से अन्यों को तृप्त करता है, ठीक उसी प्रकार षष्ठीपूर्ति का साधक भी अपनी वैचारिक परिपक्वता से समाज को दिशा देने का उत्तरदायित्व स्वीकार करता है। यह उत्सव हमें बोध कराता है कि जीवन की सार्थकता केवल दीर्घायु होने में नहीं, बल्कि उस परिष्कृत दृष्टि में है जो शेष जीवन यात्रा को ‘सेवा’ और ‘समर्पण’ के यज्ञ में आहूत करने का पावन संकल्प देती है।
हमारे प्राचीन ग्रंथों में ऋषिवृंद ने षष्ठीपूर्त्ति दिवस पर कुछ इस तरह का आशीर्वाद अर्द्धवार्षिकी पूर्ण करने वाले व्यक्ति को दिया है-
आयुष्मन्तं ध्रुवं देवं स्वस्थं
आरोग्यवान् सदा।
सम्पन्नम् पुत्र पौत्रैश्च
दीर्घायुस्तु सर्वदा..
—————–






No Comment! Be the first one.