सियासत के ‘धुरंधर’ निकले नीतीश बाबू
बोल हरि बोल हरीश मलिक,व्यंग्यकार और स्तंभकार आजकल तीन ही चीजें सुर्खियों में हैं। राजनीति में नीतीश बाबू, मनोरंजन में धुरंधर-2 का नकली युद्ध और दुनियाभर में शांति से क्रांति करने वाले डोनाल्ड डक का...

बोल हरि बोल
हरीश मलिक,
व्यंग्यकार और स्तंभकार
आजकल तीन ही चीजें सुर्खियों में हैं। राजनीति में नीतीश बाबू, मनोरंजन में धुरंधर-2 का नकली युद्ध और दुनियाभर में शांति से क्रांति करने वाले डोनाल्ड डक का असली युद्ध। राजनीति की कुर्सी से नीतीश बाबू का रिश्ता वैसा ही है, जैसे बरसों पुरानी चारपाई से गांव के बुजुर्ग का होता है। चरमराती रहे, डगमगाती रहे, पर छोड़ने का नाम नहीं। अब उनने कुर्सी को साथ लेकर डिब्बा बदल लिया है। पहले वे राज्य नामक डिब्बे में रहे और अब राज्यसभा वाले में आ गए हैं। मनोरंजन में धुरंधर-2 का युद्ध है, जिसमें जितनी गोलियां हैं, उतना ही ज्यादा बैकग्राउंड म्यूजिक है। कई बार दर्शक कन्फ्यूजिया जाते हैं कि दुश्मन गोली से घायल हुआ है या फिर बैकग्राउंड म्यूजिक का कायल होकर बेसुध पड़ा है। उधर दुनिया के रंगमंच पर ‘डोनाल्ड डक’ शांति का नोबेल मांगते-मांगते असली युद्ध में कूद पड़े हैं। मानो कार्टून नेटवर्क से सीधे न्यूज चैनल में ट्रांसफर हो गए हों। राजनीति में पटकथा लग रही है, फिल्मों में रणनीति चल रही है और दुनिया की कूटनीति में कार्टून जैसा ट्विस्ट है। आम आदमी रिमोट हाथ में लिए बैठा सोच रहा है कि ये जो चल रहा है, वो खबर है, फिल्म है या किसी बड़े-से मजाक का लाइव टेलीकास्ट!
परिवारवाद नहीं, अनुभव का हस्तांतरण
पहले बात उन बिहारी बाबू की, जिनकी राजनीति बड़ी अद्भुत रही है। जैसे कोई तपस्वी सालों तक त्याग का प्रवचन दे और अंत में पता चले कि उसकी तपस्या दरअसल कुर्सी के चारों पायों के इर्द-गिर्द ही चल रही थी। दस बार शपथ लेकर उन्होंने लोकतंत्र को ऐसा घुमा दिया कि जनता को भी लगा कि शायद शपथ ही उनका असली काम है, शासन तो बीच-बीच में टाइम पास के लिए करते हैं।
सबसे मजेदार बात यह है कि जो नेता वर्षों तक परिवारवाद को लोकतंत्र की सबसे बड़ी बीमारी बताते रहे, वही अब इलाज के नाम पर अपने ही घर का पर्चा लिख रहे हैं। दरअसल, राजनीति में एक उम्र के बाद नेताजी को ‘वंश परंपरा’ का संस्कार याद आ ही जाता है। जैसे कोई व्यक्ति जीवन भर मिठाई को कोसता रहे और बुढ़ापे में हलवाई की दुकान खोल ले। अब देखना यह है कि यह नया ‘परिवारिक प्रयोग’ बिहार की जनता के लिए दवाई बनता है या फिर किसी बीमारी का नया पैकेज बनकर सामने आता है।
नीतीश का राजनीति से रिश्ता कुछ ऐसा रहा है जैसे पुराने जमाने का रेडियो हो। उसे बार-बार ट्यून करो, फिर भी वही आवाज आती रहती है। फर्क इतना कि यहां तरंगें बदलती रहीं, लेकिन स्टेशन “मुख्यमंत्री” ही बना रहा। अब उन्होंने खुद ही स्वेच्छा से सीएम कुर्सी छोड़ने का निर्णय लिया है, तो राजनीति के दर्शक दीर्घा में बैठे लोग चश्मा साफ करके देख रहे हैं कि कहीं चैनल बदल गया है या फिर वही पुराना कार्यक्रम नए एंकर के साथ आ रहा है? राजनीति में बड़ा सुंदर सिद्धांत है कि जिसकी सबसे ज्यादा आलोचना होती है, वही चीज सबसे उपयोगी निकल आती है। अब बेटा राजनीति में आएगा तो इसे ‘परिवारवाद’ नहीं, ‘अनुभव का हस्तांतरण’ कहा जाएगा। आखिर लोकतंत्र भी एक पारिवारिक उत्सव ही तो है, जहां कुर्सियां नहीं बदलतीं, बस बैठने वाले रिश्तेदार बदल जाते हैं!
रिवेंज और रिवेन्यू साथ-साथ दौड़ रहे
‘धुरंधर-2: द रिवेंज’ देखकर लगता है कि यह एक ऐसी फिल्म है, जिसमें रिवेंज और रिवेन्यू साथ-साथ दौड़ रहे हैं। दोनों में आगे निकलने की रेस है। कहानी में कभी-कभी हीरोइन नाम की चिड़िया आती है, फिर शरमा कर चली जाती है। और उसकी जगह हिंसक एक्शन, डायलॉग, मारकाट और बैकग्राउंड म्यूजिक अपना-अपना स्टॉल लगा लेते हैं। हीरो हर सीन में ऐसा लगता है जैसे बदला लेने नहीं, रिकॉर्ड बनाने निकला हो। कभी-कभी हीरो का गुस्सा इतना पुराना लगता है जैसे अलमारी में रखा वो सूट, जो हर शादी में निकल आता है। फिट आए या न आए, पहनना तो उसी को है। और विलेन भाई तो इतनी गंभीर एक्टिंग में व्यस्त है, मानो देश की अर्थव्यवस्था उसी के कंधों पर टिकी हो।
फिल्म में एक खास बात यह है कि हर किरदार खुद को ‘धुरंधर’ साबित करने में लगा है। बस दर्शक को ही समझना बाकी है कि असली धुरंधर कौन है? जो बदला ले रहा है, या जो फिल्म बना रहा है? जो करोड़ों लगाकर अरबों कमा रहा है या वो जनता-जनार्दन धुरंधर है, जिसने पेड प्रिव्यू शो में ही ऐतिहासिक रिकॉर्ड बना दिया? असली धुरंधर एक्शन है या फिर सच्ची घटनाओं को फ्रेम दर फ्रेम जोड़ने वाली कहानी है? दर्शक भी सोचता है कि अगला सीन किसी सच्ची कहानी का होगा या फिर सिर्फ कमाई का।
धुरंधर की पहले ही दिन 100 करोड़ से ज्यादा की कमाई! इससे लगता है कि हमारे यहां फिल्में देखी नहीं जातीं, मनाई जाती हैं- जैसे त्योहार या पर्व हो। कोई कहानी पूछे तो कहेंगे, ‘अरे छोड़िए, कलेक्शन देखिए!’ अब सिनेमा का गणित राष्टवाद से जुड़ गया है। जहां 2+2 चार नहीं, सीधे 100 करोड़ भी होते हैं। एक धुरंधर बॉक्स ऑफिस भी है, जिसने एक दिन में ही सबको समझा दिया कि बदला नहीं, ‘कलेक्शन’ ही सिनेमा का असली धर्म है। अब यह सिद्ध हो गया है कि समाज में तर्क की नहीं, टिकट खिड़की की जीत होती है। व्यंग्य पूरा बांच लिया ना। अब जाइए धुरंधर-2 देख ही आइए। वास्तव में पूरा पैसा वसूल मूवी है भइए!






No Comment! Be the first one.