भीतर से दरकता मकराना
मकराना का गौरव दरक रहा है। ब्रांड मकराना पर संकट का साया मंडरा रहा है। संगमरमर भीतर से कमजोर हो रहा है। तापमान और प्रदूषण इसका दुश्मन बन चुके हैं। चेतना अब जरूरी...

राजस्थान की धरोहर मकराना पर मौन खतरा
रमेश शर्मा,
वरिष्ठ पत्रकार
राजस्थान की धरती से निकला एक पत्थर दुनिया की सबसे खूबसूरत इमारतों में चमक रहा है। लेकिन विडंबना यह है कि वही मकराना का संगमरमर आज अपने घर में ही असुरक्षित है। जिस पत्थर ने आगरा के विश्वप्रसिद्ध ताजमहल को अमर बनाया, जिसने माउंट आबू के दिलवाड़ा मंदिर की नक्काशी को दिव्यता दी और जिसने जोधपुर के जसवंत थड़ा को अद्भुत श्वेत आभा दी, उसी पत्थर के भविष्य पर सवाल उठ रहे हैं। मकराना का संगमरमर धीरे धीरे अपनी पहचान का मोहताज होता जा रहा है। राजस्थान के इस गौरव को बचाने के लिए सरकारी हस्तक्षेप की प्रतीक्षा है।
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मकराना संगमरमर की खासियत उसकी मजबूती और चमक ही है। वैज्ञानिक कह रहे हैं असली खतरा सतह पर नहीं, भीतर है। आईआईटी मुंबई की शोधकर्ताओं अनुपमा घिमिरे और प्रो. स्वाति मनोहर ने अपने अध्ययन में पाया कि तापमान में बदलाव से संगमरमर के भीतर ‘खुली सरंध्रता’ बढ़ती है, यानी उसमें सूक्ष्म छिद्र बनते जाते हैं। इन छिद्रों से पानी, हवा और प्रदूषण भीतर घुसते हैं। धीरे धीरे मजबूती घटती है। परतें झड़ती हैं। दाग बढ़ते हैं। और जब तक नुकसान आंखों से दिखता है, तब तक पत्थर काफी हद तक कमजोर हो चुका होता है। उन्होंने प्रयोगशाला में संगमरमर को गर्म और ठंडा करने के चक्रों से गुजारा। इससे यह समझने में मदद मिली कि कितनी गर्मी और कितने चक्रों से पत्थर कितना कमजोर होता है।
मकराना संगमरमर क्यों खास?
– अत्यंत सघन और कम सरंध्रता वाला
– जल रिसाव के प्रति प्रतिरोधी
– सदियों तक टिकाऊ
– अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘हेरिटेज स्टोन’ का दर्जा
क्या खदानों में भी दरारें हैं?
स्थिति स्पष्ट करना जरूरी है कि खदान से निकलने वाला नया मकराना संगमरमर सामान्यतः सघन होता है, बड़े ठोस ब्लॉकों में निकलता है व संरचनात्मक रूप से मजबूत होता है।
तीन स्तर पर जोखिम-
1- प्राकृतिक भूगर्भीय दरारें: हर संगमरमर खदान में कुछ ‘नेचुरल जॉइंट्स’ या प्राकृतिक फॉल्ट लाइनें होती हैं। खनन के दौरान बड़े ब्लॉकों को इन्हीं प्राकृतिक रेखाओं के आधार पर काटा जाता है। ये दरारें पत्थर की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती हैं।
2- खनन तकनीक से उत्पन्न सूक्ष्म दरारें कई बार विस्फोट से भी आती हैं। अत्यधिक मशीन कंपन, अनुचित कटिंग एंगल से भी सूक्ष्म माइक्रो-क्रैक बनते हैं।
3- खनन के बाद जब पत्थर वर्षों तक धूप, ठंड, नमी और प्रदूषण झेलता है, तो उसमें पर्यावरणीय प्रभाव दिखाई देते हैं।
खतरे के संकेत : सतह का खुरदरा होना, सूक्ष्म दरारें, दाग-धब्बे, परतों का झड़ना व ध्वनि तरंग की गति में कमी (UPV टेस्ट)।
क्या कहते हैं शोध
हालिया शोधों में पाया गया कि बार-बार गर्म और ठंडा होने की प्रक्रिया संगमरमर को भीतर से कमजोर करती है। प्रयोगशाला में 180°C से 400°C तक के तापीय चक्रों से वही असर तैयार किया गया जो दशकों में स्मारकों पर होता है। वैज्ञानिक पराश्रव्य स्पंद वेग परीक्षण करते हैं। इसमें पत्थर के भीतर ध्वनि तरंगें भेजी जाती हैं। अगर तरंगें धीरे चलती हैं, तो समझा जाता है कि पत्थर के भीतर दरारें और छिद्र बढ़ चुके हैं। शोध में यह प्रमाणित हुआ कि इस टेस्ट से संगमरमर की स्थिति बिना तोड़े-फोड़े सही तरीके से जानी जा सकती है। यानी यह धरोहर संरक्षण के लिए बेहद उपयोगी है। सवाल यह है कि क्या राजस्थान की सभी प्रमुख धरोहरों और खदानों पर नियमित रूप से इस तकनीक से परीक्षण किया जा रहा है?
प्रदूषण और जलवायु
तापमान में बढ़ता अंतर, वाहनों और औद्योगिक इकाइयों का धुआं तथा नमी के साथ जलाशयों का प्रभाव इन सबका संयुक्त असर संगमरमर को खुरदरा और दागदार बना रहा है। राजस्थान में गर्मियों की तीव्रता और सर्दियों की ठंडक का अंतर अब पहले से ज्यादा है।
संसाधन बनाम संरक्षण
मकराना की खदानें सीमित हैं। बढ़ती मांग और निर्यात दबाव भविष्य की आपूर्ति पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं। सवाल यह भी है कि अगर मूल स्रोत कमजोर होगा, तो मरम्मत के लिए समान गुणवत्ता का पत्थर कहां से आएगा? चूंकि मकराना क्षेत्र हजारों परिवारों की आजीविका से जुड़ा है। अगर खनन पर अचानक रोक या संसाधन क्षरण हुआ तो इसका व्यापक आर्थिक असर होगा। स्थानीय रोजगार पर इसका गहरा असर होगा।
– इसका संरक्षण नहीं किया गया तो अंतरराष्ट्रीय खरीदार इटली, तुर्की, वियतनाम की ओर रुख करेंगे। प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, जिससे कीमतों पर दबाव आएगा।
– अगर प्रमुख स्मारकों पर दाग होंगे, परत झड़ेगी या सतह पर खुरदरापन आएगा तो यह बदरंग दिखेगा, इसका सीधा असर पर्यटन पर होगा।
– खनन, कटिंग, पॉलिशिंग, परिवहन से जुड़े हजारों परिवारों का जीवन इससे जुड़ा हुआ है।
– उच्च गुणवत्ता वाले बड़े ब्लॉक कम मिलने लगे, माइक्रो-क्रैक प्रतिशत बढ़े तो लागत बढ़ेगी।
– गुणवत्ता नियंत्रण नहीं किया, वैज्ञानिक परीक्षण नियमित नहीं हुए, टिकाऊ खनन नीति लागू नहीं हुई तो भविष्य में ‘ब्रांड मकराना’ की चमक फीकी पड़ सकती है।
क्या हो समाधान..?
– UPV जैसी तकनीकों से नियमित जांच कर समय रहते नुकसान को पहचाना जाए।
– ताजमहल क्षेत्र जैसे संवेदनशील इलाकों में वाहनों और उद्योगों पर सख्त प्रदूषण नियंत्रण जरूरी है।
– आसपास के जलाशयों और नमी वाले क्षेत्रों का सही जल प्रबंधन किया जाए, ताकि जैविक दाग-धब्बों से बचा जा सके।
– ऐसे रसायन और कोटिंग विकसित की जाएं जो संगमरमर को सांस लेने दें, लेकिन पानी और प्रदूषकों को अंदर न जाने दें।
– मकराना संगमरमर के खनन को सीमित और वैज्ञानिक बनाया जाए, ताकि भविष्य की जरूरतें सुरक्षित रहें।






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