पुस्तकें ही गढ़ती हैं व्यक्तित्व
तेजी से बदलते डिजिटल दौर में पढ़ने की आदत कम होती जा रही है। नियमित अध्ययन न केवल ज्ञान और भाषा कौशल को बढ़ाता है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य, व्यक्तित्व विकास और सकारात्मक सोच का भी आधार बनता है।...

जीवन प्रबंधन : पढ़ने की आदत घटने से मानसिक क्षमता पर संकट
शारीरिक टीकाकरण तो देश में सफल हो चुका, लेकिन मानसिक टीकाकरण कार्यक्रम का क्या? ये यक्ष प्रश्न है। मानसिक टीकाकरण से अभिप्राय है मस्तिष्क की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना, मस्तिष्क को बुरी बातों से बचाना और दिमाग के कूड़े को निकालकर उसमें उत्तमता भरना। ये कार्य पूरा होता है स्वाध्याय से और पुस्तकें व अखबारों के अध्ययन से। वर्तमान समय में ये तत्त्व मानो कमज़ोर हो चला है। ऐसा लगता है कि आजकल कमाना, खाना पीना और सोशल मीडिया देखना ही जीवन बन गया है। व्यक्ति के पास पैसा है, सभी सुविधाएं हैं, शारीरिक फिटनेस भी है, लेकिन मेंटल फिटनेस की चिंता कतई नहीं है। मेंटल फिटनेस के लिए ज़रूरी है पढ़ना। कहा गया है कि ‘रोज़ दस पन्ने पढ़िए। आपके शब्द नदी की तरह बहेंगे।’ मस्तिष्क में नए विचारों को बढ़ाने या ज्ञानार्जन करने आदि मुद्दों पर समाज मौन है। दुनिया को उपनिषद, वेद और महान साहित्यिक कृतियां देने वाले देश का युवा आज रीडिंग के बजाय स्क्रॉलिंग में व्यस्त है। शोध के अनुसार, वर्तमान समय में युवा या बुज़ुर्ग, दोनों श्रेणियों में बढ़ते तनाव का एक कारण ये भी है कि वे कुछ भी अच्छा अध्ययन नहीं कर रहे हैं।
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कम होता पढ़ना
प्रसिद्ध कहावत है कि ‘एक पाठक मरने से पहले हजार जीवन जीता है, लेकिन जो नहीं पढ़ता वह केवल एक ही जीवन जीता है।’ इसका अभिप्राय स्पष्ट है कि पढ़ने से व्यक्ति में नए विचार तथा जीवन के नए दृष्टिकोण विकसित होते हैं। इस बात को ध्यान में रखकर विचार कीजिये कि आज के दौर का युवा या बालक, दस समाचार पत्रों या पत्र पत्रिकाओं के नाम बता पाने में असमर्थ क्यों हैं? प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं के अलावा कोई भी विद्यार्थी अखबार और शोधपरक सम्पादकीय नहीं पढ़ रहा? घरों से बच्चों की कॉमिक्स, लघु कथाओं की पुस्तकें, एक्टिविटी बुक्स गायब क्यों हो चली हैं? कारण स्पष्ट है- अध्ययन का अभाव। टीवी और मोबाइल पर अपने जीवन का समय खर्च करने वाले युवा, शिवाजी सामंत के मृत्युंजय में कर्ण का जीवंत चित्रण या मुंशी प्रेमचंद की बूढ़ी काकी का दर्द कैसे समझेंगे? इनके मस्तिष्क का, भावनाओं का विकास आखिर कैसे होगा? कुछ भी न पढ़ने और सिर्फ मोबाइल को स्क्रॉल करते रहने से समाज की स्थिति कितनी विस्फोटक होगी, यह गंभीर चिंता का विषय है।
चिंताजनक स्थिति
नेशनल यूथ रीडरशिप सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय युवाओं में गैर शैक्षणिक या साहित्यिक पुस्तकों को पढ़ने की प्रवृत्ति में पिछले एक दशक में चालीस से पचास प्रतिशत तक की गिरावट आई है। स्वयं से प्रश्न करना होगा कि गत एक साल के ऑनलाइन ऑर्डर्स में कितनी किताबें मंगवाई गईं? घर में मात्र एक अखबार के अलावा कितनी पत्र पत्रिकाएं मंगवाई जा रही हैं? बच्चों और युवाओं के साथ ही गृहलक्ष्मियां भी अखबार और करंट अफेयर्स से दूर हैं। जब उन्हें किसी विषय की जानकारी ही नहीं है तो वे चर्चा भी अनर्गल विषयों पर ही करेंगे और सिर्फ रील्स बनाने और देखने को ही सत्य मान लेंगे। कितना दुःखद है कि एक तरफ इंजीनियरिंग ग्रेज्युएट देश की रक्षा या विदेश नीति नहीं जानता तो दूसरी ओर एक इतिहास का स्नातक सल्तनत और मुग़ल काल को एक काल बता रहा है। पुस्तक उपहार में देना मानो बीते कल की बात है क्योंकि व्यक्ति स्वाध्याय से दूर है।
क्या कहता है शोध?
अच्छी पुस्तकों को जीवंत देव प्रतिमा कहा गया है। इसके इतने लाभ हैं जो कल्पना से परे हैं। अनेक शोध रिपोर्ट्स के अनुसार, पढ़ना व्यक्ति में आत्मविश्वास का बीजारोपण करता है।
एमोरी यूनिवर्सिटी के न्यूरो साइंटिस्ट्स के अनुसार, पढ़ने से मस्तिष्क की कार्य क्षमता सर्वोच्च स्तर को छूती है और सृजन आकार लेता है। भाषा, सृजन, लेखन, लीडरशिप और व्यक्तित्व के समग्र विकास के लिए पुस्तकों का अध्ययन अति आवश्यक है।
ससेक्स विश्वविद्यालय के शोध से स्पष्ट हुआ है कि सिर्फ छह मिनिट्स पुस्तक या अखबार आदि पढ़ने से तनाव को अड़सठ प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। पुस्तक पढ़ने से तनाव बढ़ाने वाले होर्मोन कोर्टिसोल का निकलना काफी कम हो जाता है और व्यक्ति को सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।
नेशनल इंस्टिट्यूट ऑन एजिंग की रिपोर्ट के अनुसार, नित्य पढ़ने से स्मृति लोप से जुड़ी बीमारियां जैसे अल्जाइमर्स और डिमेंशिया से बचा जा सकता है। भाषा के कौशल में वृद्धि, एकाग्रचित्तता का विकास तथा अच्छी नींद के लिए भी पढ़ना एक औषधि की तरह है।
बिब्लियोथेरेपी
निकोलस कार की पुस्तक ‘द शैलोज़’ के अनुसार, इंटरनेट का अत्यधिक उपयोग मस्तिष्क को केवल स्कैन करने और देखने भर के लिए प्रशिक्षित कर रहा है। इस कारण डीप रीडिंग, समझकर पढ़ने की प्रवृत्ति और क्रिटिकल थिंकिंग की क्षमता लगभग नष्ट हो रही है। इससे बचने के लिए बिब्लियोथेरेपी अच्छा उपाय है। वैज्ञानिकों के अनुसार, पढ़ना एक तरह की बिब्लियोथेरेपी है। बिब्लियोथेरेपी वो मनोवैज्ञानिक पद्धति है जिसमें पढ़ाई के द्वारा, मानसिक स्वास्थ्य सुधारा जाता है। येल यूनिवर्सिटी का शोध तो यहां तक कहता है कि पढ़ने वाले व्यक्ति, नहीं पढ़ने वालों से अधिक वर्ष जीते हैं। स्वाध्याय से व्यक्ति की कुत्सित सोच, घृणा और आपराधिक मानसिकता कम होती है।
पढ़ने से होगा विकास
एक साल में कम से कम छह पुस्तकें पढ़ने या प्रतिदिन न्यूनतम दस पृष्ठ पढ़ने से एक साल में लगभग तीन हज़ार पृष्ठ पढ़े जा सकते हैं। ऐसा करने से लगभग दस पुस्तकों का ज्ञान प्राप्त हो सकता है। यही ज्ञान- आत्मविश्वास, अच्छे सम्प्रेषण और वार्ताशैली का निर्माता है। तुच्छ विषयों में, कार्यालय की राजनीति में, परिवारों की छोटी मोटी बातों में ही अपने जीवन का अमूल्य समय नष्ट करने के पीछे का कारण भी अध्ययन नहीं करने की प्रवृत्ति ही है। मस्तिष्क में बुरे विचारों का कचरा भरने के बजाय स्वाध्याय करना उचित है। वर्तमान समय में बढ़ रहे अपराधों को कम करना हो या अपनी संस्कृति व मूल्यों का संरक्षण करना, पुस्तकों को पढ़ने की आदत से ही इन समस्याओं का समाधान मुमकिन है। पुस्तकों को पढ़ना, उनसे सीखना, उनसे दोस्ती करना, पुस्तकों के सान्निध्य में जीना, उनके शब्दों को जीवन में उतारने के लिए प्रयास करना, नया सीखना और सबसे बड़ी चीज़ है दूसरे मनुष्यों के बारे में अनर्गल प्रलाप करने के बजाय सेल्फ स्टडी में लीन रहने का आनंद लेना। पुस्तकों का अध्ययन गूंगे के गुड़ के जैसा होता है।
लीडर्स आर रीडर्स
‘लीडर्स आर रीडर्स।’ ये प्रचलित कहावत है कि अच्छे लीडर्स बहुत अध्ययन करते हैं। संविधान निर्माता डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर के निजी पुस्तकालय राजगृह में पचास हज़ार पुस्तकों का होना, अध्ययनशील महात्मा गांधी का जॉन रस्किन की पुस्तक ‘अंटू दिस लास्ट’ से प्रभावित होना, प्रसिद्ध चिन्तक ओशो रजनीश एक दिन में दस पुस्तकें तक पढ़ लेना और कार्ल मार्क्स के जीवन का बड़ा हिस्सा मैनचेस्टर के पुस्तकालय में अध्ययन और लेखन में बीतना, ये सिद्ध करता है कि पढ़ने से ही व्यक्ति महानता की तरफ अग्रसर होता है। माता पिता को चाहिए कि वे अपनी संतान के आगे पुस्तकें, अखबार और पत्र- पत्रिकाएं पढ़ें। घर में पढ़ते रहने का माहौल बनाना और घर को पुस्तकों, पत्र पत्रिकाओं या अखबारों से लादना, आज के समय की आवश्यकता है। यही विकास का आधार है।






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