सड़कों पर होता है महिलाओं का राज
जोधपुर का धींगा गवर उत्सव केवल परंपरा नहीं, बल्कि नारी शक्ति और सामाजिक बदलाव का जीवंत प्रतीक है। इसमें महिलाएं स्वांग, उत्साह और बेंतमार परंपरा के जरिए अपनी स्वतंत्रता और आत्मविश्वास को खुलकर...

धींगा गवर: जोधपुर का अनूठा उत्सव
डाॅ. मधु बैनर्जी,
वरिष्ठ पत्रकार
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राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत में जोधपुर की धींगा गवर (बेंतमार गणगौर) का एक अलग ही नाम है। यह एक ऐसा अनूठा उत्सव है, जो परंपरा के साथ-साथ महिला सशक्तिकरण का संदेश भी देता है। चैत्र शुक्ल तृतीया से शुरू होकर वैशाख कृष्ण तृतीया तक चलने वाले इस 16 दिवसीय आयोजन में आस्था, उल्लास और सामाजिक बदलाव की झलक दिखाई देती है। इस दिन जोधपुर की भीतरी शहर की पुरानी बस्तियों की संकरी गलियों में जब रात गहराती है, तो वहां एक अलग ही दुनिया नजर आती है। ढोल की थाप, गीतों की गूंज, रंग-बिरंगे परिधानों में सजी महिलाएं और हाथों में बेंत। उनकी बेंत से बचने का प्रयास करते पुरुष। यह दृश्य केवल उत्सव का नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, परंपरा और सामाजिक परिवर्तन का संगम है। यही है धींगा गवर, जिसे स्थानीय लोग बेंतमार भी कहते हैं और गर्व और उल्लास के साथ मनाते हैं। धींगा गवर केवल जोधपुर का एक लोक उत्सव नहीं है, बल्कि यह समाज के बदलते चेहरे का आईना है। यह परंपरा और आधुनिक सोच के बीच संतुलन बनाते हुए यह संदेश देता है कि समानता, सम्मान और स्वतंत्रता ही असली संस्कृति है। जोधपुर की यह परंपरा हर साल यह साबित करती है कि जब महिलाएं अपने अधिकारों के साथ आगे बढ़ती हैं, तो समाज भी उनके साथ बदलता है।
परंपरा से प्रगतिशीलता तक का सफर
धींगा गवर का उत्सव चैत्र शुक्ल तृतीया से शुरू होकर वैशाख कृष्ण तृतीया तक 16 दिनों तक चलता है। यह मूलतः गणगौर की परंपरा से जुड़ा है, लेकिन समय के साथ इसने एक विशिष्ट पहचान बना ली है। यहां सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि विधवा महिलाएं भी इस पूजा में समान अधिकार के साथ भाग लेती हैं। जहां समाज में कई बार विधवा महिलाओं को धार्मिक अनुष्ठानों से दूर रखा जाता है, वहीं धींगा गवर उन्हें सम्मान, भागीदारी और पहचान देता है। यह पहल इस उत्सव को केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि महिला सशक्तिकरण का जीवंत उदाहरण बनाती है।
स्वांग में छिपी स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति
धींगा गवर का ‘रातिजोग’ इस उत्सव का सबसे आकर्षक और प्रतीकात्मक हिस्सा होता है। इस दिन महिलाएं राजा-रानी, पुलिस, साधु, देवता और यहां तक कि पुरुष पात्रों का भी स्वांग रचती हैं। यह स्वांग केवल मनोरंजन नहीं है, बल्कि यह सामाजिक ढांचे को चुनौती देने का एक माध्यम है। महिलाएं इन रूपों के जरिए यह संदेश देती हैं कि वे हर भूमिका निभाने में सक्षम हैं चाहे वह सत्ता का प्रतीक हो या समाज का संरक्षक।
बेंतमार परंपरा, हंसी-ठिठोली में गहराई
इस उत्सव को ‘बेंतमार गणगौर’ भी कहा जाता है। गणगौर पूजने वाली महिलाएं (तीजणियां) हाथों में बेंत लेकर रात में निकलती हैं और रास्ते में मिलने वाले पुरुषों को हल्के-फुल्के अंदाज में बेंत मारती हैं। लोकमान्यता है कि यदि किसी कुंवारे युवक को यह बेंत लग जाए, तो उसका विवाह शीघ्र हो जाता है। इसलिए पुरुष भी इस परंपरा को मुस्कुराते हुए स्वीकार करते हैं। यह परंपरा भले ही मजाकिया लगे, लेकिन इसके भीतर लैंगिक संतुलन और संवाद की झलक छिपी होती है। जहां एक दिन के लिए ही सही, लेकिन भूमिकाएं उलट जाती हैं और शहर की सड़कों पर महिलाओं का राज होता है।
आस्था और वैभव का संगम
जोधपुर के भीतरी शहर में स्थित सुनारों की घाटी की गवर माता इस उत्सव का केंद्र होती हैं। यहां गवर माता की प्रतिमा को भारी स्वर्ण आभूषणों से सजाया जाता है, जो श्रद्धा और समृद्धि का प्रतीक है। यह दृश्य न केवल धार्मिक आस्था को दर्शाता है, बल्कि जोधपुर की समृद्ध कारीगरी और सांस्कृतिक धरोहर को भी सामने लाता है। चाचा की गली, सिटी पुलिस, कबूतरों का चौक, नवचौकिया और आस-पास के क्षेत्र इन दिनों मानो जीवित संग्रहालय बन जाते हैं। रात भर महिलाएं समूह बनाकर निकलती हैं, गीत गाती हैं, नृत्य करती हैं और अपनी परंपरा को आगे बढ़ाती हैं।
इन गलियों में केवल उत्सव नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही स्मृतियां और संस्कार भी चलते हैं। बुजुर्ग महिलाएं नई पीढ़ी को इस परंपरा से जोड़ती हैं, जिससे यह विरासत निरंतर जीवित बनी रहती है।
नारी शक्ति का खुला मंच
धींगा गवर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह महिलाओं को खुलकर जीने, हंसने और अपनी बात कहने का मंच देता है। यहां कोई झिझक नहीं, कोई सामाजिक बंधन नहीं, सिर्फ आत्मविश्वास और उत्साह होता है। यह उत्सव यह भी दिखाता है कि नारी केवल परंपराओं की पालनकर्ता नहीं, बल्कि बदलाव की वाहक भी है। विधवा महिलाओं की भागीदारी, रात में निर्भीक होकर निकलना और सामाजिक भूमिकाओं को चुनौती देना, ये सभी पहलू इसे एक सशक्त सामाजिक आंदोलन का रूप देते हैं।






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