एआई और मौलिकता का सवाल
अभिव्यक्ति दिनेश सिंदल,कवि, लेखक यहां नकल हावी रही, गए मूल को भूल।जिन पर भौरों गा रहे, हैं कागज़ के फूल।। आजकल हम मूल से दूर होते जा रहे हैं। हमारे जीवन में आर्टिफिशियल वस्तुओं का चलन बढ़ गया है।...

अभिव्यक्ति
दिनेश सिंदल,
कवि, लेखक
यहां नकल हावी रही, गए मूल को भूल।
जिन पर भौरों गा रहे, हैं कागज़ के फूल।।
आजकल हम मूल से दूर होते जा रहे हैं। हमारे जीवन में आर्टिफिशियल वस्तुओं का चलन बढ़ गया है। सजावट के लिए फूल आर्टिफिशियल। ज्वेलरी आर्टिफिशियल। ड्राइंग रूम के गमलों में सजे पौधे आर्टिफिशियल।
सभी नकली चीजों ने हमारे असली जीवन में घर कर लिया है। यहां तक की हमारा व्यवहार नकली हो गया है। हमारी संवेदनाएं नकली हो गई हैं। और अब तो ये एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) और आ गई। अब नकली बुद्धि भी हाजिर है।
आज एआई से कविताएं लिखी जा रही हैं। वे पत्र- पत्रिकाओं छप रहीं हैं गोष्ठियों में पढ़ी जा रहीं हैं। यहां तक की पुरस्कृत भी हो रहीं हैं।
सवाल यह है कि क्या अब मौलिकता का कोई महत्व नहीं रहेगा?
मौलिक सृजन का महत्व कभी भी खत्म नहीं हो सकता। जिस तरह जब कैमरा आया तब यह चिंता व्यक्त की जा रही थी कि अब चित्रकला का महत्व नहीं रह जाएगा। लेकिन आज उन्नत किस्म के कैमरों के बावजूद भी ड्राइंग और पेंटिंग अपनी जगह है। कैमरे से उतारे गए चित्र की तुलना में पेंटिंग की अपनी गरिमा हैं। पेंटिंग में चित्रकार अपनी अनुभूति, अपने अनुभव, अपनी कल्पना और अपने विचारों को समाहित करता है। कैमरा सिर्फ चेहरे को सामने लाता है।
जिस तरह कविता के लिए भाषा, शब्द, प्रतीक, उपमान, उपमेय उपकरण है। ये कविता नहीं है। इनकी सहायता से हमें कविता रचनी होती है। इसी तरह एआई भी एक उपकरण है।
एआई एक तकनीक है। उसके पास डाटा का एक विशाल भंडार है। अपने उसी डाटा के आधार पर वह कोई आर्टिकल तैयार करता है। अतः एआई वह लिख सकता है जो लिखा जा चुका है। लेकिन वह, वह नहीं लिख सकता जो लिखा जाना शेष है।
जैसा फीड करोगे वैसा उत्तर देगा कम्प्यूटर
कंप्यूटर के आंख नहीं है कंप्यूटर के कान नहीं
(ज़हीर कुरैशी)
एआई अनुभव नहीं करता, पीड़ा नहीं झेलता, प्रेम नहीं जीता। उसके पास अनुभव नहीं है, कल्पना नहीं है। वह केवल सीखी हुई चीजों को कलेक्ट करता है, संयोजित कर हमारे सामने रख देता है।
एक मौलिक रचनाकार के पास अनुभूति है, अनुभव है, कल्पना है, विचार है। जिसका प्रभाव उसकी रचना में देखा जा सकता है।
नरेश सक्सेना कहते हैं कि हर कवि का अपना एक पैटर्न होता है। उसकी कविता की एक डिजाइन होती है। आज देश के पचास हिंदी गज़लकारों के बीच में भी आप पहचान सकते हैं कि यह गज़ल दिनेश सिंदल की है या आदम गोंडवी की या डॉ कुंवर बेचैन की है। हर कवि का अपना डिक्शन होता है। लेकिन एआई का अपना कोई पैटर्न नहीं। वह जो प्रचलित शैलियां है, उनका ही मिश्रण बनाकर प्रस्तुत कर देता है।
मौलिक लेखन में लेखक की निजता, उसका लहजा और उसकी विशिष्ट भी हमें दिखाई देती है। एआई सुरक्षित व संतुलित उत्तर देता है। मौलिक लेखक नए प्रयोग, विद्रोही विचार और अनोखी संरचना अपनाने का जोखिम भी ले सकता है।
जीवन को नहीं बदल सकती एआई से लिखी कविता
कवि कविता रचता है और कविता कवि को रचती है। यह तभी संभव है जब कविता कवि के अनुभव से निकली हो। उसने उस कविता को आत्मसात किया हो, हृदयस्थ किया हो। एआई से लिखी कविता आपके जीवन को नहीं बदल सकती। क्योंकि उसने आपके मन को नहीं छुआ है।
एक महत्वपूर्ण बात- एक जीते जागते रचनाकार के पास जीवन अनुभव है, पीड़ा है, उत्सव है, प्रेम है। जीत- हार है। जब वह रचना करता है तो वह घटना, विचार और इन भावों के बीच से गुजरता है। इन्हें आत्मसात करता है। यह अनुभव उसे एक अलग व्यक्तित्व प्रदान करता है। इसी से उसका रूपांतरण होता है। बिना अनुभव के तकनीक के प्रयोग से लिखी गई रचनाएं आपके भाव जगत में उतरकर आपके व्यक्तित्व पर प्रभाव नहीं डालती। अतः एआई से आप कितना भी लिखते रहे आपका चरित्र, आपका व्यक्तित्व एक रचनाकार का व्यक्तित्व नहीं बन सकता।
मैं प्रायः एक बात कहा करता हूं की कविता कवि के व्यक्तित्व का रिफ्लेक्शन है। यह वही कविता है जो कवि ने उसे जिया है। अपने भीतर उसे अनुभूत किया है और फिर वह कागज पर उतरी है। आज का मनुष्य संवेदना और संस्कारों से दूर होता जा रहा है। वह एक वस्तु बनता जा रहा है। मनुष्य शब्द का अर्थ ही है- मनन करने वाला। आई हमारी मनुष्यता छीन रहा है।
आज अंत में एक कहानी –
एक युवा संन्यासी सत्य की खोज में एक गुरुकुल पहुंचा। आश्रम एक वृद्ध संन्यासी का था जो रात में अपने शिष्यों से धर्म चर्चा किया करते थे। युवा संन्यासी कई दिनों तक उन्हें सुनता रहा। उसने देखा कि उन वृद्ध संन्यासी के पास कहने को ज्यादा कुछ नहीं है। एक दो बातें ही है जिन्हें वे नित्य दोहराते रहते हैं। वह निराश हुआ। उसे लगा कि शायद वह गलत जगह पर आ गया है। एक दिन वह उस आश्रम को छोड़कर जाने ही वाला था कि एक अन्य युवा संन्यासी ने आश्रम में प्रवेश किया। आज यह नव आगंतुक संन्यासी धर्म चर्चा करने वाला था। वह सन्यासी रुक गया।
उस दिन शाम को उस नव आगंतुक युवा संन्यासी ने धर्म चर्चा की। वह धारा प्रवाह धर्म, दर्शन, आत्मा, परमात्मा पर बोलते रहें। लगातार तीन घंटे बोलने के उपरांत जब उन्होंने अपनी बात को विराम दिया। सभी संन्यासी उसे सुन कर प्रसन्न थे। किंतु वृद्ध संन्यासी चुप बैठे रहे। उस युवा संन्यासी ने पूछा कि क्या हुआ? आप चुप है। आपको मेरी धर्म चर्चा कैसी लगी?
वृद्ध संन्यासी ने कहा कि आप तो कुछ बोले ही नहीं।
मैं! नहीं बोला। मैं लगातार तीन घंटे बोला हूं और आप कह रहे हैं मैं नहीं बोला।
वृद्ध संन्यासी ने कहा कि तुम कहां बोल रहे थे। तुम में से किताबें बोल रही थी। ग्रंथ बोल रहे थे।
एआई से भी किताबें बोलती है। एआई न तो सोच सकता है न ही चिंतन मनन कर सकता है।






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