पांच राज्यों के नतीजे: जनादेश के नए संकेत
पांच राज्यों के चुनाव परिणामों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मतदाता अब परंपरागत राजनीति से आगे बढ़कर नए विकल्पों को अवसर देने के मूड में हैं। कहीं सत्ता परिवर्तन हुआ तो कहीं स्थापित दलों को करारा झटका...

मतदाता के फैसले ने बदले सियासी समीकरण और स्थापित धारणाएं
पिछले महीने पांच राज्यों के हुए विधानसभा चुनाव के परिणाम आ गए हैं। चुनाव हमारे लोकतंत्र की परीक्षा होते हैं। इससे लोकतंत्र मजबूत होता है। लोकतंत्र में मतदाताओं की ताकत सिर चढ़कर बोलता है। मतदाता जिसे चाहें अर्श से फर्स पर उतार देते हैं और जिसे चाहें फर्स से अर्श पर पहुंचा देते हैं। हर चुनाव में यही होते रहा है, आगे भी यही होता रहेगा। इस बार के चुनाव परिणाम भी इसी धारणा को मजबूती देते हैं।
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तमिलनाडु में मतदाताओं ने 64 वर्ष बाद किसी नई पार्टी को सरकार बनाने का जनादेश दिया है। वहां पिछले 64 वर्षों में कभी अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईडीएमके) तो कभी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) को सरकार बनाने का मौका मिलता रहता था। इसमें दो राय नहीं कि वहां की जनता दोनों की सरकारें और उनकी अदला-बदली से तंग आ चुकी थी। इसीलिए उसने इस बार पहली बार चुनाव मैदान में उतरे तमिल फिल्मों के सुपर हीरो जोसेफ विजय की नई नवेली पार्टी तमिलागा वेत्रि कड़गम (टीवीके) की झोली में 234 सदस्यीय विधानसभा में 107 सीटें डाल दी। वहां डीएमके गठबंधन को 74 और एआईडीएमके गठबंधन को 53 सीटें मिली हैं। अब विजय दोनों ही गठबंधनों से कुछ विधायकों को तोड़कर आसानी से सरकार बना सकते हैं। इसमें दिक्कत भी नहीं आनी चाहिए, क्योंकि दोनों ही दलों ने अपने गठबंधन में शामिल दलों को सरकार में भागीदारी नहीं दी थी।
पश्चिम बंगाल में पहली बार 206 सीटें जीतकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार बनाने के लिए तैयारी में है। वहां पिछली बार 215 सीटों पर जीत के साथ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की सुप्रीमो ममता बनर्जी ने सरकार बनाई थी। इस बार के चुनाव में तृणमूल कांगेस महज 81 सीटों पर सिमट गई है और ममता बनर्जी स्वयं चुनाव हार चुकी हैं। उन्होंने मतगणना केंद्र में सीसीटीवी बंद कर अपने साथ मारपीट का आरोप लगाया है। पिछले चुनाव में भाजपा को 77 सीटें मिली थीं। इस बार उसे 129 सीटों का फायदा हुआ है। भाजपा के वोटों में यह उछाल अचानक नहीं आया है। इसके लिए भाजपा के देशभर के कार्यकर्ता लगातार पांच वर्षों तक राज्य में डेरा डाले रहे। उन्होंने घर-घर जाकर मतदाताओं का मन टटोला। उन्हें अपने साथ आने को प्रेरित किया। साम-दाम-दंड-भेद के घोड़े छोड़ डाले। एक हुमायूं कबीर से डील की बातें तो सार्वजनिक भी हो गईं। हालांकि बाद में भाजपा और हुमायूं कबीर दोनों ने इसका खंडन किया। लेकिन अगर दोनों सही थे तो असदुद्दीन ओवैसी आखिर क्यों बिदक गए, यह सवाल अनुत्तरित ही रहा।
वैसे भी, पश्चिम बंगाल में टीएमसी की करारी हार के पीछे सत्ता विरोधी लहर तो रही ही है, शासन में भ्रष्टाचार को भी माना जा सकता है। शिक्षकों की बहाली में इतनी ज्यादा कदाचार के मामले सामने आए कि सुप्रीम कोर्ट को कई हजार शिक्षकों की बहाली ही रद्द कर देनी पड़ी। तत्कालीन शिक्षा मंत्री और विभागीय सचिव को महीनों तक सलाखों के पीछे रहना पड़ा। घरों से नोटों के बंडल भी मिले। इससे ममता बनर्जी की भी खूब किरकिरी हुई। महिला सुरक्षा भी एक बड़ा कारण माना जा सकता है, लेकिन क्या महिलाएं सिर्फ पश्चिम बंगाल में ही असुरक्षित हैं? हां, मीडिया की भूमिका भी बड़ा फैक्टर माना जा सकता है। मीडिया ने पश्चिम बंगाल की घटनाओं को जरूर बढ़ा-चढ़ाकर प्रकाशित- प्रसारित किया। प्रशासन और पुलिस की बजाय सरकार के मुखिया को ही निशाने पर लिया। एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि सुशासन के बिहार में जंगलराज से ज्यादा आपराधिक वारदातें हो रही हैं, लेकिन लोकतंत्र का चौथा खंभा खामोश है। तकरीबन यही हाल कुछ और प्रदेशों का भी है।
विपक्ष में बिखराव भी प.बंगाल में हार का बड़ा कारण
पश्चिम बंगाल में टीएमसी की पराजय के पीछे विपक्ष में बिखराव और मुस्लिम मतों का विभाजन भी एक बड़ा कारण है। सबने देखा कि देश के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी कैसे टीएमसी सरकार पर हमलावर थे। क्या-क्या नहीं कहा। अब हार के बाद मातमपुर्सी के लिए ममता को फोन कर रहे हैं। वह भी इसलिए कि आने वाले लोकसभा के चुनाव में ममता कहीं अलग राह नहीं पकड़ लें। झारखंड में हेमंत सोरेन पहले से ही कांग्रेस से खफा हैं। कब पाला बदल लें, कोई नहीं कह सकता। महाराष्ट्र में विपक्षी खेमे में पहले से ही एक अनार सौ बीमार की हालत है। हिमाचल में कांग्रेस आपसी कलह से कराह रही है। बिहार में विपक्ष की राज्यसभा की एक सदस्यता की हैसियत नहीं है। उत्तर प्रदेश में जहां अगले साल विधानसभा के चुनाव होने हैं, कांगेस और अखिलेश यादव अभी से हांफते दिखाई देते हैं। विपक्ष में बिखराव और मुस्लिम मतों के विभाजन से टीएमसी का वोट बैंक करीब 8 फीसदी गिरा। नतीजतन टीएमसी की सदस्य संख्या 215 से घटकर 81 पर पहुंच गई।
टीएमसी की हार का कारण एसआईआर को बताया
पश्चिम बंगाल में टीएमसी की हार का निर्णायक कारण मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और केन्द्रीय सुरक्षा बलों की अभूतपूर्व तैनाती भी रहा है। राज्य में तकरीबन 91 लाख मतदाताओं के नाम काट दिए गए। हो सकता है कि इसमें मृत लोगों और दो जगहों पर मतदाता सूची में शामिल लोग भी रहे हों। लेकिन किसका नाम किस कारण से काटा गया, चुनाव आयोग ने मतदान की तारीख तक कोई आंकड़ा नहीं बताया। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित न्यायाधिकरण में भी सारे अपील पर सुनवाई नहीं हो सकी। अब जो लोग अपील में सही साबित हो जाएंगे, कम से कम इस चुनाव में उनकी भूमिका तो नहीं रही। अजीब हाल है। चुनाव आयोग विज्ञापन तो खूब देता है कि कोई मतदाता छूटे नहीं, लेकिन कौन मतदाता वोट डालेगा, वही तय करता है। हैरत तो यह कि चुनाव आयोग के गलत फैसले के खिलाफ अब कोई सुनवाई भी नहीं हो सकती है। सरकार ने उसे विशेषाधिकार दिया हुआ है। पश्चिम बंगाल में इस बार के चुनाव में करीब 2 लाख 40 हजार केन्द्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती की गई थी। यह अभूतपूर्व है। संभवतः इससे पहले किसी राज्य के चुनाव में केन्द्रीय सुरक्षा बलों की इतनी ज्यादा संख्या में तैनाती नहीं हुई थी।
कमजोर रणनीति की वजह से हारी कांग्रेस ?
असम और पुदुचेरी में भाजपा गठबंधन की जीत कांग्रेस की कमजोर रणनीति की वजह से हुई है। हालांकि चुनाव विश्लेषक योगेन्द्र यादव असम में विधानसभा सीटों के नये तरह से परिसीमन को भाजपा गठबंधन की एकतरफा जीत का कारण मानते हैं। केरल में एलडीएफ और यूडीएफ दोनों गठबंधनों के बीच सत्ता की अदला-बदली होते रही है। यह अलग बात है कि पिछले दो कार्यकाल से वाम दलों का एलडीएफ ही शासन में था। वहां भ्रष्टाचार और बेरोजगारी इस बार बड़ा मुद्दा था। अब एलडीएफ की सत्ता समाप्त होने के बाद देश में वाम दलों के शासन का अंत हो गया है। यह अलग बात है कि चुनाव के दौरान वाम दलों और कांग्रेस के नेता एक-दूसरे को भ्रष्ट बताते रहे। भले ही लोकसभा के चुनाव के दौरान एक-दूसरे से गठबंधन कर लें।
एक मीडिया रिपोर्ट में बताया गया है कि देश के 72 प्रतिशत भू-भाग और 78 प्रतिशत आबादी पर एनडीए का शासन हो चुका है। अगले साल उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा, हिमाचल, उत्तराखंड, मणिपुर और गुजरात में चुनाव होने हैं। आगे-आगे देखिए होता है क्या..!





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