प.बंगाल व असम में भाजपा, केरल में कांग्रेस गठबंधन व पुदुचेरी में भाजपा गठबंधन की सरकारें
राजेश कसेरा,
राजनीतिक विश्लेषक
Table Of Content
- प.बंगाल व असम में भाजपा, केरल में कांग्रेस गठबंधन व पुदुचेरी में भाजपा गठबंधन की सरकारें
- पश्चिम बंगाल में तृणमूल का किला ध्वस्त
- असम : हिमंता बिस्वा की अपने दम पर हैट्रिक
- तमिलनाडु की राजनीति में नये सितारे का उदय
- केरल में कांग्रेस को मिली संजीवनी
- कांग्रेस का गढ़ पुदुचेरी छीना और फिर से सरकार बनाई
- बड़े और प्रभावी मुद्दे, जिन्होंने तय की जीत की राह
पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, केरल और पुदुचेरी में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों ने एक बार फिर साफ कर दिया कि मतदाता जिस राजनीतिक दल को अपना जनादेश देना चाहते हैं उसे लेकर उनके मन में न तो कोई संशय है और न ही कोई मतभेद। जिसमें उनको अपने राज्य का भविष्य दिखाई दिया, उसे एकतरफा जीत की राह दिखाई। असम और पुदुचेरी में मौजूदा सरकार को भी चुना तो पूरे भरोसे के साथ। असम में हिमंता बिस्वा सरमा सरकार को पिछले चुनाव से 27 सीटें ज्यादा जिताईं तो पुदुचेरी में भी दो सीटों का फायदा दिया। यहां के मतदाताओं ने मौजूदा सरकारों को एक और मौका देने का मन बनाया तो वैसा किया भी। वहीं तीन राज्यों में सत्ता परिवर्तन की लहर ने सारे दिग्गजों को सियासत के मैदान से ही उड़ा दिया। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में तो मुख्यमंत्रियों को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया तो केरल में वाम दलों का वजूद ही समाप्त कर दिया। इन परिणामों में सबसे बड़ा एक्स फैक्टर बनकर कोई उभरा तो वह तमिलनाडु की तमिलगा वैत्री कड़गम (टीवीके) पार्टी रही। महज दो साल पहले बने इस दल ने पहले ही चुनाव में ऐसा धमाका किया कि भारतीय राजनीति के इतिहास में इसे याद रखा जाएगा। चुनाव परिणामों में सबसे बड़े नायक तमिलनाडु सिनेमा के सुपरस्टार थलपति विजय बनकर उभरे। उन्होंने देश की राजनीति में बड़ा धमाका करते हुए सारे सियासी समीकरणों को झुठला दिया।
राजनीतिक दृष्टिकोण से इन परिणामों की समीक्षा करें तो भाजपा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह फिर सबसे ताकतवर रणनीतिकार बनकर उभरे। दोनों ने सत्ता में आने के बाद पश्चिम बंगाल में कमल खिलाने का जो सपना देखा उसे पूरा करके दिखा दिया। केन्द्र में लगातार तीन बार सत्ता में काबिज होने के बाद उन्होंने जिन-जिन राज्यों में जीत के लिए अपना अश्वमेध का घोड़ा छोड़ा, उसे जीतकर ही लेकर आए। इन चुनावों में बेहतर प्रदर्शन हासिल करने के बाद जब प्रधानमंत्री मोदी ने भाजपा मुख्यालय पर पार्टी के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को संबोधित किया तो अपना अगला लक्ष्य भी सबको बता दिया। उन्होंने कहा कि देश के मस्तक यानी जम्मू-कश्मीर के साथ दक्षिण भारत के तमिलनाडु और केरल में भाजपा को सत्ता में लाना पार्टी का अगला संकल्प होगा। भाजपा की यही सोच विपक्षी दलों से उनको कहीं आगे रखती है और यही कारण है कि कांग्रेस मुक्त भारत का उनका नारा तेजी से बुलंद होता दिख रहा है। देश के मौजूदा नक्शे को देखें तो भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगियों की 22 राज्यों में सरकार बन गई। इनमें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, उत्तराखंड, असम, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा, गोवा, छत्तीसगढ़, ओडिशा, मणिपुर, पश्चिम बंगाल और दिल्ली में भाजपा ने अपने दम पर जनादेश हासिल किया तो बिहार, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, सिक्किम, मेघालय, नगालैंड, पुदुचेरी में सहयोगी दलों के साथ साझा सरकार बनाई।
पश्चिम बंगाल में तृणमूल का किला ध्वस्त
पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। उसने दो तिहाई बहुमत हासिल करके सारे सियामी समीकरणों को ध्वस्त कर दिया और विधानसभा की 293 सीटों में से 206 सीटें जीतकर तृणमूल कांग्रेस को बंगाल से साफ कर दिया। पिछले चुनावों में 77 सीटों पर सिमटने वाली वाली भाजपा ने इस बार 127 सीटें ज्यादा जीतीं और बंगाल में सबको एक किनारे कर दिया। चुनाव में सबसे बड़ा नुकसान टीएमसी ने उठाया। सत्ता खोने के साथ 135 सीटों को उसने गंवाया। 2021 के चुनाव में तृणमूल ने 216 सीटें जीतकर जीत का डंका बजाया था। इस चुनाव में 81 सीटें ही पार्टी जीत पाईं। सीएम ममता बनर्जी अपने गढ़ भवानीपुर को बचा नहीं पाई और चुनाव हार गईं। कांग्रेस ने इस चुनाव में कुछ नहीं खोया और 2 सीटों पर जीत दर्ज की। पिछले चुनाव में भी उसे 2 सीटें मिली थीं। वहीं तीन दशक तक बंगाल की सत्ता पर राज करने वाला वाम दल इस बार 2 सीटों तक पहुंचा। नहीं तो पिछली बार उसे एक ही सीट मिली थी। ऐसे में पश्चिम बंगाल में भाजपा ने रिकॉर्ड तोड़ ऐतिहासक सफलता हासिल कर तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी का 15 सालों से बना मजबूत किला जमींदोज कर दिया।
असम : हिमंता बिस्वा की अपने दम पर हैट्रिक
असम में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में भाजपा ने न केवल एंटी इनकंबेंसी से जुड़े सारे सिद्धांतों को पीछे छोड़ दिया, बल्कि पहली बार राज्य में दो-तिहाई बहुमत से सरकार बनाई। भाजपा की इस जीत में हिंमता की भूमिका सबसे बड़ी रही। हालांकि असम में वोटों का अत्यधिक सांप्रदायीकरण भी सबसे बड़ी वजह बना। मुख्यमंत्री ने चुनाव अभियान के दौरान जिस तरह की बयानबाजी की उसने वोटों का बहुत ज्यादा ध्रुवीकरण कर दिया। जब धर्म या जाति के नाम पर वोट बंट जाते हैं तो बाकी मुद्दे खत्म हो जाते हैं। जबकि चुनावों में भ्रष्टाचार बड़ा मुद्दा था, जो मुख्यमंत्री के करीबी परिवार के जुड़ा था। इतना ही नहीं, आरएसएस के लोगों ने भी राज्य सरकार के खिलाफ आवाज बुलंद की थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि राज्य में भाजपा भी कांग्रेस की तरह होती जा रही है। उन्होंने भ्रष्टाचार का मुद्दा भी जोर-शोर से उठाया, लेकिन सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के आगे वोटरों ने ऐसे मुद्दों को नजरअंदाज कर दिया।
इधर, कांग्रेस में सारा रायता फैल गया। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे भूपेन कुमार बोरा ने पार्टी छोड़ दी तो चुनावों के ठीक पहले कांग्रेस सांसद प्रद्युत बोरदोलोई भाजपा में शामिल हो गए। इससे जनता में संदेश गया कि कांग्रेस सरकार यहां बना पाने की स्थिति में नहीं है। इसके अलावा कांग्रेस में गठबंधन को लेकर अंतिम समय तक कुछ स्पष्ट नहीं था। इससे चुनावी माहौल में उसको लेकर भ्रम की स्थिति बनी रही। इन हालात में वहां की जनता ने फिर हिमंता पर भरोसा जताकर राज्य की कमान उनको सौंपी। हिमंता सरकार ने पिछली बार से प्रचंड जनादेश हासिल कर कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया। इस बार 102 सीटों पर भाजपा ने बड़ी जीत दर्ज की। जबकि कांग्रेस 21 सीटों पर सिमट गई।
तमिलनाडु की राजनीति में नये सितारे का उदय
तमिलनाडु में अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कषगम (टीवीके) ने 107 सीटों पर जीत हासिल की। इस नई नवेली पार्टी ने ज्यादातर एग्जिट पोल के अनुमानों को गलत बताते हुए सत्तारूढ़ डीएमके और विपक्षी एआईडीएमके दोनों को पीछे छोड़ दिया। एमजी रामचंद्रन, एम. करुणानिधि, एमजीआर और जयललिता के बाद जो करिश्मा थलपति विजय ने दिखाया वह न तो रजनीकांत दिखा सके और न ही कमल हासन। विजय ने फरवरी-2024 में अपनी राजनीतिक पार्टी टीवीके शुरू की। तब उन्होंने घोषणा की थी कि वे फिल्मों से संन्यास लेकर पूरी तरह राजनीति पर ध्यान देंगे। इसके बाद विजय की पार्टी ने 2024 का लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा। वे तमिलनाडु चुनाव का लक्ष्य लेकर चले। 27 अक्टूबर-2024 को विल्लुपुरम जिले के विक्रवंडी में विजय ने पहली चुनावी रैली की। एक साल बाद 27 सितंबर-2025 को तमिलनाडु के करूर में हुई रैली में भगदड़ मच गई, जिसमें 41 लोग मारे गए। विजय के लिए यह बड़ा झटका रहा। इसके बाद आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला और विजय कानूनी पचड़े में फंसे। मामला सुप्रीम कोर्ट भी गया। पार्टी के पदाधिकारियों पर मुकदमे दर्ज किए गए। केंद्रीय जांच ब्यूरो ने विजय से पूछताछ की। लेकिन तमाम मुसीबतों और संकटों से ऊपर उठकर विजय जननायक बनकर उभरे और सबको चौंका दिया। विजय भाजपा या कांग्रेस गठबंधन किसके साथ मिलकर सरकार बनाएंगे इस पर सबकी नजरें टिकी रहेंगी।
केरल में कांग्रेस को मिली संजीवनी
केरल में कांग्रेस के संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) को मतदाताओं ने बड़ी राहत देकर उन पर भरोसा जताया। मतदान के बाद आए सभी एग्जिट पोल के अनुमानों के अनुरूप कांग्रेस और उसके गठबंधन ने राज्य में 10 साल बाद सत्ता में वापसी की। मतगणना के शुरुआती दौर से संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) 140 विधानसभा सीट में से 102 पर जीत हासिल की, जबकि मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी (माकपा) नीत सत्तारूढ़ वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) केवल 35 सीटों पर सिमट गया। हालांकि मुख्यमंत्री पिनराई विजयन तो चुनाव जीत गए, लेकिन उनकी अगुवाई वाले लेफ्ट एलायंस एलडीएफ को सत्ता से बाहर होना पड़ा। केरल में इस हार के बाद 49 साल में ऐसा पहली बार हुआ जब देश के किसी राज्य में लेफ्ट की सरकार नहीं बची। इससे पहले पश्चिम बंगाल में 2011 में 34 साल के निरंतर शासन के बाद ममता बनर्जी ने लेफ्ट को सत्ता से बाहर किया था। इसके बाद लगातार दो विधानसभा चुनावों में बंगाल में लेफ्ट का एक भी विधायक नहीं बना। इसी तरह से त्रिपुरा में 2018 को लेफ्ट सत्ता से बेदखल हो गई। वहां 25 साल तक माणिक सरकार के नेतृत्व में सत्ता थी, लेकिन भाजपा ने ‘चलो पलटाई’ के नारे के साथ उन्हें हरा दिया। आज त्रिपुरा में भी लेफ्ट तीसरे नम्बर का मोर्चा है।
कांग्रेस का गढ़ पुदुचेरी छीना और फिर से सरकार बनाई
पुदुचेरी एक जमाने में कांग्रेस का मजबूत गढ़ था, लेकिन यहां भाजपा और एनडीए का परचम लहरा रहा है। जबकि इस केंद्र शासित प्रदेश पर केरल और तमिलनाडु की राजनीति का गहरा असर पड़ता है। इसके बावजूद वर्ष 2021 के विधानसभा चुनावों में एनडीए गठबंधन ने शानदार प्रदर्शन कर सत्ता पर कब्जा जमाया और पहली बार भाजपा ने यहां अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराई। 30 सीटों वाली पुदुचेरी विधानसभा में एनडीए गठबंधन ने 16 सीटों के साथ बहुमत का आंकड़ा पार कर सरकार बनाई। भाजपा ने 6 सीटों पर दर्ज की तो मुख्य घटक दल एआई एनआर कांग्रेस ने 10 सीटों पर जीत हासिल की। इस चुनाव में सत्तारूढ़ दल ने एक कदम और आगे बढ़ाते हुए सरकार भी बचाई और पिछले चुनावों से दो सीटें ज्यादा भी हासिल कीं। इस चुनाव में भी एआई एनआर कांग्रेस ने 12 सीटें जीतीं। देखा जाए तो भाजपा ने पुदुचेरी में अपनी नींव उन्हीं नेताओं के जरिए यहां रखी जो कांग्रेस से दल बदलकर आए। भाजपा ने यहां रणनीतिक चतुराई और मजबूत गठबंधन के बूते अखिल भारतीय एनआर कांग्रेस से तालमेल बिठाकर अपनी स्थिति मजबूत की। एन. रंगास्वामी के नेतृत्व वाली इस पार्टी के साथ गठबंधन ने भाजपा को राज्य के सत्ता समीकरणों में मुख्य भागीदार बना दिया। समय-समय पर आए राजनीतिक संकटों के बावजूद दोनों दल केंद्रीय नेतृत्व के हस्तक्षेप और सीट बंटवारे के रणनीतिक तालमेल से एकजुट बने रहे। भाजपा ने रणनीतिक रूप से सीटों का बंटवारा कर एनआर कांग्रेस को आगे रखा और विपक्षी दलों को हावी नहीं होने दिया। पुदुचेरी का उपयोग भाजपा तमिल राजनीति में अपनी पैठ बनाने के लिए करना चाहती है। यहां की सफलता से पार्टी तमिलनाडु जैसे अन्य द्रविड़ राजनीति वाले राज्यों में अपनी रणनीतिक उपस्थिति का विस्तार करने की कोशिश करेगी।
बड़े और प्रभावी मुद्दे, जिन्होंने तय की जीत की राह
- एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण)
इन चुनावों में सबसे बड़ा मुद्दा विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर का रहा। मतदाता सूची में जो स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन हुआ, वह सभी राज्यों के चुनावों में ऐसा विषय बना जिसकी वजह से सियासी पारा चढ़ा। इसे लेकर तनाव भी बढ़ा और यह संवेदनशील मुद्दा बन गया। इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में लोगों के वोट कट गए। इनमें भी ज्यादातर संख्या अल्पसंख्यक यानी मुस्लिम मतदाताओं की रही। एसआईआर भाजपा के लिए लिटमस टेस्ट की तरह रहा। इससे भाजपा बंगाल और असम में दमदार तरीके से आगे बढ़ी और जीत भी।
- महिला मतदाताओं का वोट बना अहम कड़ी
चुनावों के दौरान केन्द्र सरकार की ओर से संसद में पेश किए गए महिला आरक्षण कानून और डीलिमिटेशन से जुड़े 131वां संवैधानिक संशोधन विधेयकों को विपक्षी दलों ने पास होने नहीं दिया। विधेयक गिरने के बाद भाजपा और एनडीए गठबंधन ने विपक्ष पर महिला विरोधी होने के आरोप लगाए तो विपक्ष ने इन विधेयकों को लेकर सरकार के एजेंडे पर सवाल उठाए। परिसीमन विधेयक का मकसद लोकसभा क्षेत्रों को फिर से निर्धारित करना था, लेकिन दक्षिण भारतीय राज्यों ने इसका खुलकर विरोध किया और तमिलनाडु में मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने इसके खिलाफ प्रदर्शन भी किए। चुनाव के बीच बुलाए गए विशेष सत्र ने विपक्ष के मन में संदेह पैदा किया। साथ ही सभी दलों की बैठक के बिना सीधे संसद में बिलों को लाने पर भी सवाल उठे। बाद में चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने मतदाताओं के बीच विपक्ष को महिला विरोधी साबित किया। जबकि विपक्षी दलों ने संघवाद और संविधान को बचाने की दुहाई दी। लेकिन चुनावों में महिलाओं ने भाजपा के समर्थन में मतदान किया और केन्द्र सरकार का फेंके गए पासे ने उन्हें जीत भी दिला दी।
- इंडी गठबंधन की अंदरूनी फूट पड़ी भारी
पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन नहीं करना और अलग से चुनावी मैदान में उतरना कांग्रेस को भारी पड़ा। इसका नुकसान न केवल कांग्रेस को भुगतना पड़ा बल्कि क्षेत्रीय दलों को भी उठाना पड़ा। केन्द्र में भाजपा को हराने के लिए एकसाथ खड़ा होने वाला इंडि गठबंधन विधानसभा चुनाव में भाजपा के सामने ही बिखर गया। इसका पूरा लाभ चुनाव अभियानों में भाजपा ने उठाया और विपक्ष की एकता को कटघरे में खड़ा किया। मतदाताओं के बीच भाजपा अपनी बात को दमदार तरीके से रखने में सफल रही और विपक्ष इसका कोई जवाब नहीं दे पाया। केरल में भाजपा को यदि कोई मजबूत सहयोगी मिल जाता तो वहां भी उसके जीत के दरवाजे खुल जाते। लेकिन वाम दलों से पार्टी की नीति-रीति नहीं मिलने से भाजपा ने कोई समझौता भी नहीं किया और अपने सहयोगियों के दम पर लड़कर तीन सीटें भी जीत लीं। जहां केरल में भाजपा का इतिहास शून्य पर था, वहां उसने खाता खोलकर भविष्य में जीत के लिए ऐलान कर दिया।







No Comment! Be the first one.