पहले राहुल भइया की ‘नारीशक्ति’ लाएंगे
कांग्रेस की राजनीति में ‘लेडीज फर्स्ट’ का बोर्ड लगा है, बस दरवाजा अंदर से बंद है। बाहर लिखा है- ‘स्वागत है और अंदर से आवाज आती है, अभी नहीं।’ यहां नारी सम्मान का बड़ा भारी जलसा होता...

बोल हरि बोल
हरीश मलिक.
लेखक और व्यंग्यकार
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कांग्रेस की राजनीति में ‘लेडीज फर्स्ट’ का बोर्ड लगा है, बस दरवाजा अंदर से बंद है। बाहर लिखा है- ‘स्वागत है और अंदर से आवाज आती है, अभी नहीं।’ यहां नारी सम्मान का बड़ा भारी जलसा होता है। भाषणों में देवी, पोस्टरों में शक्ति यानी लड़की हूं लड़ सकती हूं। लेकिन व्यवहार में नारीशक्ति संशोधन ‘विचाराधीन’। नारी सशक्तिकरण का मामला कुछ ऐसा हो गया है जैसे ड्रॉइंग रूम में रखा सुंदर शोपीस। दिखाने के लिए शानदार, इस्तेमाल के लिए अनुपलब्ध। यह वही राजनीति है जहां आदर्शों की माला जपते-जपते हाथ थकते नहीं, पर जब उन्हें कानून का रूप देने की बारी आती है, तो उंगलियां फाइलों में उलझ जाती हैं। छुटभइये नेता तक चहकने लगते हैं- पहले हम राहुलजी की ‘नारीशक्ति’ लाएंगे। इसके बाद ही किसी नारी शक्ति का वंदन-अभिनंदन होने दिया जाएगा। दरअसल, नारीशक्ति के नाम पर तालियां बजाना आसान है, पर अधिकार देना उतना ही कठिन जितना फाइल को मेज से उठाकर जमीन पर उतारना। बहस में सभी सहमत दिखते हैं, पर वोटिंग के समय सबको अचानक कोई जरूरी काम याद आ जाता है। अंत में प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है, जहां अगर-मगर करके कहा जाता है कि “हम पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।” बस तारीख और तरीका अभी तय होना बाकी है।
‘आम’ से ‘विशिष्ट’ की श्रेणी में अपग्रेड
चुनावी चकल्लस में अब विचारधारा नहीं, प्लेटफॉर्म बदलने की कला काम आती है। आम आदमी पार्टी के राघव चड्ढा और कुछ सांसद जिस तेजी से ‘आम’ से ‘विशिष्ट’ की श्रेणी में अपग्रेड हुए, वह किसी रेलवे के तत्काल टिकट से कम नहीं। उधर पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल अपने डिब्बे के दरवाजे थामे खड़े हैं। दिल्ली की गाड़ी तो हाथ से कब की निकल ही चुकी है, अब पंजाब वाली लाइन पर सिग्नल लाल न हो जाए, इसकी चिंता में गर्मी में भी खांस रहे हैं। दरअसल, राजनीति में यह नया गणित है। नेता टिकट के साथ-साथ ठिकाना भी बदलते हैं और पार्टी नेतृत्व इस डर में रहता है कि कहीं पूरी बोगी ही अगली ट्रेन में शिफ्ट न हो जाए। पंजाब के चुनाव सामने हैं और पार्टी का हाल वैसा है जैसे ट्रेन चलने से पहले यात्री दरवाजे पर खड़े होकर सोच रहे हों कि ‘यही गाड़ी सही है या अगली पकड़ लें?’ लोकतंत्र की इस रेलयात्रा में टिकट से ज्यादा अहम हो गया है समय पर प्लेटफॉर्म बदलना। जो चूक गया, वह अगली घोषणा का इंतजार करता रह जाता है। राजनीति का यह रेलमपेल ऐसी है कि घोषणापत्र टिकट की तरह जेब में रहता है और सिद्धांत प्लेटफॉर्म पर छूट जाते हैं।
बूमरेंग बने आरोपों से खेड़ा खुद घायल
हमारे यहां चुनाव के समय आरोपों की ऐसी सेल लगती है कि ‘एक लगाओ, चार मुफ्त पाओ’ का ऑफर चलता है। नेताजी जोश में इतना आगे निकल जाते हैं कि उन्हें याद ही नहीं रहता कि सबूत नाम की भी कोई चिड़िया होती है। कांग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा ने भी चुनावी जोश में शब्दों को ऐसे दौड़ा दिया मानो सच पीछे-पीछे हांफता हुआ आ जाएगा। आरोप लगा देना आसान है, पर जब अदालत सबूत मांगती है तो वही शब्द कटघरे में खड़े होकर बूमरेंग बन गवाही देने से कतराने लगते हैं। अदालत का दरवाजा तब वैसा लगता है जैसे स्कूल का मास्टर हो और होमवर्क अधूरा हो तो डांट मिलना तय है। तब समझ में आता है कि बयान देना और उसे निभाना दो अलग-अलग कर्म हैं। दरअसल, राजनीति का गुणा-भाग बड़ा दिलचस्प है। चुनाव खत्म हो जाता है, लेकिन बयानों की किस्तें चलती रहती हैं। तब समझ आता है कि राजनीति में आरोपों के शब्द खर्च करने से पहले रसीदें संभाल कर रखनी चाहिए, क्योंकि उधार के आरोप कभी न कभी ब्याज समेत लौटते जरूर हैं।
स्वर्ग और नरक की आबादी का भी सर्वे!
जोधपुर नगर निगम ने प्रशासनिक दक्षता की यह नई परिभाषा गढ़ दी है कि अब काम के लिए सांस लेना अनिवार्य नहीं रहा। निगम के काबिल अफसरों की कल्पनाशक्ति का दायरा अब धरती तक सीमित नहीं रहा, बल्कि परलोक तक विस्तार कर लिया है। जनगणना के लिए जीवित मनुष्य से काम करवाना तो पुरानी बात है, अब मृतकों को भी सरकारी फाइलों में ‘सक्रिय नागरिक’ घोषित कर दिया गया है। शायद अफसरों का मानना है कि ऊपर वाले के दरबार में बैठे लोग ज्यादा ईमानदारी से जनगणना करेंगे- न रिश्वत लेंगे और न ही कोई बहाना बनाएंगे। यह सोचकर अच्छा लगता है कि सरकारी काम में अब ‘अनुपस्थित’ शब्द का खत्म हो जाएगा, क्योंकि जो व्यक्ति इस दुनिया में ही नहीं है, वह छुट्टी कैसे लेगा! शायद निगम का यही असली ‘डिजिटल इंडिया’ है। जहां आदमी ऑफलाइन हो सकता है, लेकिन उसका डेटा हमेशा ऑनलाइन रहेगा। वैसे भी, जब आंकड़ों में सच्चाई से ज्यादा सुविधा देखी जाती हो, तो जिंदा और मुर्दा का फर्क मिट ही जाता है। अब अगला आदेश शायद यह हो कि स्वर्ग और नरक की आबादी का भी सर्वे कर लिया जाए, ताकि योजनाओं का लाभ ‘ऊपर से नीचे तक’ सर्वव्यापी हो सके।






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