रिफाइनरी में लपटें ठंडी, जवाब अभी भी गर्म
बात बेलगाम पचपदरा में आग बुझी, मगर जवाब अब भी धधक रहे हैं। कल तक यही रिफाइनरी तरक्की का मंच थी, आज बहानों की प्रयोगशाला बन गई है। तार जले, पैनल पिघले और अब कहानी सीधी नहीं, स्मार्ट हो गई है। शक...

बात बेलगाम
पचपदरा में आग बुझी, मगर जवाब अब भी धधक रहे हैं। कल तक यही रिफाइनरी तरक्की का मंच थी, आज बहानों की प्रयोगशाला बन गई है। तार जले, पैनल पिघले और अब कहानी सीधी नहीं, स्मार्ट हो गई है। शक स्क्रीन के उस पार तक जा पहुंचा है। मलबे में सच कम, संभावनाएं ज़्यादा खोजी जा रही हैं। सुविधा देखिए, जितना कारण दूर जाएगा उतनी जिम्मेदारी हल्की होती जाएगी। मशीन पर डालो, सिस्टम पर डालो, या फिर किसी अदृश्य उंगली पर। आखिर जवाब चाहिए या राहत? लोकार्पण से एक दिन पहले सब कुछ दुरुस्त था, और अगले ही दिन सब कुछ धुएं में। फर्क सिर्फ इतना है, पहले नियंत्रण का दावा था अब नियंत्रण ही सवालों के घेरे में है।
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जंगल में ट्रैफिक जाम: बाघ वीआईपी या बंधक?
सवाई माधोपुर के रणथंभौर टाइगर रिजर्व में अब जंगल सफारी कम, ट्रैफिक मैनेजमेंट ज्यादा दिखने लगा है। फर्क बस इतना है कि यहां सिग्नल नहीं, बाघ फंसता है! बेचारा जंगल का राजा अपने ही घर में ऐसे घिर गया, जैसे बिना पास के किसी वीआईपी कार्यक्रम में घुस आया हो। बाघ ने सोचा होगा, शिकार मैं करूं या ये गाड़ियां मुझे ही घेर लें? आगे-पीछे से जिप्सियां ऐसे जमा हो गईं मानो कोई फिल्मी स्टार आ गया हो, और सबको सेल्फी चाहिए। फर्क बस इतना कि स्टार मुस्कुराता है, बाघ सहम जाता है। वीडियो वायरल हुआ तो कार्रवाई भी हो गई। चार ड्राइवर, चार गाइड नाप दिए गए। वरना अगली बार शायद बाघ पर ही आरोप लगता, आपने ट्रैफिक नियम तोड़े! जंगल का असली आनंद दूरी में है, भीड़ में नहीं। वरना कल बाघ नहीं, सिर्फ कहानी बचेगी।
ताले में बंद भविष्य, भाषा में उलझी पढ़ाई
जालोर के बावतरा गांव में शिक्षा का अद्भुत प्रयोग चल रहा है। बच्चे पढ़ने आते हैं, पर पहले ताला लगाना सीखते हैं। जालोर में लगता है अब पाठ्यक्रम बदल गया है। भाषा नहीं समझो तो स्कूल ही बंद कर दो। ऊपर से फरमान है, बच्चों को वैश्विक बनाना है। नीचे से आवाज है, पहले स्थानीय तो बना लो! जिन बच्चों के घर में किताब अभी भी पुस्तक है, उनके सामने सीधे विदेशी भाषा परोसी जा रही है। नतीजा बच्चा न इधर का रह पा रहा है, न उधर का। ग्रामीणों की मांग भी कोई क्रांति नहीं। बस इतनी कि पढ़ाई समझ में आ जाए। पर व्यवस्था को शायद समझ में आना सबसे मुश्किल विषय लगता है। यहां शिक्षा कम, प्रयोग ज्यादा हो रहा है। फर्क बस इतना है प्रयोग करने वाले सुरक्षित हैं, और प्रयोग झेलने वाले… स्कूल के गेट पर ताला लगाए खड़े हैं।
देर से आई बस, जागा विकास
जैसलमेर जिले के रासला गांव में रोडवेज बस पहुंची तो ऐसा लगा जैसे आज़ादी खुद देर से आती हुई शर्मिंदा खड़ी हो। 75 साल बाद आई इस बस ने साबित कर दिया कि विकास भी कभी-कभी ऊंट की चाल चलता है। धीरे, थका हुआ और रास्ता पूछता हुआ। स्वागत ऐसा हुआ मानो कोई बस नहीं, बल्कि भूला हुआ वादा आखिरकार हाज़िरी लगाने आ गया हो। फूल-मालाओं से लदे ड्राइवर और कंडक्टर शायद सोच रहे होंगे इतनी इज्जत तो हमें ड्यूटी पर कभी नहीं मिली! ग्रामीणों की खुशी समझ में आती है, क्योंकि अब तक सफर साधनों से नहीं, सब्र से होता था। अब कम से कम धक्के सरकारी होंगे, निजी नहीं। अधिकारियों का धन्यवाद भी जरूरी है। उन्होंने यह सिखाया कि विकास की घड़ी में अलार्म नहीं होता, वह जब चाहे तब बजती है। बस अब यही दुआ है कि यह सेवा फोटो खिंचवाने के बाद गायब न हो जाए, वरना गांव वाले फिर कहेंगे बस आई थी, जैसे सपना आता है… और चला जाता है!
मेहंदी सूखी नहीं, सिलेंडर सूखा है!
अजमेर की यह घटना सिर्फ एक खबर नहीं, व्यवस्था पर सीधा व्यंग है। जिस घर में शहनाइयों की गूंज होनी चाहिए थी, वहां ..डीएम साहब सिलेंडर दिला दो.. की गुहार सुनाई दे रही है। हाथों में मेहंदी लगाए दुल्हनें कलक्ट्रेट पहुंच रही हैं और व्यवस्था अब भी अपनी पुरानी चाल में प्रक्रिया जारी है.. का मंत्र जप रही है। यह दृश्य बताता है कि हमारी प्राथमिकताएं कितनी उलझ चुकी हैं। जहां सबसे जरूरी चीज भी समय पर मिलना एक संघर्ष बन गई है। अब तो लगता है शादी के कार्ड में नया कॉलम जोड़ना पड़ेगा.. स्थान, समय और साथ में सिलेंडर की व्यवस्था स्वयं करें। पहले शादी को घर की इज्जत कहा जाता था, अब लगता है यह गैस कनेक्शन की किस्मत पर निर्भर हो गई है। बिना सिलेंडर के न दाल-बाटी बन सकती है, न मेहमानों का सम्मान; बस आश्वासनों की भाप उड़ती रहती है। अधिकारियों ने आखिरकार दो सिलेंडर देकर संवेदनशीलता दिखा दी। जैसे कोई अधिकार नहीं, एहसान हो। शुक्र है कि बारातियों के लिए खाना बन जाएगा, वरना स्वागत में गरमागरम वादे और ठंडी हकीकत ही परोसी जाती। यह घटना हंसी भी देती है और भीतर कहीं चुभती भी है, क्योंकि सवाल छोटा नहीं है। क्या अब खुशियों का चूल्हा भी कलक्ट्रेट की अनुमति से ही जलेगा?






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