राष्ट्र सम्मान के प्रतीकों पर राजनीति देशहित में नहीं
तमिलनाडु के शपथ ग्रहण समारोह में गीतों के क्रम को लेकर उठा विवाद केवल प्रोटोकॉल का प्रश्न नहीं है। यह उस मानसिकता पर भी सवाल खड़ा करता है जहां क्षेत्रीय पहचान को राष्ट्रीय प्रतीकों के समक्ष खड़ा करने...

राष्ट्रीय गरिमा बनाम क्षेत्रीय राजनीति: प्रतीकों के सम्मान पर उठते सवाल
हाल ही में तमिलनाडु में नई सरकार के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान एक नया विवाद सामने आया। विवाद का केंद्र था समारोह में बजने वाले गीतों का क्रम। आयोजन की शुरुआत में पहले ‘वन्दे मातरम्’ बजाया गया, उसके बाद राष्ट्रगान और अंत में तमिलनाडु का राज्य गीत ‘तमिऴ थाई वाझ्थु’। इस क्रम को लेकर कुछ क्षेत्रीय हलकों में असंतोष दिखाई दिया। उनका तर्क था कि परंपरा के अनुसार राज्य गीत को प्राथमिकता मिलनी चाहिए थी।
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ऊपरी तौर पर यह केवल प्रोटोकॉल का विषय लग सकता है, लेकिन इसके भीतर छिपे संकेत और भविष्य की संभावित चुनौतियां कहीं अधिक गंभीर हैं। सवाल केवल गीतों के क्रम का नहीं, बल्कि उस सोच का है जिसमें क्षेत्रीय पहचान और राष्ट्रीय अस्मिता को आमने-सामने खड़ा करने की प्रवृत्ति दिखाई देने लगती है।
राष्ट्र की अस्मिता सर्वोपरि
भारत जैसे विशाल और लोकतांत्रिक देश में प्रत्येक राज्य को अपनी सांस्कृतिक और भाषाई पहचान पर गर्व करने का पूरा अधिकार है। तमिलनाडु का ‘तमिऴ थाई वाझ्थु’ वहां की गौरवशाली संस्कृति और भाषाई स्वाभिमान का प्रतीक है। उसे सम्मान मिलना ही चाहिए और समारोह में उसे सम्मान मिला भी। लेकिन प्रश्न तब उठता है जब क्षेत्रीय प्रतीकों को राष्ट्रीय प्रतीकों के समानांतर या उनसे ऊपर रखने का आग्रह सामने आने लगे।
राष्ट्रगान और ‘वन्दे मातरम्’ किसी दल, सरकार या विचारधारा के प्रतीक नहीं हैं। वे भारत की साझी विरासत, स्वतंत्रता संघर्ष और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक हैं। यदि किसी राजकीय समारोह में उन्हें प्राथमिक स्थान दिया गया तो इसे राष्ट्र के प्रति सम्मान के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि किसी क्षेत्रीय पहचान के अपमान के रूप में।
दरअसल यह समझना आवश्यक है कि राज्य की अस्मिता और राष्ट्र की अस्मिता परस्पर विरोधी नहीं हैं। राज्यों की पहचान उसी भारत की छत्रछाया में सुरक्षित है जिसकी एकता और अखंडता का प्रतिनिधित्व राष्ट्रगान और ‘वन्दे मातरम्’ करते हैं।
भाषाई विरोध की राजनीति
इसी प्रकार की मानसिकता समय-समय पर हिन्दी विरोध के रूप में भी सामने आती रही है। हिन्दी को अक्सर ‘थोपी गई भाषा’ कहकर उसका विरोध किया जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि हिन्दी को संविधान ने विभिन्न राज्यों के बीच संवाद के एक सेतु के रूप में स्वीकार किया है। इसका उद्देश्य किसी क्षेत्रीय भाषा को कमजोर करना नहीं, बल्कि विविध भाषाई समुदायों के बीच संपर्क स्थापित करना है।
जब भाषा प्रेम राजनीतिक विरोध का माध्यम बन जाता है, तब वह सांस्कृतिक गौरव से आगे बढ़कर विभाजनकारी सोच को जन्म देने लगता है। यह प्रवृत्ति दीर्घकाल में राष्ट्रीय एकता को कमजोर कर सकती है। भारत की शक्ति उसकी भाषाई विविधता में है, लेकिन यह विविधता तभी तक शक्ति है जब तक वह राष्ट्रीय भावना से जुड़ी रहे।
स्पष्ट नीति और संतुलित सोच जरूरी
अब आवश्यकता इस बात की है कि राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान और प्रोटोकॉल को लेकर पूरे देश में स्पष्टता और एकरूपता सुनिश्चित की जाए।
• आधिकारिक कार्यक्रमों में राष्ट्रीय प्रतीकों के क्रम और सम्मान को लेकर समान दिशा-निर्देश होने चाहिए।
• राष्ट्रीय गरिमा से जुड़े विषयों को राजनीतिक लाभ-हानि से ऊपर रखा जाना चाहिए।
• क्षेत्रीय पहचान और राष्ट्रीय सम्मान के बीच कृत्रिम टकराव पैदा करने वाली राजनीति से बचना होगा।
भारत की विविधता उसकी सबसे बड़ी शक्ति है, लेकिन इस विविधता को विखंडन का आधार नहीं बनने दिया जा सकता। क्षेत्रीय गौरव और राष्ट्रीय सम्मान एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं। अंततः यह स्मरण रखना होगा कि एक मजबूत राष्ट्र के भीतर ही मजबूत राज्यों का अस्तित्व सुरक्षित रह सकता है। पहले राष्ट्र, फिर राज्य, यही भारत की वास्तविक आत्मा है।





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