इंडिया गठबंधन की प्रासंगिकता पर सवाल: विपक्ष में विपक्ष
जिस सशक्त विपक्ष की कल्पना की गई थी, उसमें ही दरारें नजर आने लगी है और विपक्षी पार्टियां खुद ही एक दूसरे का विपक्ष बनती दिख रही...

सुरेश व्यास
वरिष्ठ पत्रकार
पिछले साल हुए आम चुनाव के पहले हर आदमी के जेहन में एक ही बात दबी थी कि कि मोदी सरकार से भले ही कई लोग संतुष्ट नहीं हो और दस साल के इस शासन से ऊबकर परिवर्तन करना चाह रहे हों, लेकिन कोई बेहतर विकल्प है ही नहीं कि बदलाव कैसे लाया जाए। इसी सवाल के जवाब में 23 जून 2023 को 26 गैर भाजपाई दल एक मंच पर जुटे और चुनाव से लगभग एक साल पहले ही इंडियन नेशनल डवलपमेंटल इन्क्लुसिव एलायंस (इंडिया) का गठन कर खुद को विकल्प के रूप में प्रस्तुत करने की शुरुआत की। हालांकि नेता और नीति के मामले में गठबंधन बैठकों से ज्यादा कुछ कर नहीं पाया, लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के वापस भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए में जा घुसने के बावजूद इंडिया गठबंधन ने पिछले साल मई में हुए आम चुनावों में मोदी सरकार को कड़ी टक्कर दी। हालांकि कांग्रेस की अगुवाई वाला गठबंधन सरकार तो नहीं बना सका, लेकिन मोदी, भाजपा व एनडीए के सामने चुनौती जरूर खड़ी कर दी। फिर देश को लगा कि कम से कम सशक्त विपक्ष के आगे सरकार की कथित मनमानियों पर अंकुश तो लगेगा, लेकिन जैसे जैसे दिन बीत रहे हैं, वैसे वैसे इंडिया गठबंधन की प्रासंगिकता पर ही सवाल खड़े होने लगे हैं।
जिस सशक्त विपक्ष की कल्पना की गई थी, उसमें ही दरारें नजर आने लगी है और विपक्षी पार्टियां खुद ही एक दूसरे का विपक्ष बनती दिख रही है। इसकी एक तस्वीर संसद के शीतकालीन सत्र में दिखाई दी, जब इंडिया गठबंधन की दूसरी बड़ी पार्टी समाजवादी पार्टी और तीसरे नम्बर की तृणमूल कांग्रेस ही प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस से अलग नजर आई। उद्योगपति अडानी के मामले पर कांग्रेस ने विपक्ष की ताकत के जरिए सरकार को घेरने की कोशिश की, लेकिन गठबंधन की दोनों ही पार्टियां भी साथ खड़ी नहीं रह सकी और दोनों ने इंडिया गठबंधन के सांसदों के संसद परिसर में प्रदर्शन से खुद को दूर रखा। अब संसद का जब बजट सत्र चल रहा है तो इसमें भी कांग्रेस और गठबंधन की अन्य पार्टियों का रुख कई मुद्दों पर अलग अलग ही रहने वाला है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी गठबंधन की गांठ उलझ चुकी है। खुद कांग्रेस अपने गठबंधन की सहयोगी रही आम आदमी पार्टी (आप) के सामने खड़ी है और राजनीतिक विश्लेषक कयास लगा रहे हैं कि इससे कांग्रेस को हो या नहीं, आप को जरूर नुकसान उठाना पड़ सकता है और भाजपा, जिसके पास खोने को कुछ नहीं है, उसे फायदा होने के साथ उसके सत्ताधारी राज्यों की सूची में एक अंक और बढ़ जाएगा।
जाहिर है, इससे ही गठबंधन के खत्म होने की शुरुआत के कयास भी लगने लगे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या भाजपानीत एनडीए से अलग जाने वाले जनसमूह की भावनाएं विपक्षी दल केंद्र में तीसरी बार मोदी सरकार बनने के एक साल बाद ही दबती नजर आएंगी और एक बार फिर उसे विकल्प की तलाश में चार साल और इंतजार करना पड़ेगा। इस सवाल के जवाब में यदि कोई है तो सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस।
वैसे तो कांग्रेस और इंडिया गठबंधन की प्रासंगिकता पर सवाल हरियाणा व महाराष्ट्र विघानसभा चुनावों के बाद कुछ ज्यादा ही मुखर हो चुके हैं, लेकिन माना जा रहा है कि दिल्ली चुनाव के नतीजे इस दिशा में काफी अहम साबित होंगे। राजनीतिक विश्लेषक संतोष कुमार का कहना है कि कांग्रेस लोकसभा चुनाव में मिली सफलता को सहयोगी दलों के साथ भुना नहीं सकी और उसे राज्यों में खुद का फायदा ही नजर आया, इससे इंडिया गठबंधन की अहमियत पर भी सवाल खड़े होने लगे। वे कहते हैं कि हरियाणा में कांग्रेस थोड़ा त्याग करती तो स्थिति अलग होती। उसने आम आदमी पार्टी जैसे सहयोग से हाथ मिलाना उचित नहीं समझा और हाथ में आती दिख रही बाजी पलट गई। नतीजे आए तो भाजपा 70 में से 48 सीटें जीतकर फिर सत्ता पर काबिज हो गई और कांग्रेस को महज 37 सीटों पर संतोष करना पड़ा। उत्तर प्रदेश में भाजपा को सकते में डालने वाले गठबंधन सहयोगी सपा को महाराष्ट्र में सीटें नहीं दी गई। इसका असर यूपी विधानसभा की 10 सीटों के उपचुनावों में दिखा। कांग्रेस चुनाव से दूर रही और सपा संसदीय चुनावों वाली सफलता कायम नहीं रख सकी।
तब से कांग्रेस सहयोगी दलों से ही घिर रही है। शिवसेना (उद्धव) के नेता संजय राउत ने साफ तौर पर कहा कि कांग्रेस जहां कमजोर होती है, वहां क्षेत्रीय दलों का सहारा लेती है और जहां वह मजबूत दिखती है वहां इन दलों को भाव ही नहीं देती। हरियाणा चुनाव नतीजों के बहाने आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने भी यह कहते हुए कांग्रेस को आइना दिखा दिया कि किसी को भी ‘ओवर कॉन्फिडेंट’ नहीं रहना चाहिए और यहीं से चलकर दिल्ली चुनाव तक आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के रास्ते न सिर्फ अलग अलग हो गए, बल्कि रिश्तों में खटास ऐसी आई है कि केजरीवाल ने साफ कहा है कि वे गठबंधन से कांग्रेस को निकलवा कर रहेंगे।
गठबंधन की एक और अहम घटक पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस भी खरगे-राहुल के नेतृत्व वाली कांग्रेस पर लगातार सवाल उठा रही है। ममता ने तो इंडिया गठबंधन पर कांग्रेस के नेतृत्व पर ही सवाल उठा दिया। उन्होंने गठबंधन की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करते हुए कहा कि सभी को साथ लेकर चलना चाहिए। जिम्मेदारी मिलती है तो वे नेतृत्व सम्भालने को तैयार है। उनके बयानों का समर्थन हाथों हाथ एनसीपी नेता शरद पवार और राजद सुप्रीमो लालू यादव तक ने कर दिया और कहा कि ममता में नेतृत्व सम्भालने की क्षमता है। सपा और नेशनल कांफ्रेंस ने भी ममता के प्रस्ताव पर चर्चा करवाने की बात कहकर कांग्रेस को चौंका दिया, लेकिन कांग्रेस ने इसे गम्भीरता से लेने की बजाय उदित राज जैसे नेताओं के मुंह से कहलवा दिया कि टीएमसी अभी नेतृत्व करने जैसी बड़ी पार्टी नहीं है। वह बंगाल के बाहर तक नहीं निकल पा रही। इधर, ममता बनर्जी ने हाल ही बांग्ला में लिखी अपनी किताब में कांग्रेस पर तीखा हमला किया और कहा कि भाजपा कांग्रेस के कारण जीतती है।
कांग्रेस की कार्यशैली पर भी सहयोगी दल सवाल उठा रहे हैं। इनमें प्रमुख है चुनावी हार के बाद ईवीएम पर ठीकरा फोड़ने की कांग्रेस की आदत। भाजपा को तो जाहिर है इसे खारिज करना ही था, लेकिन प्रमुखता से नेशनल कॉन्फ्रेस के नेता व जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुला ने भी कह दिया कि अगर हम जीतने के बाद जश्न मनाते हैं तो कुछ महीनों बाद हार पर ईवीएम को खारिज नहीं किया जा सकता। ऐसे ही स्वर टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी के मुंह से भी निकले कि हकीकत है तो साबित कीजिए, वरना ईवीएम पर बयान देने का कोई औचित्य नहीं है।
और भी कई मुद्दे हैं, जो संकेत कर रहे हैं कि आपसी मनमुटाव के चलते कांग्रेस और इंडिया गठबंधन की दूरियां बढ़ती जाएंगी और लगातार हार की हताशा अंततः एनडीए और मोदी के लिए रास्ता बनाती जाएगी। वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप राणा कहते हैं कि इंडिया गठबंधन के प्रदर्शन ने जो उम्मीद दिखाई थी, वह खत्म हो चुकी है। बिना मजबूत नेतृत्व औप ठोस नीति के एनडीए व मोदी को टक्कर नहीं दी जा सकती और ये दोनों ही चीजें न कांग्रेस के नेतृत्व में दिख रही है और न ही इस दिशा में कोई कोशिश हो रही है। उल्टे गठबंधन में शामिल दलों का टकराव बढ़ता ही जा रही है। कांग्रेस न तो इंडिया गठबंधन को मजबूत नेतृत्व दे सकी और न ही क्षेत्रीय दलों व सहयोगियों को पचा सकी। हालत यह है कि राज्यों के चुनाव तो क्या राष्ट्रीय परिदृश्य में भी इन दलों में एकता नहीं दिख रही।
राणा कहते हैं कि कांग्रेस गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी बनने के नाते अधिकारपूर्वक इंडिया गठबंधन का नेतृत्व अपने हाथों में लेकर राष्ट्रीय मुद्दों पर आंदोलनों की अगुवाई करते हुए इसकी प्रासंगिकता को बरकरार रख सकती थी, लेकिन कांग्रेस ने ऐसी कोई पहल की नहीं। वह अब भी संविधान व आरक्षण बचाने, जातिगत जनगणना, अम्बेडकर के मान-अपमान, आरएसएस की आलोचना और अडानी-अम्बानी के मुद्दों तक ही खुद को सीमित रख रही है। जबकि गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर सहानुभूति के जरिए विपक्ष को धार दी जा सकती थी। इस पर शायद कांग्रेस के नेता भाषणों में ही बात करते हैं, जमीन पर करने के लिए उनके पास जैसे कोई नीति ही नहीं है। धर्मनिरपेक्षता जैसे मुद्दे पर कांग्रेस के पास भाजपा-संघ को गाली देने के अलावा कुछ है नहीं और वह सॉफ्ट हिन्दुत्व के नाम पर बहुसंख्यक लोगों से अलग होती जा रही है।
कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि मौजूदा राजनीतिक हालात में कांग्रेस को आत्ममंथन करना चाहिए। सबसे पुराने वामपंथी दल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता डी. राजा ने तो कहा भी है कि कांग्रेस बड़ी पार्टी है, उसे मौजूदा केंद्र सरकार और भाजपा की नीतियों से मुकाबले के लिए खुद के अंदर झांककर देखना होगा। वरिष्ठ पत्रकार अजय बुआ कहते हैं कि अब चूंकि लोकसभा के चुनाव साढ़े चार साल बाद ही होंगे, जब तक भाजपा के सामने डटे रहने के लिए नेता से ज्यादा नीति जरूरी है। कांग्रेस को सभी सहयोगी दलों को एक समान नीति पर राजी करने की पहल करनी होगी। देश को भी एक सशक्त विपक्ष की उम्मीद है और यदि गैर एनडीए पार्टियां इस उम्मीद पर खरी नहीं उतरती है तो जनता किससे उम्मीद लगाएगी।
लोकसभा चुनाव में एनडीए बनाम इंडिया
एनडीए———————-इंडिया
भाजपा——240———–कांग्रेस——99
टीडीपी——-16————सपा———37
जदयू———12————डीएमके—–22
शिवसेना (शिंदे)—07—— तृणमूल—–29
एनसीपी (अजीत)—01—-एनसीपी (शरद)——08
जनसेना——-02———– शिवसेना (उद्धव)—–09
एलजेपी—–05————– माकपा——-04
आरएलडी——02———– राजद——–04
जेडीएस———02———–भाकपा——-02
अन्य————06———–अन्य——–20
कुल————293————234
लोकसभा में कांग्रेस
2014—-44
2019—-52
2024—-99






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