होली में भंग की तरंग में बंट गए बापू !!
ध्यान रहे- जिस आंगन के बंटवारे में बापू को भी बांट दिया जाता है वह आंगन फिर मुश्किल से मुस्करा पाता...

डॉक्टर सुरेश अवस्थी, कानपुर
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भीगे हुए रंग में
भंग की तरंग में
कुछ लोग गांधी बापू पर बहस कर रहे थे
बहस क्या,
एक दूसरे के दिमाग का तहस नहस कर रहे थे
एक बोला- गांधी बापू महान थे
राजनीति से बिल्कुल दूर
एक सच्चे इंसान थे
दूसरा बोला-
गलत, गांधी बापू ने चलाया आंदोलन सत्याग्रह और स्वदेशी
वो थे पक्के राजनीतिज्ञ, कांग्रेसी
तीसरा बोला-
बापू ने दलितों को गले से लगाया
उन्हें आगे बढ़ाया
उनके लिए एक बड़ा काम किया
उन्हें हरिजन जैसा नाम दिया
इसलिए मैं दावे से कहता हूं भाई
गांधी बापू कांग्रेसी नहीं थे,
वो थे पक्के बसपाई।
चौथा बोला-
जो आदमी जिंदगी झूठ फरेब में डोलता है
वह भी मृत्यु के समय सच बोलता है
असल जीवन मे भी सत्यवादी बापू ने
मृत्यु के समय
थी राम राम की आवाज़ लगाई
इसलिए मेरे ख्याल से
गांधी बापू थे भाजपाई
एक बुजुर्ग व्यक्ति बहस को सुन सुन कर परेशान था
वह- राजनीति से दूर सच्चा इंसान था
बोला- आप लोग बेमतलब की बहस मत ठानो
बापू की सच्चाई को पहचानो
राजनीति की आरी ने
हमारी देह को तो काट ही दिया है
अब आत्मा को तो मत काटो
आंगन का बंटवारा क्या कुछ कम है
अब बापू को तो मत बांटो
ध्यान रहे-
जिस आंगन के बंटवारे में
बापू को भी बांट दिया जाता है
वह आंगन फिर
मुश्किल से मुस्करा पाता है।
(दो)
होली के रंग : चुनावी – भिखारी के संग
।।
गले में केसरिया दुपट्टा
सिर पर टोपी लाल
हरे रंग का पजामा, सफेद बनियाइन
उस भिखारी का रूप था कमाल
उसके कटोरे पर-
हाथी, कमल, हाथ, साइकिल
सहित कई और बने थे चित्र
लोगों को कह रहा था –
भैया – बहिनों, दादा, चाची और मित्र
हाथ हिला हिला कर लोगों को
अपने पास बुला रहा था
पीठ तक धंसे पेट पर बना
हिंदुस्तान का नक्शा दिखा रहा था
मैंने कहा-
हे आजाद देश के सपूत महान
आप तो ईस्टमैन कलर हो रहे हैं श्रीमान
वह बोला-
होली पर मजाक मत करो
मेरे खाली कटोरे को
वोटों से नहीं, रेवड़ियों से भरो
चुनावी- होली पर हमारा कटोरा तो
सबके लिए है खुला।
जो दे उसका भी भला
जो न दे उसका भी भला।
“सच बोलो”- व्यंग्य ग़ज़ल
तुमने कितना माल पचाया सच बोलो
पूछ लिया, क्यों गुस्सा आया सच बोलो
आत्मकथा लिखने को वो बोली तो फिर
जिंदा उसको क्यूं जलवाया सच बोलो
धन की खातिर मां और बाप को छोड़ दिया
ये गुण तुमने किससे पाया सच बोलो
हमने कहा जो इश्क तुम्हारा झूठा है
तुमको क्यों कर रोना आया सच बोलो
तुम तो मसीहा खुद को कहते थे हरदम
खोट कहां से मन में आया सच बोलो
कुछ व्यंग्य दोहे…
साईं इस संसार में,
ऐसे मिले फकीर।
भीतर से ‘लादेन’ हैं,
बाहर दिखें कबीर।
मुंह खोलें मिसरी झरे,
भीतर धरे बिलेड।।
मौका पाते गपक लें,
ए, बी, सी, डी, जेड।
मुफ्त जहां जो भी मिले,
लपक- गपक झट खात।
स्वान सरीखा आचरण,
हैं मानुष की जात।।
ओस चाट सीटें अधर,
बोलें सागर बोल।
औरन को उपदेश दें,
करो खर्च दिल खोल।।
चोर-चरित, चित-कोबरा,
ऐसे मारें दांव।
कल तक छूते पांव थे,
आज घसीटें पांव।।






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