हंसाते गुदगुदाते ‘ स्वांग ‘
होली पर आप अगर बीकानेर आते हैं तो आपको ऐसे कुछ अद्भुत नजारे और ऐसे संवाद देखने और सुनने को मिल सकते...

राजीव हर्ष
वरिष्ठ पत्रकार
हाथ में लाठी लिए बापू कचौरी समोसों की दुकान के आगे खड़े डोनाल्ड ट्रम्प का इंतजार कर रहे हैं। काफी इंतजार के बाद ट्रम्प को आता देख बापू झल्लाते हुए कहते हैं “कठे थो, इत्ती देर लगाय दी, हुं अठे उडीकतो उडीकतो तत्तो हुयग्यो, ऊपर सूं ए टींगरिया तंग करे, भूख लाग रई है, दिनूगे सूं कईं खायो कोयनी,कचोड़ी री दुकॉन आगे खड़ो हूं, थोने ध्यॉन राखणें चईजे कि खाली पेट अठे उडीकणे कतो दोरो है। अर पुतीन कठे है। हाल आयो कोयनी, म्हे सूं अबे उडीकीजे कोयनी, फेर बो कैवे लो के एकेला एकेला खा यग्या।”
वहीं ट्रम्प बापू को पगे लागणा कर झुंझलाते हुए कहते हैं “म्हाराज खटाव राखो, बो लारले चौक में खड़ो है, जेलेंस्की भी बी रे सागे इ है। कई म्हाराज पाटे माथे बेठा है बों झाल लियो, म्हे तो कोंकर ई कर आयग्यो पण बो झल ग्यो, आय जासी थेाड़ी देर में।”
बापू बोले “ सोनिया गांधी, नरेंद्र मोदी अर बाकी लोग कठे है। बे कठे फंस ग्या”।
ट्रम्प बोले “आय रया है। बस पोंचण वाळा ही है।”
होली पर आप अगर बीकानेर आते हैं तो आपको ऐसे कुछ अद्भुत नजारे और ऐसे संवाद देखने और सुनने को मिल सकते हैं। आप महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, डोनाल्ड ट्रम्प, पुतीन, नरेंद्र मोदी, सोनिया गांधी , राहुल गांधी सरीखे नेताओं से मिल सकते हैं, उनसे संवाद कर सकते हैं। बॉलीवुड के अभिनेता भी मिल सकते हैं। बापू, ट्रम्प, पुतीन, नेता, अभिनेता ये सब स्वांग है जो होली के दिनों में बीकानेर में नजर आते हैं।
और भी रोचक और रोमांचक नजारा आपको वहां देखने को मिलेगा जहां ये हस्तियां फुटबाल खेलती हैं। इनके फुटबॉल के इस खेल को बीकानेर वाले फागणिया फुटबॉल कहते हैं। इस खेल में केवल नेता और अभिनेता ही नहीं देवी, देवता,राक्षस, रीछ भालू भी अपने अपने अंदाज में खेलते नजर आते हैं। यहां न कोई टीम है, न कोई गोल दागना है, न किसी को हराना है न किसी पर जीत हासिल करना है। यहां हर खिलाड़ी विजेता है।
पिछले कुछ सालों से आयोजित हो रहे इस फागणिया फुटबाल के खिलाड़ी ही नहीं दर्शक भी अनूठे ही होते हैं। खास बीकानेरी अंदाज में हूटिंग कर वे इस खेल को और भी मस्ती भरा बना देते हैं।
दर असल स्वांग बीकानेर के लोगों की विनोद प्रियता को दर्शाते हैं। इन स्वांग की साजसज्जा, वस्त्र, आभूषण,भाव भंगिमा इन्हें वास्तविकता के इतना करीब ले जाते हैं कि इनके स्वांग होने पर ही भ्रम होने लगता है।
कहीं किसी चौराहे पर चौराहे पर खडा एक भोला – भाला ग्रामीण, शहर के रास्ते नहीं जानता, वह यह निर्णय नहीं पा रहा है कि किस तरफ जाया जाए। वह बोल भी नहीं पाता केवल इशारे करता है। बच्चों का झुंड उसके पीछे लगा है। बच्चे इस भोले भाले ग्रामीण को चिढा कर मजे ले रहे हैं। बुजुर्ग उसे अपने पास बुलाते हैं, उसकी परेशानी पूछते हैं तो वह इशारे से कुछ समझाने का प्रयास करता है। इशारों इशारों में बताता है कि उसकी पत्नी कहीं खो गई है, इशारों से ही वह अपनी पत्नी का नखशिख वर्णन करता है।
लोग उससे तरह तरह के सवाल करते है वह इशारों से, भाव भंगिमा से जवाब देता है। सवाल जवाब का यह सिलसिला बडा रोचक और मनोरंजक होता है। स्वांग को घेर कर खडी भीड इसका आनंद उठाती है।
कहीं कोई साधु, कोई नेता तो कोई राक्षस तो कोई रीछ, भालू का रूप धरे नजर आता है। कहीं कोई मोहिनी बन भस्मासुर को अपनी ओर आकर्षित करता है।
कहीं डफ बजाते हुए फागुन के गीत गाते हुए युवकों की टोली के साथ नृत्य करती महिलाएं नजर आती है । दर असल ये महिलाएं नहीं पुरुष ही होते है महिलाओं के वेश में।
बीकानेर में होली पर दो तरह के स्वांग नजर आते हैं । एक स्वांग वे, जो यहां विभिन्न मोहल्लों में खेली जाने वाली ऐतिहासिक कथानकों पर आधारित रम्मत (लोकनाट्य) में रानी, दासी आदि की भूमिका निभा रहे होते हैं। दूसरे तरह के स्वांग वे होते हैं जो स्वतंत्र रूप से अकेले या मित्रों की टोली के संग धूमते हुए सडकों ओर चौराहों पर नजर आते हैं।
रम्मत और नौटंकी जैसे लोकनाट्य में स्वांग बनने की पम्परा तो हर कहीं है। मगर अकेले ही स्वांग बनने की परम्परा कहीं कहीं ही मिलती है। ये स्वतंत्र स्वांग बीकानेर की होली को एक अलग पहचान देते हैं। ये स्वांग अपनी मर्जी के मालिक होते हैं। मनचाहा रूप धारण कर लोगों को हंसाते गुदगुदाते हैं। होलाष्टक लगने के बाद से ये शहर की सडकों पर नजर आने लगते हैं।
कुछ समय पहले तक इन स्वांग की बड़ी धूम हुआ करती थी जो बीकानेरी होली को एक अलग अंदाज प्रदान करती थी। अब स्वांग पहले से कुछ कम नजर आने लगे हैं।






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