मेवाड़ के संग, होली के रंग
होली का उत्सव इस राज्य के मारवाड़, मेवाड़, ढूंढाड़, शेखावटी, मेवात, हाड़ौती में सर्वत्र मन्दिरों और गांव शहर के बाजारों, चौपालों और हर घर हर आंगन जिस रंगबिरंगे माहौल में मनाया जाता...

डॉ. राकेश तैलंग, कांकरोली
आनन्दोल्लास के विविध रंगों में डूबा राजस्थान अपने त्यौहार पर्व और उत्सवों के लिये ख्यात है। होली का उत्सव इस राज्य के मारवाड़, मेवाड़, ढूंढाड़, शेखावटी, मेवात, हाड़ौती में सर्वत्र मन्दिरों और गांव शहर के बाजारों, चौपालों और हर घर हर आंगन जिस रंगबिरंगे माहौल में मनाया जाता है। वह राजस्थान को सम्पूर्ण देष में एक विषिष्ट पहचान देता है।
राजस्थान राज्य के मेवाड़ अंचल में त्यौहार पर्वों का उल्लास यहां के ग्रामीण जनजीवन से लेकर राजमहलों के गलियारों में जीवन पाता रहा है। इसीलिये होली की बात हो और मेवाड़ की चर्चा न हो ऐसा हो नहीं सकता। आज के आनन्द में डूबी होली के विविध रंगों का दूसरा नाम है मेवाड़। नाम तो यों भी कई हैं, वसंतोत्सव, होलिकोत्सव, मदनोत्सव, फागोत्सव।
आज के आनन्द की जय की धरा श्रीनाथद्वारा और कांकरोली के होलिकोत्सव पर नजर डालें, उससे पूर्व यह भी जान लें कि इन धार्मिक केन्द्रों की उत्सव आयोजन की परम्परा का स्रोत है ब्रजमण्डल, जहां बृज, बृजेश और बृजभाषा की त्रिवेणी में कृष्ण सेवा को जिस कुशलता के साथ हमारी कृषक संस्कृति-कालिन्दी कूल, कदम्ब, वन, उपवन, गो और गोपालक को त्यौहारों के माध्यम से उजागर किया है, वह सीधे सीधे इस उत्सव को जो उसी मस्ती का आलम ले राजस्थान में आया। वह आज भी अपने उसी खालिस अन्दाज में यहां विशेष रूप से मेवाड़ की धरा के ब्रज और राजस्थान की समान रूप कृषक संस्कृति के दो प्रमुख केन्द्रों नाथद्वारा और कांकरोली में देखने को मिलता हैं।
बचपन से आज तक यह जाना है कि भारतीय संस्कृति में पर्वोत्सव सदैव सामूहिक आनन्द का अवसर होते हैं। वे हमारे इन धार्मिक केन्द्रों में मन्दिर और मन्दिर के बाहर के जनजीवन को उस दिन के आनन्द की एक छतरी के नीचे लाकर खड़ा कर देने के अवसर होते हैं। इन दिनों श्रीनाथजी, श्री द्वारकाधीशजी और श्री विट्ठलनाथजी अपने निज मन्दिर (जिन्हें हम ब्रजभावना से नन्दालय कहकर बुलाते हैं) से होली के रंगों से जनजीवन को सराबोर करने में रमे हुए हैं। यह हमारे इन लोकरंजन व लोकमंगलकारी ठाकुरजी की ब्रजमण्डल की ‘निकुंज लीला‘ कहलाती है।
वल्लभ सम्प्रदाय के इन मन्दिरों में होली के आगमन की यह छटा माघ शुक्ल पंचमी (वसन्त पंचमी) से प्रारम्भ होकर निरन्तर चालीस दिन तक प्रतिदिन विभिन्न कीर्तनों, भोग व श्रृंगार की विविधता के साथ चलती है। ऐसा कहा जाता है श्रीकृष्ण के ये विग्रह या स्वरूप नन्दभवन में अपने सभी रूपों- यशोदा द्वारा लाड़ लड़ाये जाने वाली छवि सहित गोपीजन वल्लभ, निकुंज नायक और उत्सव नायक के रूप में विभिन्न अष्टकालीन दर्शनों में भक्तों को आनन्द में डूब जाने व समस्त कष्टों को भूल जाने की प्रेरणा देते हैं। बिना इच्छा किये भी कष्ट निवारण करना तो उनका धर्म है। भक्त चिन्ता क्यों करे? इसीलिये होली उत्सव में वे कभी माता यशोदा द्वारा श्रृंगारित होकर विभिन्न रंगों से रंगी गायों, ग्वाल बालों के बीच लीलाएं करते दिखते हैं तो कभी गोपियों के साथ निकुंज लीला में रंगों से नहाये नजर आते हैं। ब्रजमण्डल और मेवाड़ प्रान्त के लघुब्रज नाथद्वारा-कांकरोली में ये दिन केसर, चौवा, अबीर, गुलाल से रंगीन ठाकुरजी के ‘वसन्त खेल‘ के दिन है। राग (कीर्तन) हो, भोग हो या प्रभु का श्रृंगार, सभी में वासन्ती आभा दृष्टिगत होती है। यह सेवा माघ शुक्ल 15 होरी डण्डारोपण से माघ स्नान की समाप्ति के साथ अपने चरम पर होती है।
इस अवसर पर ऋतु अनुकूल अष्टछापी कीर्तनों की राग सेवा के स्वरों का आनन्द बड़ा मोहक होता है। आमल की कुंज में प्रभु के गोपी-जन सहित निकुंज में बिराजने की लीला हो या चौरासी स्तम्भ, होलिका प्रदीपन, धूरिवन्दन व डोलोत्सव हो, चालीस दिन के उत्सवों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं। वसन्त पंचमी से प्रारम्भ ‘खेल‘ और रंग गुलाल के दर्शन इन देवालयों में रंग, रस और राग का अलौकिक वातावरण तैयार करते हैं। कीर्तनों में धमार गायन, वसन्त राग में मोहक पदगान श्रीनाथजी, श्री द्वारकाधीषजी और श्री विट्ठलनाथजी की हवेलियों में गूंजने लगते हैं। मेवाड़ की शौर्य से पूर्ण पारंपरिक संस्कृति ने जिस समाहारमूलक भावना के साथ श्रीकृष्ण की लीलाओं को स्वयं में आत्मसात कर लिया, यह आश्चर्य का विषय है।
प्रभु को सुवासित इत्र, जल से अभ्यंग स्नान का क्रम होरी डण्डारोपण, श्रीजी उत्सव, होली व डोल तक निरन्तर रहता है। साथ ही पुष्टिमार्गीय भोग सेवा को इस अवसर पर यहां की ‘तपेलियों‘ (मन्दिर का रसोईघर) में बनने वाले भोग की विविधता के रूप में देखा जा सकता है। कहा जा सकता है कि फागोत्सव ऋतु परिवर्तन की प्रसन्नता के साथ इस सन्देश को देने वाला होता है कि पतझड़ के बाद वसन्त को आना ही है।
समस्त वसन्त ऋतु में ‘राल‘ दर्शन एक अत्यधिक रोचक दर्शनीय परम्परा है। विशेष ‘ज्वलनशील पर्यावरण शोधक पदार्थों‘ के मिश्रण को अग्नि में वेग के साथ फैंककर आबाल, वृद्ध, युवा सहित हमारे बालरूप ठाकुर श्रीकृष्ण की रोग, शोक व देहशुद्धि कर समस्त वातावरण की शुद्धि की कल्याण कामना की जाती है। कहा जाता है कि ‘राल‘ दर्शन भगवान श्रीकृष्ण द्वारा समस्त ब्रजवासियों की दावानल से रक्षा कर अभयदान देने की लोक हितकारी लीला का एक भव्य रूप भी है।
वसन्त पंचमी से लेकर होली के दूसरे दिन ठाकुरजी को झूले में विराजित कर रंग, गुलाल, अबीर के उछाल के साथ भक्त और भगवान मन्दिर के प्रांगण में जो आनन्दोत्सव मनाते हैं, वह भक्ति परम्परा इस उत्सव को लोकरंजनकारी बना देती है। श्वेत पिछवाई पर भगवान, भक्त, गोप, गोपबालाएं, गोधन, गोवर्द्धन, ब्रज के निकुंज वन के चित्र केवल हाथों से गुलाल उछालकर उकेरने और रंग-गुलाल भरी पिचकारियों के साथ ठाकुरजी के मस्तक पर आम के ‘मोड़‘, खजूर और सरसों की डाल से ‘वसन्तघट‘ सजाकर होली के पर्व का आयोजन मेवाड़ के इन प्रतिनिधि मन्दिरों में देखा जा सकता है। केसर, चौवा, अबीर, गुलाल में रंगे वसन्त पंचमी से लेकर ‘डोल‘ और ‘द्वितीयापाट‘ की चालीस दिवसीय सेवा नाथद्वारा, कांकरोली के अतिरिक्त मेवाड़ के एक अतिप्राचीन तीर्थ श्रीचारभुजानाथ (गढ़बोर) व श्रीरूपनारायणजी (सेवंत्री) की परम्परा का उल्लेख करना आवश्यक है, जहां होली के तत्काल बाद चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से चतुर्दशी पर्यन्त ‘फाग‘ का आयोजन होता है। प्रतिदिन गुलाल, रंग में नहाये श्रीचारभुजानाथजी, श्रीरूपनारायणजी और उनके भक्त मन्दिर प्रांगण में श्रीकृष्ण लीलाओं का नाट्य करते हैं, भजन गाते हैं और ‘डांडिया नृत्य‘ करते हैं। यही अवसर होता है जब चैत्र एकादशी के दिन पीपावंश के समाजजन द्वारा मन्दिर पर नयी ध्वजा का आरोहण होता है।
भक्ति और शक्ति की धरा मेवाड़ में होली के उत्सव के आनन्द को सोत्साह सार्वजनिक जीवन के साथ जोड़ने के बहुविध तरीके खोजे गये हैं यहां के उत्सवप्रिय जन-जन ने। इनमें से गेर नृत्य एक माध्यम है। चाहे बड़ा भाणुजा का फूलडोल हो, मेनार की शौर्य प्रदर्शन वाला नृत्य अथवा शीतला सप्तमी पूजन के बाद घर-घर की पारिवारिक धुलण्डी और शाम कांकरोली द्वारकाधीश मन्दिर के गोवर्द्धन चौक प्रांगण में होरी के हुड़दंगियों की आसोटिया की गेर। लगता है तब ये आनन्दोत्सव जन-जन को संवेदना के एक सूत्र में बांध देते हैं। आइये, इस वर्ष की होली धुरण्डी को हम सब मेवाड़ की संवेदना के रंगीन समुन्दर में डूब डूब कर मनाते हैं।






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