रंग, रस और राजस्थान
राजस्थान की होली में लोक-जीवन की छवि स्पष्ट रूप से झलकती है, जहां गीत-संगीत, आस्था और उत्साह का अद्भुत संगम देखने को मिलता...

होली के अनूठे रंग
होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और समाज की जीवंतता का प्रतीक भी है। राजस्थान में होली का उत्सव अपने अनोखे रीति-रिवाजों, पारंपरिक नृत्यों और ऐतिहासिक परंपराओं के कारण विशिष्ट महत्व रखता है। राजस्थान की होली में लोक-जीवन की छवि स्पष्ट रूप से झलकती है, जहां गीत-संगीत, आस्था और उत्साह का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। इतिहासकारों के अनुसार, होली का यह उत्सव प्राचीन काल से ही विभिन्न रूपों में मनाया जाता रहा है, जो राजस्थानी समाज की सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक विविधता को दर्शाता है।
गेर नृत्य की परंपरा
राजस्थान के बांसवाड़ा जिले के त्रिपुर सुंदरी मंदिर परिसर में होली के अवसर पर गेर नृत्य की परंपरा अद्वितीय है। यह नृत्य आदिवासी लोक-परंपरा का हिस्सा है, जिसमें ढोल और चंग की थाप पर युवक-युवतियां सामूहिक रूप से नृत्य करते हैं। लोक-संस्कृति विशेषज्ञों के अनुसार, यह नृत्य न केवल मनोरंजन का साधन है बल्कि यह समुदाय की एकजुटता और धार्मिक आस्था का भी प्रतीक है। यह परंपरा 29 वर्षों से मंदिर परिसर में चली आ रही है, जिसमें भाग लेने वाले लोगों को पारंपरिक मिठाइयों जैसे गुझिया, मालपुआ और लड्डू परोसे जाते हैं।
डोलची होली
डीडवाना की डोलची होली लगभग 300 साल पुरानी परंपरा है, जो समुदायों के बीच सौहार्द का प्रतीक मानी जाती है। इसमें पुरुष ऊंट की खाल से बनी डोलची नामक विशेष बर्तन से एक-दूसरे पर पानी फेंकते हैं। इतिहासकारों का मानना है कि इस परंपरा की शुरुआत दो समुदायों के बीच आपसी तनाव को समाप्त करने के लिए हुई थी, जो समय के साथ सौहार्द और भाईचारे के उत्सव में बदल गई। इस आयोजन में केवल पुरुष भाग लेते हैं, जबकि महिलाएं और बच्चे इसे दूर से देखने का आनंद लेते हैं।
फूलों की होली
राजस्थान में फूलों की होली भी विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जिसका आयोजन जयपुर, सीकर और उदयपुर में किया जाता है। जयपुर के गोविंद देवजी मंदिर में होली के दौरान गुलाब और अन्य फूलों की वर्षा की जाती है। यहां राधा-कृष्ण की प्रेमलीला का मंचन किया जाता है, और ब्रज की तर्ज पर रंगीन पंखुड़ियों से होली खेली जाती है।इतिहासकार बताते हैं कि यह परंपरा मुगलकाल में भी लोकप्रिय थी, जब आमेर के शासकों ने इसे अपने उत्सवों में शामिल किया था। सीकर के बावड़ी गेट स्थित रघुनाथ जी मंदिर में भी फागोत्सव के तहत फूलों की होली खेली जाती है, जो लोक-संगीत और भजन-कीर्तन से सजी रहती है। उदयपुर में यह उत्सव राजघराने की परंपराओं से जुड़ा हुआ है, जिसमें महाराणा की उपस्थिति में विशेष आयोजन किए जाते हैं।
पत्थरमार होली
राजस्थान के बांसवाड़ा, बाड़मेर, बारां और जैसलमेर जैसे सरहदी इलाकों में पत्थरमार होली खेली जाती है। इसमें लोग दो समूहों में बंटकर एक-दूसरे पर पत्थर फेंकते हैं। बचाव के लिए सिर पर पगड़ी और ढाल का प्रयोग किया जाता है। जैसलमेर में इसे कंकड़मार होली के रूप में मनाया जाता है, जहां छोटे पत्थरों के साथ होली की बधाई दी जाती है। लोक-संस्कृति विशेषज्ञों का मानना है कि यह परंपरा राजस्थान के योद्धा समाज की संघर्षशील प्रवृत्ति को दर्शाती है, जो आपसी भाईचारे के रूप में बदल गई।
खूनी होली
डूंगरपुर के भीलूडा गांव में 200 साल से “खूनी होली” की परंपरा चली आ रही है। इसमें लोग रंगों के बजाय एक-दूसरे पर पत्थर फेंकते हैं। इस दौरान कई लोग गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता है। हालांकि, स्थानीय लोग इसे शुभ मानते हैं और इसे खेल भावना के रूप में देखते हैं। इतिहासकारों के अनुसार, यह परंपरा भील जनजाति के शौर्य और उनकी युद्ध-कला से जुड़ी हुई है, जो समय के साथ धार्मिक उत्सव का हिस्सा बन गई।
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Blurb -राजस्थान की होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि राज्य की संस्कृति, परंपराओं और उत्सवप्रियता का अद्भुत संगम है। यहां होली को अलग-अलग रूपों में मनाने की परंपराएं सदियों से चली आ रही हैं। चाहे वह फूलों की होली हो, गेर नृत्य हो, डोलची होली हो या फिर पत्थरमार होली, हर एक रूप में राजस्थान की विरासत और सामाजिक सौहार्द की झलक मिलती है। यही कारण है कि राजस्थान की होली न केवल भारतीयों बल्कि विदेशी पर्यटकों को भी अपनी ओर आकर्षित करता है।






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