आप के साथ तो खेला हो गया
देश की राजधानी में इतनी ताकत के साथ कमल खिला कि आप के सारे रंग फीके पड़ गए। इस जन्म में मोदी-शाह को दिल्ली की ताजपोशी से दूर रखने के आप के ख्वाब पानी-पानी हो...

होली से पहले देश में गूंज गया
दिल्ली के विधानसभा चुनाव आम आदमी पार्टी और उसके संयोजक अरविंद केजरीवाल के लिए बुरा ना मानो होली जैसे चरितार्थ साबित हो गए। रंगों के पर्व से पहले विधानसभा चुनाव में जीत का जश्न मनाने के लिए केजरीवाल एण्ड टीम ने दुनिया भर की तैयारियां कर ली थीं। केन्द्र की मोदी सरकार और गृहमंत्री अमित शाह को तीसरी बार पटखनी देने के लिए आप पार्टी ने साम-दाम-दण्ड और भेद सब लगा दिए, लेकिन भगवा रंग ने उनको ऐसा लपेटा की झाड़ू के तिनके-तिनके बिखर गए। देश की राजधानी में इतनी ताकत के साथ कमल खिला कि आप के सारे रंग फीके पड़ गए। इस जन्म में मोदी-शाह को दिल्ली की ताजपोशी से दूर रखने के आप के ख्वाब पानी-पानी हो गए। होली के अवसर पर राजस्थान टुडे दिल्ली विधानसभा के चुनावी नतीजों को अपने चुटीले अंदाज में व्यंग्य के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके पीछे न तो किसी को नीचा दिखाने का मकसद है और न ही किसी व्यक्ति विशेष का मन दुखाना उद्देश्य है। आलेख का विशुद्ध मंतव्य होली के पर्व को सार्थक रूप से परिभाषित करना है। इसके बावजूद किसी को अच्छा नहीं लगे या किन्हीं शब्दों पर आपत्ति हो तो हम इतना ही कहेंगे, बुरा न मानो होली है, शब्दों की ये तीखी बोली है…।
इसे कहते हैं खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी मारना
होली पर ये कहावत सबसे अधिक आप पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर खरी साबित होती है। चुनाव से पहले जेल जाना और जमानत पर छूटकर आने के बाद भी जेल जाने जैसे ढेरों प्रपंच करना, केजरीवाल ने विधानसभा चुनाव के दौरान यही सब किया। चुनाव जीतने के लिए मर्यादा तोडऩा और उसकी सीमाओं को लांघना, उन्होंने जो कुछ भी करना था सब किया। हर बार की तरह केजरीवाल ने इस बार भी यही सोचा कि वे तो अकेले खुले आंखों से मैदान में युद्ध करने उतरे हैं, बाकी सब तो धृतराष्ट्र हैं। विपक्ष भी और जनता भी। पर, काठ की हांडी बार-बार थोड़े चढ़ती है जनाब। अपनी करनी का फल तो एक न एक दिन भुगतना पड़ता है। झूठ के सहारे कब तक सच को छलते रहेंगे? इस प्रश्न का उत्तर तो मिलना ही था। ऊपर से अपने पैरों पर इतनी बार कुल्हाड़ी मार ली कि ठीक से चलना तो दूर खड़े होना तक भारी पड़ गया। केजरीवाल न केवल खुद डूबे, बल्कि पूरी पार्टी को भी ले डूबे। खुद की सरकार में तैयार किए गए शराब घोटाला, भ्रष्टाचार और शीशमहल के भुनगे में ऐसे उलझे कि आगे के रास्ते तक बंद दिखाई दे रहे हैं। केजरीवाल और उनकी टीम का भविष्य आगे क्या होगा, इसके बारे में वे पूरी तरह से आश्वस्त होंगे, क्योंकि सभी जमानत पर हैं और इस बार अंदर गए तो फिर बाहर आना कठिन राह पर चलने जैसा होगा। चाल, चरित्र और चलन की हवा से भरा गुब्बारा होली से पहले इस तरह से फुस्स हो जाएगा, इसकी परिकल्पना कम से कम राजनीति की एबीसीडी जानने वालों ने तो कई महीनों पहले कर ली थी।
न खुदा मिला और न विसाल-ए- सनम, न इधर के हुए न उधर के हुए
होली से पहले ये पंक्तियां दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी मार्लेना एकदम फिट बैठती हैं। पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल के जेल जाने के बाद बड़ी मुश्किल से सत्ता उनके हाथ में आई और उनको लगने लगा कि फिर से तकदीर पासा पलटेगी और वे दिल्ली के तख्त पर काबिज रहेंगी। इसके लिए उन्होंने जतन भी सारे केजरीवाल स्टाइल के किए। स्वयं को भरत मान बैठीं और केजरीवाल को राम। बोलीं, खड़ाऊ को सामने रखकर सत्ता को संभालेंगी और जैसे ही वे यानी केजरीवाल वनवास (जेल) से लौटकर आएंगे, उनकी गद्दी उनको सौंप देंगी। केजरीवाल के जमानत पर आने के बाद उनको लगा भी कि उनके त्याग, समर्पण और तपस्या को दिल्ली की जनता ने देखा है तो सहानुभूति का लाभ उनको शर्तिया मिलेगा, लेकिन ख्याली पुलाव आखिर कब तक पकाए जा सकते हैं? भक्ति का प्रतिफल कालकाजी विधानसभा क्षेत्र के मतदाताओं ने तो दे दिया, पर आप पार्टी के साथ जुड़ाव का फल उन्हें नहीं मिल सका। बड़े नेताओं ही हार के बाद आप ने सत्ता और ताकत दोनों तो गंवाई ही, इज्जत भी उतर गई। आतिशी मैडम ने भी केजरीवाल के बाद सबसे ज्यादा जीत के लिए प्रपंच किए। राजनीति के हर दांव-पेंच को उन्होंने खेला, पर उन्हें न तो माया मिल पाई और न ही राम। उल्टे काम तमाम और हो गया।
खुद तो डूबे ही, बाकियों को भी ले डूबे
दिल्ली विधानसभा चुनाव ने सियासत के इतने रंग दिखाए कि गिरगिट भी शरमा जाए। चुनाव से दो-तीन साल पहले पार्टी के नम्बर-1, नम्बर-2, नम्बर-3 श्रेणी के बड़े और दिग्गज नेता जेल चले गए। शराब नीति को लेकर लगे घोटाले के आरोप कोई भी नेता अपने दामन से छुड़ा नहीं पाए। सबसे पहले भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में फंसकर पार्टी के शीर्ष नेता सत्येन्द्र जैन जेल गए। इसके बाद शराब घोटाले ने उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और राज्यसभा सांसद संजय सिंह को भी सलाखों के पीछे पहुंचा दिया। जवाब में पार्टी ने अपनी स्टाइल की राजनीति कर सडक़ों पर तो खूब हो-हल्ला मचाया, पर कानूनी दांव-पेंच के अलावा अपने बचाव में कोई तगड़ा तर्क नहीं दे पाई जो जनता कि समझ में आए। इसका खमियाजा आप को चुनाव में तगड़ी हार के रूप में झेलना पड़ा। पार्टी के धाकड़ नेता एक-एक करके खुद को बचाने के बजाय एक दूसरे को खींच कर जेल तक ले गए। सियासत के समंदर में फंसी आप पार्टी की नाव में इतने छेद हो गए कि एक दूजे को बचाने वाले अपनों को डुबोने में लग गए। अंतत: सारे हाथ-पांव मारने के बावजूद आप के सारे सिपहसालार तैर नहीं पाए और नैया को भी ले डूबे।
भ्रष्टाचार का राक्षस लील गया बड़े-बड़े दिग्गजों को
आम आदमी पार्टी को चुनाव में सबसे ज्यादा नुकसान किसी ने पहुंचाया तो वह रहे भ्रष्टाचार के कई गंभीर आरोप। दिल्ली में सरकार बनने के बाद से पार्टी के लोगों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे। शराब घोटाले के अलावा दिल्ली जल बोर्ड के घोटालों ने भी पीछा नहीं छोड़ा। इस प्रकरण में ठेकेदारों से पैसे वसूलने के लिए ठेकों को कम राशि में छोडऩे की अनियमितताएं सामने आईं। मामला ईडी तक पहुंचा और आज भी इस पर जांच जारी है। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल खुद इस मामले के आरोपियों की सूची में शामिल हुए। सरकार चलाने के दौरान आप पार्टी के जिन नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे, वे ही पार्टी की रीढ़ माने जाते थे। ऐसे में जिस भ्रष्टाचार मुक्त शासन सोच के साथ पार्टी की स्थापना की गई थी, वहीं संगीन सवालों के घेरे में उलझ गई। विपक्षी दलों भाजपा, कांग्रेस और अन्य को आप ने ही मुद्दे सौंप दिए। आखिर में भ्रष्टाचार का राक्षस ही पूरी पार्टी को निगल गया और दिल्ली के साथ देश का भरोसा भी आप से छिटक गया। जो पार्टी देश में क्रांतिकारी बदलाव लाने की सोच के साथ बनी, वहीं भ्रष्टाचार की जड़ों से खुद को सींचती गईं। अंत में भस्मासुर बनी और खुद के अस्तित्व को मिटा दिया।
भाजपा के साथ मोदी-शाह के लिए यह होली होगी सबसे खास
साल 2014 से देशभर के चुनावों में जीत का डंका बजाने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के मन में सबसे बड़ी कसक किसी चुनाव में जीत को लेकर थी तो वह थे दिल्ली के विधानसभा चुनाव। केन्द्र की सत्ता पर लगातार तीन बार काबिज होने के बावजूद दिल्ली नहीं जीत पाने की चाह अधूरी रही। भाजपा के साथ मोदी और शाह को देश में सबसे ज्यादा चुनौती देने का काम किसी पार्टी और नेता ने किया था तो वे थे केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी। उन्होंने भाजपा और कांग्रेस दोनों को देश की सत्ता के सबसे शक्तिशाली केन्द्र से दूर रखा। तमाम प्रयासों के बावजूद मोदी और शाह की जोड़ी केजरीवाल से पार नहीं पा सकी। लेकिन सत्ता और पॉवर को हासिल करने की लालसा और मोह से आप आदमी पाटी्र भी नहीं बच पाई और भ्रष्टाचार की विषबेल में उलझ गई। पार्टी विद डिफरेंस का चोला ओढक़र बेईमानी के मार्ग पर चलने नहीं बल्कि दौडऩे से खुद को रोक नहीं पाई। इसी कमी का फायदा भाजपा ने इस चुनाव में उठाया और 27 साल के सूखे को खत्म कर दिल्ली के दोनों सिंहासन पर कमल का परचम लहराया। ऐसे में यह होली मोदी और शाह के लिए सबसे यादगार होगी। उन्होंने अपने सियासी रंगों के गुबार में आप, कांग्रेस और बाकी के राजनीतिक दलों को इस कदर डुबाया कि कोई कमल और केसरिया रंगों को खिलने से रोक नहीं पाया। मोदी और शाह की जोड़ी ने सियासत के मूल सिद्धांतों को अपनाते हुए लंबा इंतजार किया और अंत: में जीत का स्वाद चखा। क्योंकि सियासत का उसूल है जो जितना ठंडा करके खाएगा, उसे उतना ही जायका खाने में आएगा।
दिल्लीवालों की पौबारह, डबल इंजन को सौंपा जिम्मा
इस चुनाव में भले राजनीति के कई रंग देखने को मिले। लेकिन जीत का सबसे बड़ा दांव दिल्ली की जनता ने ही चला। उन्होंने 12 साल तक मोदी और शाह की परीक्षा ली। राजनीति केा वनवास पर लंबे समय तक भेजे रखा। आखिर डबल इंजन की गति उनको भा गई और दिल्ली की गाड़ी भाजपा को सौंप दी। इस उम्मीद में कि जिन हाथों ने उन्हें संभालने और लालन-पालन का विश्वास दिया था, उन्होंने ही दोनों हाथों से छलने का काम ही किया। इन हालात में आने वाले 5 सालों तक दिल्लीवाले खुद को काफी सुरक्षित महसूस करेंगे क्योंकि उनके दोनों हाथों में लड्डू हैं और इस आने वाले होली के पांच पर्व को वे और भी रंगीन और यादगार बनाने की उम्मीद सरकार से करेंगे।






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