होली के हुड़दंग में
होली के हुड़दंग में यह दुनिया धमाल लगती है और रंगों में खिली खिली पड़ोसन कमाल लगती...

श्रवण शून्य, खेजड़ला
होली के हुड़दंग में
यह दुनिया धमाल लगती है
और रंगों में खिली खिली
पड़ोसन कमाल लगती है
कइयों ने पिचकारी में
सुबह से रंग डाल रखा है
अपनी पड़ोसन को रंगने का
सपना पाल रखा है
लेकिन यह काम बहुत भारी है
इसलिए हमारी कविता
जनहित में जारी है
अपने जान माल पर
जरा मेहरबानी रखना
पड़ोसन पर रंग डालने में
जरा होशियारी रखना
वरना बीवी के साथ
नया बवाल हो सकता है
और बिना रंग के भी
आपका गाल लाल हो सकता है |
2.
गुरुजी विचार बांट रहे थे
अपनी संस्कृति की रक्षा में
कि बिन होली के भी रंगा बालक
नजर आया कक्षा में
गुरु जी बोले बेमौसम बरसात का
यह कैसा उदाहरण है
बिना होली के भी रंग कर
आने का क्या कारण है
बच्चा मुस्कुरा कर बोला
आपने ही कहा था हर पल को
मस्ती बनाकर पिया करो
और हर संडे को हॉलीडे
मना कर जिया करो
हम आपकी आज्ञा को ही झेल रहे हैं
और हर हॉलीडे को होली खेल रहे हैं
3.
कई दिनों तक लेखनी रोई
पोथी रही उदास
कई दिनों तक तोड़ ना पाया
भावों का वनवास
कई दिनों तक कर ना पाया
मन से मन की बात
कई दिनों तक कविता के भी
बंधे रहे दो हाथ
महक उठे हैं मन के आखर
कई दिनों के बाद
छंद खिले कागज के ऊपर
कई दिनों के बाद
हृदय फिर से हरा हुआ है
कई दिनों के बाद
शून्य ने भी शून्य भरा है
कई दिनों के बाद ||
4.
अच्छा है पर कभी कभी
अपने दिल का हाल बताना अच्छा है पर कभी-कभी,
मेरी गजल पर यूं मुस्काना अच्छा है पर कभी कभी,
साठ कचोरी बावन लड्डू सेर पूरी संग गटकाते,
पंडित जी को भोज खिलाना अच्छा है पर कभी कभी |
क्या अचंभा जो हो जाये लाठी भाटा जंग वहां,
नेता जी की सभा में जाना अच्छा है पर कभी कभी |
क्या पता वो जानबूझ कर हार गले में बंधवाले,
क्रिकेट में सट्टा लगवाना अच्छा है पर कभी कभी |
एक दिन तुमसे टाटा करके ये तो जाने वाली है,
अपनी जवानी पर इतराना अच्छा है पर कभी कभी |
राई का पर्वत होने में देर जरा सी लगती है,
पाड़ोसन को मिस कॉल देना अच्छा है पर कभी कभी |
हम तो अपनी मेहनत से ही भाग्य बदलने वाले है,
अच्छे दिनों के ख्वाब दिखाना अच्छा है पर कभी कभी |
सुनो सुनो का शोर मचाकर ये बहरे कर देते है,
इन कवियों का मंच सजाना अच्छा है पर कभी कभी |






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