भारत की ओर झुकती दुनिया
बदलती वैश्विक व्यवस्था, अमेरिकी अनिश्चितता और संरक्षणवादी रुझानों के बीच भारत एक भरोसेमंद और संतुलित विकल्प के रूप में उभर रहा है। भारत–यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता इसी भरोसे का प्रतीक है। डिजिटल...

अपनी बात
देखिए, आप अकेले नहीं सोच रहे। मेरे मन में भी वही सवाल है जो शायद आपके मन में है—क्या वाकई यह भारत का “क्षण” है, या हम फिर किसी बड़े मौके को लेकर ज़रूरत से ज़्यादा उत्साहित हो रहे हैं ? लेकिन इसी सवाल के साथ एक दूसरा, उतना ही ज़रूरी सवाल भी उठता है—अगर यह मौका नहीं है, तो फिर कौन-सा होगा ?
आज की दुनिया को अगर एक शब्द में समझना हो, तो वह शब्द है—अनिश्चितता। व्यापार अनिश्चित है, राजनीति अनिश्चित है, गठबंधन अनिश्चित हैं। अमेरिका, जो कभी वैश्विक व्यवस्था का स्थायी स्तंभ माना जाता था, आज खुद अपने फैसलों से दुनिया को असहज कर रहा है। टैरिफ की धमकियां, संरक्षणवादी सोच और नेतृत्व की अस्थिरता ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को सोचने पर मजबूर कर दिया है—क्या अब किसी एक ताक़त पर निर्भर रहना समझदारी है ?
यहीं से “डी-रिस्किंग” और “डाइवर्सिफिकेशन” सिर्फ़ शब्द नहीं रह जाते, बल्कि नीति बन जाते हैं। और इसी नीति के केंद्र में भारत धीरे-धीरे नहीं, बल्कि स्पष्ट रूप से उभरता है।
भारत–यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते को “मदर ऑफ ऑल डील्स” कहा जाना यूं ही नहीं है। 27 देशों का एक साथ भारत से इतने व्यापक दायरे में समझौता करना इस बात का संकेत है कि यूरोप भारत को अब हाशिए का खिलाड़ी नहीं मानता।
पूरा अंक देखें-
👇🏻
https://rajasthantoday.online/wp-content/uploads/2026/02/RT_FEBRUARY-2026_EDITION.pdf
यह भरोसा यूं ही नहीं बनता। यह भरोसा पिछले एक दशक में भारत की बदली हुई छवि से पैदा हुआ है—एक ऐसा देश जो लोकतांत्रिक भी है, बाज़ार-उन्मुख भी है और रणनीतिक रूप से संतुलित भी।
यहां अक्सर हम आलोचना करते हैं—और करना भी चाहिए—लेकिन ज़रा ईमानदारी से यह भी देखें कि भारत ने क्या बदला है। डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, यूपीआई जैसी प्रणालियां, तेज़ी से बढ़ता स्टार्टअप इकोसिस्टम, और वैश्विक मंचों पर स्पष्ट और आत्मविश्वासी कूटनीति—ये सब भारत को पहले से अलग बनाते हैं।
यूरोप, कनाडा या ब्राज़ील भारत की ओर इसलिए नहीं देख रहे कि उनके पास कोई और विकल्प नहीं है, बल्कि इसलिए देख रहे हैं क्योंकि भारत अब एक विश्वसनीय विकल्प बन चुका है। कनाडा के प्रधानमंत्री की प्रस्तावित यात्रा और ब्राज़ील के राष्ट्रपति का प्रस्तावित उद्योग-संवाद इसी भरोसे का विस्तार है। यह स्वीकारोक्ति है कि भारत के निजी क्षेत्र के बिना अब वैश्विक व्यापार की रणनीति अधूरी है। यह वही भारत है, जिसे कभी “लाइसेंस-परमिट राज” के उदाहरण के तौर पर देखा जाता था।
अब सवाल उठता है—क्या यह सब सिर्फ़ बड़े कॉरपोरेट्स तक सीमित रहेगा ? यह चिंता जायज़ है, और इसे नज़रअंदाज़ करना खतरनाक होगा। लेकिन यहां एक सकारात्मक संभावना भी है, जिसे हम अक्सर देखने से चूक जाते हैं। वैश्विक सप्लाई चेन का भारत की ओर आना केवल बड़े उद्योगों का खेल नहीं है। इसके साथ लॉजिस्टिक्स, वेयरहाउसिंग, पैकेजिंग, टेक्निकल सर्विसेज़ और स्किल्ड मैनपावर की मांग बढ़ेगी। अगर नीतियां सही रहीं, तो इसका सीधा असर रोज़गार पर पड़ेगा—खासकर अर्ध-शहरी और ग्रामीण भारत में।
यूरोप के साथ समझौते में पर्यावरण और श्रम मानकों की शर्तें भी हैं। पहली नज़र में यह बोझ लग सकता है, लेकिन दीर्घकाल में यही शर्तें भारतीय उद्योग को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाएंगी। हरित तकनीक, स्वच्छ ऊर्जा और टिकाऊ उत्पादन अब “विकल्प” नहीं, अनिवार्यता बनते जा रहे हैं। भारत अगर इस बदलाव को जल्दी अपनाता है, तो वह पिछड़ने के बजाय नेतृत्व कर सकता है।
यह भी सच है कि भारत के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं—नियामक जटिलताएं, न्यायिक देरी, और नीति-क्रियान्वयन की कमजोरियां। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि भारत आज उन चुनौतियों को पहचानता है। शायद पहली बार, नीति और सार्वजनिक बहस में यह स्वीकार किया जा रहा है कि केवल बड़े समझौते काफी नहीं हैं; ज़मीन पर सुधार उतने ही ज़रूरी हैं।
यहां सकारात्मक दृष्टि इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि दुनिया भारत से किसी परिपूर्ण व्यवस्था की उम्मीद नहीं कर रही। वह एक ऐसे साझेदार की तलाश में है, जो सीखने को तैयार हो, स्थिर हो और दीर्घकालिक सोच रखता हो। और इस कसौटी पर भारत कई देशों से आगे दिखता है।
एक और बात, जो अक्सर अनदेखी रह जाती है—भारत की रणनीतिक स्वायत्तता। भारत न तो किसी एक ध्रुव का अनुयायी है, न किसी वैचारिक खेमे में बंद। यही संतुलन उसे यूरोप, अमेरिका, लैटिन अमेरिका और एशिया—सभी के लिए स्वीकार्य बनाता है। यह संतुलन कोई संयोग नहीं, बल्कि कूटनीतिक सोच का नतीजा है।
तो हां, कुछ आशंकाएं भी हैं। यह भी संभव है कि कुछ लाभ सीमित हाथों में सिमट जाएं। यह भी संभव है कि सुधारों की गति उम्मीद से धीमी रहे। लेकिन इतिहास केवल आशंकाओं से नहीं बनता। इतिहास उन क्षणों से बनता है, जब देश अपनी क्षमताओं पर भरोसा करते हुए जोखिम उठाते हैं।
आज भारत उसी मोड़ पर खड़ा है। दुनिया की निगाहें उस पर हैं—संदेह के साथ भी, उम्मीद के साथ भी। और शायद यही सबसे बड़ा सकारात्मक संकेत है। उदासीन दुनिया सबसे खतरनाक होती है; उम्मीद रखने वाली दुनिया आपको अवसर देती है।
अंत में, बस इतना ही कि —यह समय सिर्फ़ आत्मालोचना का नहीं, आत्मविश्वास का भी है। अगर हम केवल कमियां गिनेंगे, तो अवसर हाथ से निकल जाएगा। और अगर केवल उत्सव मनाएंगे, तो वही कमियां हमें ले डूबेंगी।
संतुलन ही शायद इस दौर का सबसे बड़ा सबक है।






No Comment! Be the first one.