राजनीति धोखा बनाम लोकतांत्रिक निष्ठा
उपराष्ट्रपति पद पर बैठा एक संवैधानिक चेहरा जब सत्ता पक्ष की रणनीति को दरकिनार कर विपक्ष के प्रस्तावों को स्वीकार करता है, तो सवाल उठते हैं— क्या यह लोकतांत्रिक निष्ठा का परिचायक था या राजनीतिक भरोसे...

अपनी बात
दिनेश रामावत,
प्रधान सम्पादक
भारतीय लोकतंत्र में उपराष्ट्रपति का पद गरिमा और मर्यादा का प्रतीक है। वह राज्यसभा का सभापति होता है— उच्च सदन की कार्यवाही का संचालन करने वाला, और संवैधानिक संतुलन का रक्षक। पर जब यही व्यक्ति अचानक सत्ता पक्ष की रणनीति को तोड़कर विपक्ष की पहल को वैधता देने लगे, तब यह मात्र संवैधानिक विवेक नहीं रह जाता, बल्कि एक राजनीतिक संकेत बन जाता है।
पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के हालिया इस्तीफे से ठीक पहले जो घटनाएं सामने आईं, उन्होंने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को न केवल स्तब्ध किया, बल्कि यह अहसास भी करा दिया कि निष्ठा और वैचारिक गहराई की अनदेखी कभी- कभी बहुत महंगी पड़ सकती है।
केंद्र सरकार की योजना थी कि लोकसभा के माध्यम से जस्टिस वर्मा को हटाने की प्रक्रिया शुरू की जाए। इसके पीछे मंशा यह थी कि सरकार न्यायपालिका में पारदर्शिता और जवाबदेही का संदेश दे सके। लेकिन इस पूरी रणनीति को उस समय गहरा धक्का लगा, जब राज्यसभा में विपक्ष ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश किया, और धनखड़ साहब ने उसे बिना सत्ता पक्ष को सूचित किए स्वीकार कर लिया। इस प्रस्ताव पर विपक्ष के 63 सांसदों के हस्ताक्षर थे। इसे स्वीकार कर उपराष्ट्रपति ने विपक्ष को संसद की प्रक्रिया में वैध भागीदार बना दिया, जबकि केंद्र सरकार इस पूरी प्रक्रिया को लोकसभा से नियंत्रित करना चाहती थी। यह कदम भाजपा के लिए रणनीतिक असहजता का कारण बन गया।
यह सिर्फ जस्टिस वर्मा तक सीमित नहीं था। विपक्ष प्रयागराज हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस शेखर यादव को हटाने का प्रस्ताव भी ला रहा था, जिन्होंने विहिप के एक कार्यक्रम में मंच से कहा था, “यह देश कठमुल्लों से नहीं चलेगा।” यह वक्तव्य संघ की विचारधारा के अनुरूप था और पार्टी उन्हें संरक्षण देना चाहती थी। लेकिन चौंकाने वाली बात यह थी कि धनखड़ साहब इस प्रस्ताव को भी स्वीकारने को तैयार थे, और केंद्र सरकार को इसकी भनक तक नहीं थी। यह स्थिति भाजपा और संघ के लिए अत्यंत अपमानजनक बन सकती थी- विपक्ष, भाजपा के बनाए उपराष्ट्रपति के सहयोग से, एक ‘हिंदुत्व समर्थक’ न्यायाधीश को हटा देता!
धनखड़ साहब के व्यवहार से विपक्ष को लगा कि अब राज्यसभा में सभापति उनके ‘पक्ष’ में हैं। यही कारण था कि विपक्ष ने उच्च सदन में पहले से कहीं ज़्यादा आक्रामक रुख अपनाया। राज्यसभा में केंद्र की योजनाएं लगातार ठप होती दिखीं, और सत्ता पक्ष इस गतिरोध का समाधान नहीं निकाल पा रहा था।
सत्ता पक्ष को जैसे ही यह आभास हुआ कि उपराष्ट्रपति अब राजनीतिक रूप से ‘स्वतंत्र’ सोचने लगे हैं, तो राजनाथ सिंह के कार्यालय से एनडीए के सांसदों को बुलाया गया और उनसे कोरे कागज पर हस्ताक्षर लिए गए। यह अपूर्व कदम था— अपने ही उपराष्ट्रपति के खिलाफ अविस्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी।
धनखड़ साहब को रात 8 बजे के बाद स्पष्ट रूप से संदेश दिया गया— “अब फैसला आपका है।” और उन्होंने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देकर इस्तीफा दे दिया।
जब वेंकैया नायडू, हामिद अंसारी, या गुलाम नबी आज़ाद जैसे नेताओं ने पद छोड़ा, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भावनात्मक भाषण दिए थे। लेकिन धनखड़ साहब के इस्तीफे पर पीएम मोदी ने केवल एक औपचारिक ट्वीट किया :
“उन्हें अनेक जिम्मेदारियों में सेवा का अवसर मिला है, वे शीघ्र स्वस्थ हों।”
न सम्मान, न श्रद्धा, न आभार। भाजपा के किसी वरिष्ठ नेता ने भी कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी। यह मौन अपने आप में एक तीखा राजनीतिक वक्तव्य था कि पार्टी ने राहत की सांस ली है।
विडंबना देखिए, जो विपक्ष कल तक धनखड़ को “लोकतंत्र का भक्षक”, “संघी कठपुतली” जैसे विशेषण दे रहा था, वही आज उन्हें “संविधान का प्रहरी”, “न्यायिक स्वतंत्रता का रक्षक” कहकर सराह रहा है।
यही राजनीति की शाश्वत वास्तविकता है— विरोध केवल सुविधा तक सीमित होता है, और प्रशंसा भी अवसर पर टिकी होती है।
भाजपा के लिए सबक : जगदीप धनखड़ भाजपा की परम्परागत नर्सरी— आरएसएस से निकले नेता नहीं थे। वे एक दक्ष अधिवक्ता, क्षेत्रीय नेता और पूर्व राज्यपाल जरूर रहे, लेकिन उनकी वैचारिक जड़ें भाजपा की नहीं थीं। भाजपा ने बीते वर्षों में जिन नेताओं को अन्य दलों से आयात किया है, उनमें से अधिकतर या तो निष्क्रिय निकले हैं या अवसरवादी।
धनखड़ साहब का इस्तीफ़ा केवल एक व्यक्ति का त्याग नहीं था— यह भाजपा की वैचारिक रणनीति की एक कमीज़ोर कड़ी का टूटना था। वह कड़ी, जिसे सत्ता ने सुदृढ़ समझा, वही विश्वासघात की सबसे कमज़ोर नस बन गई।
भाजपा को अब यह गहराई से समझना होगा कि सांस्थानिक पदों पर निष्ठावान और वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध नेता ही संकट की घड़ी में पार्टी की रीढ़ बनते हैं— आयातित नेता नहीं।
क्योंकि राजनीति भले ही बदलती रहती हो,
पर निष्ठा, नेतृत्व की स्थायी पूंजी होती है।





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