तानजियान की मुस्कान
शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की तानजियान बैठक ऐसे समय आयोजित हुई जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दुनिया भर पर टैरिफ़ का हंटर चला रहे थे और भारत को रूस से तेल खरीदने पर दंडात्मक शुल्क की धमकी दे...

शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक
दिनेश रामावत,
प्रधान सम्पादक
शंघाई सहयोग संगठन की बैठक 31 अगस्त और 1 सितंबर को चीन के तानजियान शहर में ऐसे समय आयोजित हुई, जब वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था उथल–पुथल से गुजर रही थी। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक ओर चीन के खिलाफ व्यापारिक युद्ध छेड़े हुए हैं तो दूसरी ओर रूस से सस्ता तेल खरीदने पर भारत को भी दंडात्मक शुल्क के दबाव में ला रहे हैं। परंतु इस बैठक से जो तस्वीरें दुनिया के सामने आईं, उससे ट्रंप की रणनीति की चमक फीकी हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन एक साथ खड़े होकर मुस्कुरा रहे थे, सहज बातचीत कर रहे थे और आत्मविश्वास से भरे दिख रहे थे। ये दृश्य महज़ औपचारिकता नहीं थे, बल्कि शक्ति संतुलन के बदलते परिदृश्य का सजीव प्रमाण थे।
एससीओ की स्थापना दो दशक पहले क्षेत्रीय सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी सहयोग के लिए की गई थी, पर समय के साथ यह मंच सामूहिक एशियाई शक्ति के प्रतीक के रूप में उभरा है। इस बार की बैठक का महत्व इसलिए और बढ़ गया, क्योंकि यह ऐसे समय हुई जब दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका अपने टैरिफ़ हथियार से चीन और भारत दोनों को झुकाने की कोशिश कर रही थी। लेकिन तानजियान की मुस्कान इस बात का ऐलान कर रही थीं कि एशियाई देश अमेरिकी दबाव के आगे झुकने वाले नहीं हैं। ट्रंप की रणनीति स्पष्ट है। वह टैरिफ़ लगाकर न केवल चीन की औद्योगिक ताक़त को चोट पहुंचाना चाहते हैं, बल्कि भारत को भी रूस से ऊर्जा खरीदने पर सज़ा देने के बहाने अमेरिका–पश्चिमी खेमे का अनुयायी बनाना चाहते हैं। उनका सोचना है कि आर्थिक दबाव किसी भी देश को नीतिगत बदलाव करने पर मजबूर कर सकता है। पर भारत ने तानजियान में यह दिखा दिया कि उसकी विदेश नीति अब डर और दबाव से नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और संतुलन से तय होगी। मोदी का जिस सहजता से पुतिन और जिनपिंग के साथ संवाद हुआ, उससे यह संदेश निकला कि भारत न केवल अमेरिका का विकल्प खोज सकता है बल्कि रूस और चीन जैसे देशों के साथ भी बराबरी के स्तर पर खड़ा हो सकता है।
मीडिया ने इस मुलाकात को कई बार केवल ‘फोटो अवसर’ कहकर नज़रअंदाज़ करने की कोशिश की, लेकिन हकीकत यह है कि मुस्कान और आत्मीयता भी कूटनीति का हिस्सा होती है। मोदी, पुतिन और जिनपिंग की साझा तस्वीरें एक ही समय पर कई संकेत दे रही थीं। यह संदेश था कि एशियाई देश चाहें तो अमेरिका की दंडात्मक नीतियों का मिलकर सामना कर सकते हैं। यह चुनौती थी ट्रंप की उस नीति को, जो हर देश को अलग–थलग कर अपने हित में मोड़ना चाहती है। और यह संकेत भी था कि भविष्य में एक नया शक्ति त्रिकोण बन सकता है, जिसमें भारत, चीन और रूस अमेरिका के वर्चस्व को सीधी चुनौती देंगे। भारत की भूमिका इस पूरे परिदृश्य में सबसे अहम है। चीन और भारत के बीच सीमा विवाद अब भी है, रूस और अमेरिका के बीच शीतयुद्ध जैसी तनातनी जारी है, लेकिन भारत ने इन सबके बीच संतुलन साधने की क्षमता दिखाई है। भारत नाटो का हिस्सा नहीं है, पर पश्चिम से संवाद बनाए रखता है। रूस से तेल और हथियार खरीदता है, लेकिन अमेरिका से भी तकनीक और निवेश लेता है। चीन से प्रतिस्पर्धा भी करता है, पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सहयोग का रास्ता भी खुला रखता है। यही संतुलन भारत को नई शक्ति राजनीति का केंद्र बना देता है।
रूस और चीन का मोदी के साथ सहज व्यवहार भी केवल मित्रता का भाव नहीं था, बल्कि एक रणनीतिक अनिवार्यता थी। रूस जानता है कि भारत उसका सबसे बड़ा हथियार और ऊर्जा बाज़ार है, और पुतिन भारत को खोकर चीन पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहते। चीन जानता है कि एशिया में अमेरिकी ‘इंडो–पैसिफिक’ रणनीति का संतुलन भारत के बिना संभव नहीं है। इसलिए तानजियान की मित्रता का दृश्य सोची–समझी रणनीति था, जिसने यह संदेश दिया कि तीनों देश साझा हितों पर खड़े हो सकते हैं। दिलचस्प यह भी है कि सम्मेलन से ठीक पहले यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने मोदी को फोन किया। यह कदम इस बात का प्रमाण है कि अब यूक्रेन जैसे युद्धग्रस्त देश को भी लगने लगा है कि रूस को अगर कोई समझा सकता है तो वह भारत है। अमेरिका की सारी कोशिशों और यूरोप की कूटनीति के बावजूद रूस यूक्रेन पर हमले जारी रखे हुए है। जेलेंस्की को विश्वास है कि पुतिन अमेरिका की बात नहीं मानेंगे, लेकिन भारत के प्रधानमंत्री मोदी की अपील शायद वे सुनें। यह विश्वास भारत की कूटनीतिक सफलता है और इस तथ्य को पुष्ट करता है कि भारत अब केवल एशियाई नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का सक्रिय खिलाड़ी बन चुका है।
अमेरिका के लिए यह स्थिति असहज है। ट्रंप को उम्मीद थी कि 50 प्रतिशत टैरिफ़ की धमकी देकर भारत को डराया जा सकता है, लेकिन भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद नहीं किया। उलटे चीन और रूस के साथ मंच साझा कर यह दिखा दिया कि वह दबाव में झुकने वाला नहीं है। अमेरिका की बेचैनी की वजह यह भी है कि भारत अब न केवल सबसे बड़ा बाज़ार है, बल्कि एक ऐसा देश भी है जिसकी ऊर्जा ज़रूरतें उसकी नीति को आकार देती हैं। भारत अगर रूस से तेल खरीदता रहा, तो अमेरिका की ‘रूस को अलग–थलग करो’ रणनीति अधूरी रह जाएगी। तानजियान की बैठक ने साफ कर दिया कि दुनिया अब एकध्रुवीय नहीं रही। शीत युद्ध के बाद अमेरिका अकेला महाशक्ति बनकर उभरा था, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। रूस और चीन पहले ही अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती दे रहे हैं और अब भारत का इस त्रिकोण में जुड़ना अमेरिकी नीति निर्माताओं के लिए सिरदर्द है। यह दुनिया को बहुध्रुवीयता की ओर ले जाने वाला संकेत है, जिसमें केवल अमेरिका या यूरोप ही नहीं, बल्कि एशिया भी निर्णायक भूमिका निभाएगा।
हालांकि इस नई धुरी के भीतर कई अंतर्विरोध भी हैं। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद आज भी तनाव का कारण है। रूस और चीन की निकटता कहीं भारत की स्वतंत्र विदेश नीति पर दबाव न बना दे, इसका खतरा बना रहता है। अमेरिका और पश्चिम से तकनीक व निवेश की निर्भरता भारत को पूरी तरह स्वतंत्र नहीं होने देती। परंतु इन जटिलताओं के बावजूद तानजियान का संदेश यही है कि भारत अब मूक दर्शक नहीं बल्कि सक्रिय निर्णायक बन चुका है।
आख़िरकार इस पूरी बैठक का सबसे बड़ा प्रतीक वही साझा मुस्कान थी, जिसे दुनिया ने देखा। यह मुस्कान दरअसल एशियाई आत्मविश्वास का प्रतीक थी। यह संदेश था कि अमेरिका की धमकियों और टैरिफ़ युद्ध के बीच भी एशिया अपने पैरों पर खड़ा हो सकता है। भारत ने दिखा दिया कि वह दबाव से नहीं, अपनी ताक़त और संतुलन से नीतियां तय करेगा। पुतिन और जिनपिंग ने यह दिखा दिया कि वे भारत को साथ लेकर ही एशिया की राजनीति आगे बढ़ाना चाहते हैं। और जेलेंस्की का फोन इस बात की पुष्टि है कि अब भारत युद्ध और शांति दोनों का निर्णायक मध्यस्थ बन सकता है। तानजियान से जो तस्वीर उभरी है वह भविष्य की राजनीति का नक्शा है। अमेरिका अब अकेला निर्णायक नहीं, बल्कि कई ध्रुवों में से एक है। रूस और चीन अपनी जगह मज़बूत हैं। भारत उभरता हुआ निर्णायक है। और इन तीनों का त्रिकोण मिलकर एक ऐसी शक्ति संरचना गढ़ सकता है जो ट्रंप के टैरिफ़ वार को केवल चुनौती ही नहीं देगी, बल्कि बहुध्रुवीय दुनिया की नींव भी रखेगी। यही तानजियान की असली उपलब्धि है और यही आने वाले समय का सबसे बड़ा संदेश भी।






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