‘कागज़ों’ में फंसा आम भारतीय
भारत में नागरिकता का कोई एक अंतिम प्रमाण नहीं होने से आम नागरिक लगातार कागज़ों की उलझन में फंसा है। आधार नागरिकता साबित नहीं करता, एनआरसी मौजूद नहीं है, और सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला दस्तावेज़ों...

दिनेश रामावत,
प्रधान सम्पादक
भारत में नागरिकता का सवाल दुनिया के किसी भी लोकतंत्र से कहीं ज़्यादा भावनात्मक, सामाजिक और राजनीतिक है। कारण भी बेहद साफ हैं, यह देश कागज़ों के सहारे नहीं, रिश्तों, यादों और मिट्टी की महक पर चलता आया है। करोड़ों लोग अपनी पहचान जन्म प्रमाण-पत्रों से नहीं, बल्कि अपनी बोली, अपने गांव और अपने परिवार के इतिहास से पाते रहे हैं। लेकिन अब नागरिकता और पहचान का जो कागज़ी बोझ आम आदमी पर लाद दिया गया है, उसने लोगों को असुरक्षा, डर और संदेह के दायरे में धकेल दिया है।
समस्या की जड़ यह है कि भारत में नागरिकता का कोई एक अंतिम और सार्वभौमिक दस्तावेज़ है ही नहीं। आधार है, पर वह नागरिकता का प्रमाण नहीं। वोटर आईडी है, लेकिन वह भी पूरी तरह अंतिम नहीं। पासपोर्ट है, पर सबके पास नहीं और यह भी नागरिकता का शत-प्रतिशत प्रमाण नहीं माना जाता। और एनआरसी, जिसकी सबसे ज़्यादा जरूरत थी, वह अब तक देश में लागू ही नहीं हो पाया है।
यहां सबसे गंभीर बात यह है कि गांव के किसान, शहर के मज़दूर, दिहाड़ी पर काम करने वाली महिलाओं, और उम्रदराज़ बुजुर्गों के पास उतने ही कागज़ होते हैं जितने जिंदगी ने उन्हें दिए हैं। किसी ने स्कूल नहीं देखा, तो वह स्कूल प्रमाणपत्र कहां से लाए? किसी का जन्म घर पर हुआ, वह भी 40–50 साल पहले, तो उस समय जन्म प्रमाण-पत्र किसने बनवाया होगा? किसी ने पुरानी बाढ़ में कागज़ खो दिए, किसी ने आग में। बहुत से लोग रोज़गार की तलाश में गांव-शहर बदलते रहे, पता और पहचान बदलती रही। तो क्या यह सब लोग नागरिक नहीं? क्या कागज़ कम होने भर से ये लोग संदिग्ध हो जाते हैं? यही सवाल इस पूरे विमर्श को सबसे अधिक संवेदनशील बनाता है।
आधार ने इस उलझन को और बढ़ाया है। यह देश का सबसे व्यापक पहचान दस्तावेज़ है और गरीब, अमीर, वृद्ध, बच्चे लगभग सभी के पास है। आधार रोज़मर्रा की हर सुविधा में आवश्यक है: गैस सब्सिडी, बैंक खाता, पेंशन, राशन, अस्पताल, स्कूल सब आधार से जुड़े हुए हैं। ऐसे में आम आदमी के मन में यह विश्वास बन गया कि “आधार है, तो मैं इस देश का पक्का नागरिक हूं।” लेकिन कठोर सच्चाई यह है कि आधार सिर्फ पहचान है, नागरिकता नहीं। सुप्रीम कोर्ट कई बार यह साफ कर चुका है। और यही बात आम आदमी को सबसे ज़्यादा असहज करती है, जब आधार ही एकमात्र दस्तावेज़ हो और वह नागरिकता साबित भी न करे, तो फिर विश्वास किस पर टिके?
इसी बीच सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला सामने आया, जिसने पहचान के सवाल को नई दिशा दे दी। बिहार में मतदाता सूचियों पर उठे विवादों के बाद अदालत से पूछा गया कि पहचान प्रमाण के लिए कौन-से दस्तावेज़ स्वीकार किए जाएं। चुनाव आयोग ने सात दस्तावेज़ सुझाए थे, लेकिन कोर्ट ने कहा कि यह सूची बहुत सीमित है और देश के लोगों की विविध स्थितियों को नज़रअंदाज़ करती है। कोर्ट ने दस्तावेज़ों की संख्या बढ़ाकर ग्यारह कर दी और यह साफ कर दिया कि पहचान को सिर्फ दो-तीन कागज़ों में कैद नहीं किया जा सकता। हर नागरिक की जीवन-यात्रा अलग होती है, उसके दस्तावेज़ उसकी परिस्थिति तय करती है।
सुप्रीम कोर्ट का सबसे तीखा संदेश यह था कि अगर SIR जैसी प्रक्रियाओं में कोई अनियमितता हुई, तो वह मतदाता सूची को रद्द करने से भी पीछे नहीं हटेगा। यह केवल चुनाव आयोग को नहीं, पूरे देश को चेतावनी थी कि पहचान और नागरिकता जैसे संवेदनशील विषय पर कोई खिलवाड़ स्वीकार नहीं किया जाएगा।
अब नागरिकता की मूल समस्या पर लौटें। भारत में ऐसा कोई एक दस्तावेज़ है ही नहीं जो अंतिम प्रमाण के रूप में स्वीकार्य हो। पासपोर्ट सभी के पास नहीं, कमी भी कई हैं। वोटर आईडी मजबूत है, पर उसकी विश्वसनीयता पर सवाल भी उठते रहे हैं। राशन कार्ड सामाजिक-आर्थिक स्थिति बताता है, नागरिकता नहीं। और आधार, जैसा बार-बार कहा गया, नागरिकता सिद्ध ही नहीं करता। तो फिर नागरिकता किस पर टिके? किस आधार पर एक नागरिक खुद को इस देश का अटूट हिस्सा महसूस करे?
यहां यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या भारत को एनआरसी चाहिए? जवाब है हां, लेकिन वह वाला एनआरसी नहीं जिसे सुनकर देश में डर फैल जाता है। भारत को ऐसा एनआरसी चाहिए जो किसी को डराए नहीं, किसी गरीब को “संदिग्ध” की लाइन में न खड़ा कर दे, और किसी बुजुर्ग को इस चिंता में न धकेले कि “अगर कागज़ न मिला, तो क्या मैं नागरिक नहीं माना जाऊंगा?”
एनआरसी का उद्देश्य नागरिकों को बाहर धकेलना नहीं होना चाहिए। उसका मकसद यह होना चाहिए कि देश के हर नागरिक को एक स्थायी, विश्वसनीय और सम्मानजनक पहचान मिले। एनआरसी अगर आधुनिक, तकनीक-सहयोगी, पारदर्शी और मानवीय हो, तो यह भारत की सबसे बड़ी प्रशासनिक समस्या को हल कर सकता है।
आधार इस प्रक्रिया में बड़ी भूमिका निभा सकता है, लेकिन सहायक दस्तावेज़ के रूप में, न कि नागरिकता के प्रमाण के रूप में। आधार की खासियत है कि यह व्यक्ति की पहचान को तकनीक के सहारे सुरक्षित रखता है। लेकिन यह तभी उपयोगी है जब अंतिम निर्णय किसी व्यापक और बहु-स्तरीय नागरिकता ढांचे से आए, जिसमें दस्तावेज़ों की विविधता का सम्मान हो।
भारत जैसा विशाल और विविध देश केवल कागज़ों पर नहीं चलता। यहां पहचान कानूनी शब्द नहीं, सम्मान और अपनापन है। नागरिकता वह भावना है जो यह कहती है कि “यह देश मेरा है, और मैं इस देश का हूं।” लेकिन आज स्थिति यह है कि आदमी को हर कदम पर अपनी पहचान साबित करनी पड़ती है—बिजली कनेक्शन से लेकर गैस, स्कूल, अस्पताल, पेंशन, पासपोर्ट और अंत में वोटर सूची तक। यह बोझ किसी भी लोकतंत्र की बुनियाद को कमजोर करता है।
जब तक नागरिकता का कोई एक स्पष्ट और सर्वमान्य दस्तावेज़ नहीं होगा, यह बोझ बना रहेगा। और लोग इसी कागज़ी चक्की में पीसे जाते रहेंगे। देश को अब ऐसी नागरिकता व्यवस्था चाहिए जिसमें संवेदनशीलता सबसे ऊपर हो। गरीब, प्रवासी, बुजुर्ग या मेहनतकश लोग कभी भी परफेक्ट कागज़ नहीं दिखा सकते—और उन्हें “संदिग्ध” मान लेना न केवल अन्याय है, बल्कि यह उन्हें सम्मानहीन बना देता है।
सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला हमें बता रहा है कि भारत को पहचान और नागरिकता पर नई सोच अपनानी होगी। यह सिर्फ कागज़ों का सवाल नहीं, भरोसे का सवाल है। जब नागरिक को यह भरोसा होगा कि उसकी पहचान सुरक्षित है, तभी वह लोकतांत्रिक ढांचे पर विश्वास कर सकेगा। और जब वह अपने ही देश में खुद को साबित करने की मजबूरी से मुक्त होगा, तभी नागरिकता का असली अर्थ जीवन में उतर पाएगा।
भारत को एक आधुनिक, पारदर्शी, मानवीय और तकनीक-समर्थित नागरिकता ढांचे की जरूरत है, जो आधार को सहायक माने, दस्तावेज़ों की विविधता का सम्मान करे, और हर व्यक्ति की परिस्थितियों को समझकर उसके अधिकारों को सुरक्षित करे। अगर देश यह कर पाया, तो नागरिकता का सवाल डर नहीं, भरोसे और सम्मान की बात बन जाएगा, और यही किसी भी लोकतंत्र की सबसे मजबूत बुनियाद है।






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