राहत की राह, संतुलन की चुनौती
भारतीय कर व्यवस्था के इतिहास में 22 सितम्बर 2025 एक अहम तारीख के रूप में दर्ज होगी। इसी दिन से लागू हुआ है “जीएसटी 2.0”- एक ऐसा सुधार जो कर ढांचे को न केवल सरल करता है, बल्कि उपभोक्ता को सीधी राहत...

अपनी बात
दिनेश रामावत,
प्रधान सम्पादक
भारत में दीपावली केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह देश की सबसे बड़ी आर्थिक गतिविधि का अवसर भी है। इस त्योहार के दौरान घरेलू खपत अपने चरम पर पहुंच जाती है। मिठाइयों से लेकर कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर आभूषण, गृह सजावट से लेकर वाहन खरीद तक— हर क्षेत्र में बिक्री का रिकॉर्ड बनता है। इसी परिप्रेक्ष्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 22 सितम्बर 2025 को लागू हुए “जीएसटी 2.0” को दीपावली पर जनता के लिए “बड़ा तोहफ़ा” करार दिया और इसे “जीएसटी बचत उत्सव” के रूप में मनाने की घोषणा की। इस घोषणा ने आम उपभोक्ताओं, कारोबारियों और उद्योग जगत में नई उम्मीद जगाई है। भारत में जीएसटी 2017 में लागू हुआ था। शुरूआत में पांच प्रमुख स्लैब और उपकर की जटिल व्यवस्था थी। समय के साथ यह स्पष्ट हो गया कि बहु-स्लैबी संरचना उपभोक्ता और व्यवसाय दोनों के लिए भ्रम पैदा कर रही थी। अब जाकर सरकार ने इसे दो प्रमुख स्लैबों (5 प्रतिशत और 18 प्रतिशत) में समेटा है।
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यह सरलता केवल तकनीकी बदलाव नहीं है, बल्कि कर नीति में एक वैचारिक बदलाव भी है। सरकार यह संदेश देना चाहती है कि कराधान का लक्ष्य उपभोक्ता पर बोझ डालना नहीं, बल्कि उपभोग और उत्पादन दोनों को प्रोत्साहित करना है। भारत का औसत मध्यमवर्गीय परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं पर खर्च करता है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के अनुसार, शहरी परिवार अपनी मासिक आय का लगभग 40–45 प्रतिशत हिस्सा भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा और घरेलू सामान पर खर्च करते हैं।
जब साबुन, टूथब्रश, पैकेज्ड खाद्य, दूध और डेयरी उत्पाद जैसी वस्तुओं पर कर घटेगा, तो उपभोक्ता को यह राहत सीधे अपनी जेब में महसूस होगी। इसी तरह टीवी, एयर कंडीशनर और डिशवॉशर पर दरें 28 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दी गई हैं। यह बदलाव मध्यमवर्गीय सपनों को साकार करने की दिशा में मददगार साबित होगा। यह तात्कालिक बचत केवल उपभोक्ता को ही नहीं, बल्कि पूरे घरेलू मांग तंत्र को गति देगी। जब परिवारों के पास अतिरिक्त पैसा बचेगा, तो वे अन्य सेवाओं और वस्तुओं पर खर्च बढ़ाएंगे।
सुधारों के राजस्व असर को समझने के लिए वित्त वर्ष 2024-25 के आंकड़े महत्वपूर्ण हैं। इस अवधि में भारत का कुल सकल जीएसटी संग्रह 22.08 लाख करोड़ रुपए रहा। वृद्धि दर गत वर्ष की तुलना में 9.4 प्रतिशत अधिक है। पूरे वर्ष का औसत मासिक संग्रह 1.84 लाख करोड़ रुपए रहा, जो वर्ष 21 के मात्र 95,000 करोड़ रुपए मासिक औसत से लगभग दोगुना है। वर्ष 2025 का आंकड़ा जीएसटी लागू होने के बाद से रिकॉर्ड स्तर का है। पांच वर्ष की यह छलाँग (वर्ष 2021 के ₹11.37 लाख करोड़ से वर्ष 2025 का संग्रह दोगुना) भारत की अर्थव्यवस्था की मजबूती और कर अनुपालन सुधार को दर्शाता है। ये आंकड़े बताते हैं कि आर्थिक गतिविधियों में मजबूती और डिजिटल अनुपालन ने जीएसटी संग्रह को नए स्तर पर पहुंचाया है। लेकिन अब जब दरें घटेंगी, तो प्रश्न यह उठता है कि क्या यह संग्रह की रफ्तार कायम रह पाएगी?
वहीं भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कही जाने वाली सूक्ष्म, लघु और मध्यम इकाइयां लंबे समय से उच्च इनपुट लागत और जटिल अनुपालन से दबाव झेल रही थीं। अब नए सुधार से कच्चे माल और मध्यवर्ती वस्तुओं पर दर घटने से उनकी लागत कम होगी। अनुपालन सरल होने से कर चोरी का दबाव घटेगा। घरेलू उत्पादन और निर्यात दोनों को प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिलेगी। इसका अर्थ यह हुआ कि जीएसटी 2.0 केवल उपभोक्ता तक सीमित राहत नहीं है, बल्कि यह आपूर्ति शृंखला और उत्पादन तंत्र को भी गति देने का अवसर प्रदान करेगी। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जीएसटी दरों में कटौती का सीधा असर सरकार के राजस्व पर पड़ेगा। जबकि वर्ष 2025 में रिकॉर्ड 22 लाख करोड़ रुपए से अधिक का संग्रह हुआ है, विशेषज्ञों का अनुमान है कि दर कटौती से आगामी वर्षों में 40,000–60,000 करोड़ रुपये का वार्षिक राजस्व नुकसान संभव है। यह नुकसान केवल केंद्र को ही नहीं, बल्कि राज्यों को भी प्रभावित करेगा।
राजकोषीय घाटा (जो वर्ष 25 में जीडीपी का लगभग 5 प्रतिशत है) पर इसका अतिरिक्त दबाव पड़ना तय है। ऐसे में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह उपभोक्ता राहत और राजस्व स्थिरता के बीच संतुलन कैसे साधे। “जीएसटी 2.0” और मोदी सरकार का “जीएसटी बचत उत्सव” निश्चित रूप से उपभोक्ताओं और उद्योग जगत के लिए राहत की राह खोलने वाला कदम है। दीपावली के अवसर पर इसे तोहफ़ा बताना राजनीतिक रूप से भी समझदारी भरा है। लेकिन वास्तविक चुनौती यह होगी कि क्या यह सुधार उपभोक्ता राहत और राजकोषीय स्थिरता दोनों को साध पाएगा। यदि सरकार स्मार्ट नीति और डिजिटल अनुपालन से राजस्व हानि की भरपाई कर लेती है, तो भारत अधिक गतिशील और उपभोक्ता-आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ेगा। अन्यथा, यही सुधार सरकार की आर्थिक नीति के लिए सबसे कठिन परीक्षा भी बन सकता है।






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