शिक्षा का उद्देश्य अब भी अधूरा
ग्रामीण स्कूलों में शिक्षक-अभाव, शहरी शिक्षा में व्यावसायिकता, और सीखने की घटती गुणवत्ता ने इन सुधारों की दिशा रोक दी है। आंकड़ों में प्रगति दिखती है, पर शिक्षा का असली उद्देश्य—समझ, सोच और संवेदना...

अपनी बात
दिनेश रामावत,
प्रधान संपादक
भारत का शिक्षा तंत्र दुनिया के सबसे बड़े और विविध तंत्रों में से एक है। यह केवल एक व्यवस्था नहीं, बल्कि करोड़ों आकांक्षाओं का संसार है, जहां हर बच्चा अपने जीवन की दिशा तय करने का सपना लेकर स्कूल की चौखट पार करता है। आज देश में हज़ार से अधिक विश्वविद्यालय, लगभग पैंतालीस हज़ार कॉलेज और लाखों स्कूल हैं, जो 26 करोड़ से अधिक छात्रों तक शिक्षा पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति से लेकर डिजिटल इंडिया की पहलों तक, भारत के शिक्षा तंत्र में परिवर्तन की एक लहर दिखाई देती है। लेकिन यह लहर हर किनारे तक नहीं पहुंच पाई है।
वर्ष 2025 तक भारत की साक्षरता दर लगभग 79 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। प्राथमिक शिक्षा में नामांकन दर 97 प्रतिशत बताई जाती है, जबकि उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात यानी जीईआर करीब 29 प्रतिशत तक पहुंच गया है। ये आंकड़े पहली नज़र में आश्वस्त करते हैं, लेकिन इनकी चमक के पीछे एक कड़वी सच्चाई छिपी है- “पढ़ने” और “सीखने” के बीच की गहरी खाई। 2024 की एएसईआर रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीण भारत में पांचवीं कक्षा के लगभग आधे बच्चे दूसरी कक्षा के स्तर का पाठ नहीं पढ़ पाते। गणित में तो हालात और भी चिंताजनक हैं, जहां केवल 44 प्रतिशत बच्चे ही बुनियादी घटाव कर पाते हैं।
शिक्षा की पहुंच तो बढ़ी है, पर सीखने की गहराई उथली पड़ गई है। कक्षा के बाहर बच्चे मोबाइल और सोशल मीडिया की दुनिया में तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन कक्षा के भीतर अब भी वही रटंत, वही पुराना पाठ्यक्रम और वही एकतरफा संवाद कायम है। शिक्षा, जो जीवन को दिशा देने का माध्यम होनी चाहिए, धीरे-धीरे केवल परीक्षा पास करने की मशीन बनी हुई है।
भारत में लगभग पचानबे लाख शिक्षक हैं, पर प्राथमिक स्तर पर शिक्षक-छात्र अनुपात कई राज्यों में अब भी 1:45 से ऊपर है। कई ग्रामीण विद्यालयों में एक ही शिक्षक पांच कक्षाओं को पढ़ाता है। शिक्षक प्रशिक्षण की स्थिति भी कमजोर है— लगभग 30 प्रतिशत शिक्षकों ने कभी किसी औपचारिक प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग नहीं लिया। ऐसे में शिक्षा का वास्तविक सुधार तभी संभव है जब शिक्षक ‘सिस्टम का हिस्सा’ नहीं, बल्कि ‘सुधार का केंद्र’ बनें। पर आज की नौकरशाही व्यवस्था में शिक्षक कागज़ी कार्यों, सर्वेक्षणों और चुनावी ड्यूटी में इतने उलझे हैं कि शिक्षण का मूल उद्देश्य पीछे छूट जाता है।
शहरी भारत में निजी स्कूलों और स्मार्ट क्लासरूम का दायरा लगातार बढ़ रहा है, जबकि ग्रामीण भारत में अब भी स्कूलों में बिजली, इंटरनेट और स्वच्छ शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं। राष्ट्रीय सर्वेक्षण बताते हैं कि ग्रामीण प्राथमिक विद्यालयों में लगभग 25 प्रतिशत स्कूलों में पूर्णकालिक प्रधानाध्यापक नहीं हैं, और 15 प्रतिशत में शिक्षकों की संख्या आवश्यकता से कम है। जहां महानगरों में माता-पिता बच्चों को अंतरराष्ट्रीय पाठ्यक्रमों में भेज रहे हैं, वहीं झारखंड, छत्तीसगढ़ या बिहार के कई गांवों में बच्चे आज भी स्कूल जाने के लिए दो घंटे पैदल चलते हैं। शिक्षा के इस ‘डिजिटल विभाजन’ ने नई असमानताएं पैदा कर दी हैं। कोविड-19 के समय यह खाई और चौड़ी हुई, जब ऑनलाइन कक्षाएं अमीर घरों के बच्चों के लिए सामान्य और गरीब बच्चों के लिए असंभव थीं।
उच्च शिक्षा की बात करें तो देश में हर साल लगभग चार करोड़ विद्यार्थी विश्वविद्यालयों में दाख़िला लेते हैं। लेकिन इन संस्थानों की गुणवत्ता में भारी असमानता है। केवल कुछ आईआईटी, आईआईएम और केंद्रीय विश्वविद्यालय ही वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना पाए हैं। अधिकांश निजी विश्वविद्यालय या तो शिक्षण की गुणवत्ता में कमजोर हैं या केवल व्यावसायिक लाभ के लिए संचालित हो रहे हैं। एक बड़ी चिंता यह भी है कि स्नातक स्तर के लगभग साठ प्रतिशत छात्र किसी भी व्यावहारिक कौशल से वंचित रहते हैं। डिग्री तो मिलती है, पर रोजगार नहीं।
तकनीकी शिक्षा परिषद और यूजीसी के आंकड़े बताते हैं कि देश के करीब 80 प्रतिशत इंजीनियरिंग स्नातक उद्योग की जरूरतों के अनुरूप कौशल नहीं रखते। यानी हमारी डिग्री-प्रधान शिक्षा व्यवस्था युवाओं के भविष्य को लेकर एक गंभीर चेतावनी बन गई है।
सुधारों की बात करें तो 2009 का शिक्षा का अधिकार अधिनियम देश के लिए एक ऐतिहासिक कदम था, जिसने 6 से 14 वर्ष के हर बच्चे को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दिया, लेकिन इसका क्रियान्वयन सीमित और असमान रहा। कई राज्यों में निजी स्कूलों ने आरटीई के तहत गरीब बच्चों को दाख़िला देने से बचने के तरीके खोज लिए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने शिक्षा को अधिक लचीला, कौशल-आधारित और बहुविषयक बनाने की कोशिश की है। इसमें ‘5+3+3+4’ की नई संरचना, मातृभाषा में शिक्षण और व्यावसायिक शिक्षा पर ज़ोर दिया गया है। यह नीति भारत को वैश्विक शिक्षा प्रणाली से जोड़ने की क्षमता रखती है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या हमारे स्कूल और शिक्षक इस बदलाव के लिए तैयार हैं?
सरकार ने डिजिटल शिक्षा के लिए “दीक्षा”, “स्वयं” और “पीएम ई-विद्या” जैसे कई प्लेटफॉर्म शुरू किए हैं, लेकिन इनसे लाभ वही उठा पा रहे हैं जिनके पास स्मार्टफोन, इंटरनेट और स्थिर बिजली है। ग्रामीण भारत के लगभग 40 प्रतिशत घरों में आज भी इंटरनेट तक नियमित पहुंच नहीं है। इस असमानता के कारण डिजिटल शिक्षा एक अवसर होने के बजाय नई असमानता में बदल रही है।
शिक्षा के क्षेत्र में निजीकरण की लहर तेज़ हो चुकी है। आज देश के करीब 45 प्रतिशत छात्र निजी स्कूलों में पढ़ते हैं। इससे विकल्प तो बढ़े हैं, लेकिन शिक्षा धीरे-धीरे एक ‘उत्पाद’ में बदल गई है। गुणवत्ता की जगह विज्ञापन और ब्रांड निर्णायक बन गए हैं। मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए निजी स्कूलों की फीस अब बोझ बन चुकी है और गरीब वर्ग के लिए यह एक सपना।
अब समय आ गया है कि शिक्षा को फिर से उसकी मूल आत्मा से जोड़ा जाए- सीखने, सोचने और समझने की प्रक्रिया से। भारत की शिक्षा व्यवस्था को अंकों की दौड़ से बाहर निकालकर उसे सीखने की यात्रा बनाना होगा। 21वीं सदी में रोज़गार, तकनीक और नैतिकता तीनों का संतुलन आवश्यक है। स्कूलों में केवल पाठ्यक्रम नहीं, बल्कि जीवन-कौशल, भावनात्मक शिक्षा और आलोचनात्मक सोच पर भी समान ध्यान दिया जाना चाहिए। शिक्षक को केवल ज्ञानदाता नहीं, बल्कि प्रेरक और संवेदनशील मार्गदर्शक के रूप में देखना होगा।
भारत ने शिक्षा के क्षेत्र में लंबी यात्रा तय की है, लेकिन यह यात्रा अभी अधूरी है। हमने स्कूलों की संख्या बढ़ाई, लेकिन उनमें सीखने का वातावरण कमज़ोर छोड़ा। हमने विश्वविद्यालयों के द्वार खोले, पर उनमें अनुसंधान और रोजगार की गुणवत्ता सीमित रही। नई शिक्षा नीति से उम्मीदें हैं, पर इन उम्मीदों को ज़मीन पर उतारने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, शिक्षकों की भागीदारी और समाज की साझेदारी आवश्यक है।
जब तक हर बच्चा सिर्फ “पढ़ा हुआ” नहीं बल्कि “सीखा हुआ” महसूस न करे, तब तक हमारी शिक्षा व्यवस्था का मिशन अधूरा रहेगा। भारत की असली तरक्की उस दिन होगी जब हर बच्चा यह कह सके- “मेरे स्कूल ने मुझे सिर्फ ज्ञान नहीं, समझ दी है।”






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