फर्जी निकला ‘दिलजला’ दिल का डाक्टर..!
डॉक्टर को दिल को सही करने बजाए यमराज बनकर लोगों के दिलों को डराने में लगा रहा। दिल का डॉक्टर पूरी तरह दिलजला फर्जी...

बोल हरि बोल
– हरीश मलिक
वरिष्ठ व्यंग्यकार
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डाक्टर को भगवान कहा जाता है। लेकिन अब ‘है’ कुछ की करतूतों से ‘था’ में बदल गया है। पड़ोसी छोटू मुल्क में एक ऐसा डॉक्टर सुर्खियों में है, जो कान पर थप्पड़ मार-मारकर मरीजों का इलाज करता है। यह बात दूसरी है कि अपना भारत महान भी ठीक इसी तकनीक से बरसों के पाकिस्तान का इलाज कर रहा है। दो-चार बार तो थप्पड़ के जगह हथगोले और सर्जिकल स्ट्राइक भी दागने पड़े। फिर भी ससुरा सुधरने का नाम ना ले रहा। खैर, अब चलते-चलते दमोह के डॉक्टर की बात भी कर लेते हैं। उसका असली नाम- नरेंद्र विक्रमादित्य यादव। फर्जी नाम- डॉ. एन जॉन कैम। काम- नकली कॉर्डियोलॉजिस्ट बनकर हार्ट सर्जरी यानी दिल का ऑपरेशन। नतीजा- सात लोगों की मौत। मतलब ये डॉक्टर को दिल को सही करने बजाए यमराज बनकर लोगों के दिलों को डराने में लगा रहा। दिल का डॉक्टर पूरी तरह दिलजला फर्जी निकला। इसकी डिग्री, रजिस्ट्रेशन सब कुछ फर्जी। मजे की बात ये है कि भइये, 2006 में विधानसभा के तत्कालीन अध्यक्ष शु्क्ल जी का ऑपरेशन भी इसी फर्जी कार्डियोलॉजिस्ट ने किया था! मतलब, जब सरकार की ही आंख-कान बंद हैं तो मासूम जनता तो गरीब की जोरू कहलाती है!
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दुनिया का चौधरी बोले तो ‘पलटू चाचा’
मनुष्यों में एक प्रजाति ऐसी भी है जो देश-काल की सीमाओं से सर्वथा परे है। देश हो या विदेश, इनके कई गुण-अवगुण चोर-चोर मौसेरे भाई की तरह मिलते हैं। समझदार को इशारा काफी होता है और आप तो सर्वज्ञानी है, सो समझ ही गए होंगे कि हम राजनेताओं की परम प्रजाति की चकल्लस कर रहे हैं। वैसे इनका तकियाकलाम फिल्मी गाने कस्मे-वादे और वफा सब बातें हैं बातों का क्या…से हूबहू मेल खाता है। अब अपने ट्रम्प भइया को ही ले लीजिए। उनके ट्रम्प टैरिफ ने दुनियाभर में खूब धमाल मचाया। लेकिन यो क्या भाया…ये तो पलटी मारने में अपने ‘पलटू चाचा’ को भी मात दे बैठे। पलटू चाचा तो सिर्फ सत्तासुख की खातिर पार्टियों में पलटी मारते हैं, लेकिन डोनल्ड डक की चाल से स्टॉक मार्केट से लेकर बड़े-बड़े बिजनेसमैन तक दिन में तारे गिनने लगे। ट्रम्प ने अपनी ही पार्टी से लेकर विदेशी नेताओं तक को खूब छकाया। ट्रम्प ने अपने पैरों पर टैरिफ की कुल्हाड़ी मार कर अब 90 दिन की मोहलत दी है। यह भी हो सकता है कि मोहलत उनका खुद का दिमाग ठंडा करने के लिए हो। क्योंकि शी नाम वाले हीमैन जिनपिंग की चाल ने दुनिया के चौधरी बनने निकले ट्रम्प की नींद उड़ा दी है।
बदजुबानी यानी, कामरा की कहानी
सोशल मीडिया पर हाल ही में एक बड़ा फाड़ू मीम्स नजर आया… जब ’समय’ खराब चल रहा तो तो चुप ’रैना’ चाहिए। सही समझे, वही स्टैंडअप कॉमेडियन समय रैना जिन्होंने पहले कॉमेडी का कबाड़ा किया और फिर उनका खुद का भी हो गया। लेकिन सेम प्रोफेशन वाले से यदि कोई सबक ले तो लोग क्या कहेंगे। भाई की नाक ना कट जाएगी। सो कॉमेडियन कुणाल कामरा ने कोई क्लियर-कट मैसेज नहीं लिया। भाई लिया होता तो आजकल मद्रास हाईकोर्ट के हाथ-पैर ना जोड़ रहे होते। फिल्मों में कॉमेडी के फन्ने खां कह गए हैं कि किसी को हंसाना सबसे बड़ी कला है। पर आजकल के कुछ युवा कॉमेडियनों ने कला में अपनी अश्लील कलाकारी घुसेड़ दी है। कला गई चूल्हे में तेल लेने। अपन तो अपना एजेंडा चलाएंगे। किसी को भी ‘गद्दार’ बताएंगे। हद तो वह युवा पीढ़ी भी कर रही है, जो कामरा की फैन है। उसको लगता है कि यदि ऐसी कॉमेडी पर नहीं हंसे तो पिछड़े मान लिए जाएंगे। चार लोग कहेंगे कि इन्हें नए जमाने की कॉमेडी की चाल-चलन नहीं मालूम है। यह चार लोग वो हैं, जिन्हें खुद कॉमेडी की समझ नहीं है!
‘सिकंदर’ का मुकद्दर नहीं चला
विलियम शेक्सपियर ने सच ही लिखा था कि नाम में क्या रखा है। यदि नाम की ही महत्ता होती को खुशहाल सिंह कभी दुखी और धनीराम गरीबी-गुरबत में ना मिलते। लेकिन ये बात बॉलीवुड वालों के गले कम ही उतरती है। तभी वे पुरानी हिट फिल्मों के नाम चुराकर पुरानी बोतल में नई शराब बेचने की कोशिश में लगे रहते हैं। 1978 में अमिताभ बच्चन की ब्लॉकबस्टर मूवी मुकद्दर का सिकंदर आई थी। तब फिल्म ने खूब धूम मचाई। अब सलमान खान इसका सिकंदर लेकर अपना मुकद्दर बनाने निकले। लेकिन कहते हैं ना कि तकदीर बनाने वाले तूने कोई कमी ना की, अब किसको क्या मिला.., मुकद्दर की बात है। कभी-कभी मुकद्दर को ब्लैक बक की भी हाय लग जाती है। और काठ की हांडी भी बार-बार नहीं चढ़ पाती है। ईद पर रिलीज हुई इस फिल्म को लेकर अब सलमान के फैंस ने ईदी मांगी है कि ‘सिंकदर’ को राष्ट्रीय आपदा घोषित किया जाना चाहिए!
यह ‘विदा’ कहने का वक्त है माही
अपने भारतीय संस्कारों में विदाई का परम महत्त्व है। बिटिया की विदाई। कंवर-सा की विदाई। अधिकारी की विदाई। यहां तक कि कभी मेहमानों को विदा करने स्टेशन तक जाने का चलन था। लेकिन कुछ विशेष किस्म के जिद्दी मेहमानों की कभी-कभी जबरन विदाई की नौबत भी आ जाती है। खबर आ रही है कि चेन्नई सुपर किंग के कप्तान रितुराज के घायल होने से माही को तैंतालीस की ‘तरुणाई’ में एक बार फिर से टीम की कप्तानी सौंप दी गई है। वह भी तब, जबकि कैप्टन कूल की ‘किलर इंस्टिंक्ट’ फेल हो चुकी है। हेलिकॉप्टर शॉट अब जमीन पर भरभरा रहा है। माही परफेक्ट फिनिशर की अपनी भूमिका से भी पूरा न्याय नहीं कर पा रहे। बातें तो माही की सम्मानजनक विदाई की चल रही थीं, लेकिन हार पर हार झेल रही सीएसके को धोनी की कप्तानी के साथ एक और हार मिल गई। समझ में नहीं आ रहा कि सीएसके के लिए रितुराज का घायल होना बड़ा झटका है या फिर माही का फिर से कप्तान बनना!
गर्मी में खोपड़िया का बचाव जरूरी
गर्मी के दिन काफी बड़े और दिलवाले होते हैं, लेकिन दिमाग गर्मी से सन्न होकर कुछ कम हो जाता है। इसलिए इन दिनों सरल वाक्यों का प्रयोग ही श्रेष्ठतम बचाव है। संयुक्त, मिश्रित और द्विअर्थी वाक्यों से शरीर का कम्प्यूटर यानी दिमाग जल्दी पक जाता है। वैसे गर्मी के मौसम में सब कुछ जल्दी पकता है, लेकिन खोपड़िया का नंबर सबसे अव्वल है। इसलिए इसे ठंडा रखने के श्रेष्ठ उपाय परम आवश्यक हैं। गर्मी में सबसे सरल उपाय है तीन पंखुड़ियों वाला पंखा। लेकिन इसे देखकर सहज ख्याल आता है कि कुछ कहावतें कैसे समय के साथ बदल जाती हैं। जैसे, तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा। भला पंखे की तीन पंखुड़ी से काम कैसे बिगड़ेगा। बल्कि वो ना हों तो गर्मी के दिनों में अच्छे-भले आदमी का बिगाड़ा हो जाए। गर्मी में बिन पंखा सब सून है। क्योकि तब सुनने, समझने और बोलने की क्षमता का पतन हो जाता है। डैड डेड की तरह, मम्मी मिस्र की ममी की तरह दिखाई देने लगते हैं।






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